अनुग्रह

 

  •  “आपकी रूचि तो आपको सदा सत्य से दूर ही ले जाएगी। सत्य जिसे भी मिला है धोखे से ही मिला है, इसीलिए उसे अनुकंपा कहते हैं, इसीलिए उसे अनुग्रह कहते हैं।

 

  • “जो कुछ भी महत है, वृहद है, बड़ा है, वो तो तुम्हें उसके अनुग्रह से ही मिलेगा। और जो कुछ भी सीमितहै, और छोटा है, और बंटा हुआ है, वो तुम्हें तुम्हारी कोशिशों से मिलेगा।”

 

  • ‘अनुग्रह वो होती है जो सभी प्रतिकूल परिणामों से तुम्हारी रक्षा करती है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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