अन्य

 

  • “तलाशना नहीं है, तलाश से मुक्त हो जाना है।”

 

  • “हम जैसा जीवन जी रहे हैं, वैसा ही जीते रहें, और साथ-ही-साथ उलझनों से मुक्त हो जाएँ, जीवन को समझ भी जाएँ, सत्य के समीप आ जाएँ, बोध हम में जगे, मूर्ख जैसे न रह जाएँ – ये असंभव है।”

 

  • “जो पा रहा है भीतर, यदि वो गा नहीं रहा है बाहर, तो भीतर का पाना भी अवरुद्ध हो जाएगा।”

 

  • “बाहर के ढर्रे यदि वैसे ही रहेंगे जैसे सदा से थे, तो फ़िर भीतर के ढर्रे भी वैसे ही रहेंगे जैसे सदा से थे।”

 

  • “आत्म चेतना और सांसारिक चेतना एक साथ ही चलती हैं।”

 

  • “जितनी बार तुम उचित दिशा में क़दम उठाओगे, उतनी बार आगे की राह और आसान हो जाएगी। तुम्हारा एक-एक क़दम निर्धारित कर रहा है कि अगला क़दम आसान पड़ेगा, या मुश्किल।”

 

  • “अपनी दिशा का ख़याल करो, अंजाम की परवाह मत करो।”

 

  • “अनहद का मूल है  ‘अनाहत’। अनाहत, जो पदार्थों के घर्षण से पैदा नहीं होता, ऐसा शब्द।”

 

  • क्यों आपको खुला आसमान भाता है? पक्षी की उड़ान क्यों आपको निस्तब्ध कर जाती है? इनका कोई कारण नहीं है। चलते-चलते अचानक ठिठक के खड़े क्यों हो जाते हैं? अनायास प्रेम क्यों पकड़ लेता है आपको? मन सोच-सोच के भी कुछ पता नहीं लगा पाएगा। दुनिया की सारी सहूलियतें मिली रहें, आपको लेकिन फिर भी आजादी क्यों प्यारी होती है? मन इसका कोई कारण नहीं जान पाएगा, यह ‘ह्रदय’ है।”

 

  •  “बाजुओं में अगर शक्ति नहीं है, तो यह इस बात का संदेश है कि दिल में ‘शिव’ नहीं है।”

 

  • “तुम जिस रोशनी को खोज रहे हो, उसी रोशनी का उपयोग कर के खोज रहे हो।”

 

  • “परिस्थितियाँ कभी ख़राब होती नहीं क्योंकि परिस्थितियों को वही होना था जो वो हैं।”

 

  • “जो उड़ेगा, जो ऊँचाइयाँ छूएगा, वो इस कारण छूएगा कि उसमें शिकायत का भाव नहीं था।”

 

  • “जो मिला है उसका ही इस्तेमाल कर लो, उड़ने लगोगे।”

 

  • “एक संसारी की भाषा में घृणा का विपरीत है – प्रेम, और एक ज्ञानवान की भाषा में घृणा का विपरीत है – आसक्ति, मोह।”

 

  • “मोक्ष क्या है? मोक्ष की इच्छा का अंत हो जाना ही मोक्ष है।”

 

  • “जब तक तुम व्यर्थ को छोड़ोगे नहीं, तब तक जो सार्थक है, वो तुम्हारे जीवन में उतरेगा नहीं। “

 

  • “जहाँ बहुत कष्ट मिल रहा हो, वो खेल ही नकली है।”

 

  • “शीतलता में जलन के लिए कोई स्थान नहीं है।”

 

  • “लोग  तुम्हारे करीब इसलिए नहीं हैं कि उनका जीवन सत्य से परिपूर्ण हो जाए| लोग तुम्हारे करीब इसलिए हैं, ताकि उनका जीवन सुविधापूर्ण रहे| ताकि उनके संस्कारो ने जो उनको सिखाया है, वो उसी पर और चल सकें| जिस क्षण तुम उन्हें संस्कारों की अपेक्षा, सत्य की ओर ले जाओगे, तुम उनके काम के नहीं रहोगे।”

 

  • “जो गीत सुनो और बिल्कुल स्थिर हो जाओ, वो गीत भला तुम्हारे लिये। और जो गीत सुनो और उत्तेजित हो जाओ, वो गीत ज़हर है तुम्हारें लिये।”

 

  • “आत्मविश्वास में मज़ेदार बात यह रहती है कि तुम्हें किसी की ओर नहीं देखना । तुम हल्के हो । सहज भाव से जो कर रहे हो, तुम्हें पता है कि जो भी कहेंगे, वही ठीक । जो भी करेंगे, वही ठीक । बड़ी मुक्ति है । दूसरों पर निर्भर नहीं हो, अपने पर भी निर्भर नहीं हो । एक सहज भाव है । बोलने से पहले सोचना नहीं पड़ रहा कि यह बात ठीक है कि बोलें कि न बोलें । बस खड़े हो, कह रहे हो, जी रहे हो । देखो कितना हल्कापन है । कदम जिधर को बढ़ते हैं, चल देते हो । जाँचना नहीं, परखना नहीं । ठीक कर रहा हूँ कि नहीं कर रहा हूँ! दो-चार किताबों से मिलान नहीं करना है ।”

 

  • “‘चेतना’ का अर्थ है – जानना। “

 

  • “घटनाओं का विश्लेषण करके, जो भी सुन्दर आपके साथ होता है उसको नाम देकर के, आप उसकी संभावना को और कम ही कर देते हो।”

 

  • “जो दिन-प्रतिदिन की छोटी घटनाओं से नहीं सीख सकता वो किसी विशेष आयोजन से भी सीख पाएगा, इसकी संभावना बड़ी कम है।”

 

  • “जीवन को भोगते ही वही हैं जो वीर हैं।”

 

  • “‘वेदांत’ का अर्थ यह नहीं होता कि वेद ख़त्म हो गए। ‘वेदांत’ का अर्थ होता है – वेदों का शिखर।”

 

  • “अनछुए रहो, इतने बड़े रहो कि सब तुममें समाया रहे लेकिन कुछ भी तुम्हें हैरान, परेशान, व्यथित ना कर पाए। गन्दा ना कर पाए, निशान, दाग-धब्बे ना छोड़ पाए।”

 

  • “परम को पाने की प्रेरणा, परम के अलावा कोई और दे सकता है क्या?।”

 

  • “वो जादू जो मिट्टी में प्रेम उतार देता है, उसे ‘प्राण’ कहते हैं। इसीलिए उपनिषद् कहते हैं, “प्राण ही ब्रह्म हैं।” ‘वो’ कुछ ऐसा कर देता है जो हो नहीं सकता था। राख हो जाना है आपको, और राख से ही आए हो आप। पर इस राख की उड़ान देखो, इस राख की समझ देखो, इस राख की गहराई देखो – ये ‘प्राण’ कहलाती है, ये ‘प्राण’ है।जीवन तभी है जब उसमें प्राण हों। और ‘प्राण’ का मतलब साँस मत समझ लीजिएगा कि साँस चल रही है, तो मैं प्राणी हुआ।आप प्राणवान केवल तब हैं, जब आपके जीवन में ‘वो’ मौजूद है जो आपके जीवन को जीने काबिल बनाता है, अन्यथा आप अपने आपको मुर्दा और निष्प्राण ही मानें।”

 

  • “जैसा अपने को जान रहे हो वैसा तुम दूसरों को जान रहे हो।”

 

  • “जिज्ञासा में और समाधान की इच्छा में अंतर है।समाधान की ही जो इच्छा होती है, उसको ‘मुमुक्षा’ कहा गया है। जो जिज्ञासु होता है, उसको ये भ्रम होता है कि उसको कष्ट प्रश्न दे रहा है। वो प्रश्न का निवारण करना चाहता है। जो मुमुक्षु है, वो सवाल तो पूछता है, पर इतनी स्पष्टता उसको है कि, “मुझे पीड़ा ये सवाल नहीं दे रहा, मुझे पीड़ा इस सवाल के पीछे जो मन है, वो दे रहा है।” तो वो  सवाल का निवारण कम चाहता है, मन का निवारण ज़्यादा चाहता है।”

 

  • “आत्म-विचार की ओर जाना अपनी ओर जाना है।”

 

  • “गुणातीत व्यक्ति का आपको पता नहीं लगेगा कि कहाँ पर है, क्योंकि वो कहीं पर भी नहीं है। वो कई बार आपको ऐसा लगेगा – अजगर की तरह आलसी, पड़ा हुआ है। आप कहोगे, “ तामसिक है”। थोड़ी ही देर में आपको दौड़ता, भागता, खेलता नज़र आएगा। फ़िर अचानक ज्ञानी की तरह थम कर बैठ जाएगा। आपके लिए उसको किसी वर्ग में डालना बड़ा मुश्किल हो जाएगा।”

 

  • “मीरा का रास्ता, कबीर का रास्ता थोड़े ही हो सकता है। लेकिन मिलता दोनों को है। बुद्ध और रूमी कितने अलग-अलग। जहाँ से हो, जैसे हो, वहीं से आगे बढ़ो और अपने-अपने तरीकों से आगे बढ़ो।”

 

  • “वेद चला गया, वेदना बचेगी और वेदना ही वेद है ।”

 

  • “स्वयं से दूर हो जाना ही नरक है।”

 

  • “वैराग्य का मतलब है- अपनी बीमारी को छोड़ देना।”

 

  • “निजता यही है कि उसको जान लिया जो मेरा नहीं है।”

 

  • “उपनिषद् सार्थक ही उसी के लिए हैं, जो स्वयं उपनिषदों के करीब पहुँचने लग गया हो।”

 

  • “जब भक्ति ख़त्म हो जाती है, तो भक्त पैदा होते हैं।”

 

  • “तुम जिसको फ़ायदा बोलते हो, वो तो तुम्हारे अपने संस्कार से आ रहा है।”

 

  • “यही परिभाषा है काफ़िर की – जो नकली को असली समझ ले, और असली को भुला दे। और ‘नकली को असली’ समझने का क्या अर्थ है? जो ‘उसके’ अलावा किसी को भी महत्त्व देने लगे, वही काफ़िर है।”

 

  • “दूसरे के लिए हम जो सीमाएं बनाते हैं,  ध्यान देना वह सीमा बहुदा हम अपने लिए भी बना लेते हैं।”

 

  • “जो अपना है ही नहीं उसको हमने लगातार अपना माना है, और जो पूर्णतया अपना है, सदा हमने उसको पराया देखा है, यही हमारे जीवन की मूर्खता है, यही विडंबना है।”

 

  • “जहाँ हो, वहीं घर है।”

 

  • “जब समस्त ब्रह्माणों को काट दिया जाता है, जब समस्त ब्रह्माओं को काट दिया जाता है, तब जो खुला-साफ़-व्यापक दिखाई देता है, सो ब्रह्म है।”

 

  • “जो असली है, वो तुम्हें दिया ही नहीं जा सकता। वो तो तुम्हें अपनी मर्जी से, अपनी निष्ठा से, अपनी सहमति और श्रद्धा से खुद ही पाना होता है।”

 

  • “जिसने देना सीख लिया, वो पाएगा कि अहंकार भी दे दिया।”

 

  • “सिर्फ़ उसी को नाराज़गी का हक़ है, जो नाराज़ हो ही ना सकता हो।

    सिर्फ़ उसी को गति का हक़ है, जो अपनी जगह से हिल ही ना सकता हो।

    सिर्फ़ उसी को हज़ारों में खो जाने का हक़ है, जो कभी खो ही ना सकता हो।

    सिर्फ़ उसी को रूठने का हक़ है, जिसका प्रेम अनंत हो।”

 

  • “वही असली धन है जो तुम्हारे होने में है।”

 

  • “गरीब वो, जिसको अभी और की तलाश है।”

 

  • “तथ्य वो है जो तुम्हारे बिना भी रहेगा, ख्याल वो है जो तुम्हारे होने से होता है।”

 

  • “निवारण तब होता है जब कष्ट केंद्रीय रह ही नहीं जाता, और कष्ट का केंद्रीय ना रह जाना ही निवारण है।”

 

  • “कष्ट की समाप्ति थोड़े ही होती है, कष्ट का विस्मरण होता है।”

 

  • “निवारण है निकटता में, और कोई निवारण नहीं है।”

 

  • “कमज़ोरी का जवाब ताकत नहीं होती। कमज़ोरी का जवाब होता है: “कमज़ोरी के भाव का न होना” — यही ताकत है। किसी में यह भाव है कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’ और किसी में यह भाव है कि ‘मैं ताकतवर हूँ’, यह दोनों ही बीमार लोग हैं। इतना ही काफ़ी है कि मैं न सोचूँ कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’। और जो नहीं सोचेगा कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’, वो यह भी नहीं सोचेगा कि ‘मैं ताकतवर हूँ’।

    न ताकतवर हूँ न कमज़ोर हूँ; ‘बस हूँ’; और इतना काफ़ी है।”

 

  • “जिसकी संगती में आपका मन खौल उठे, वही नरक है।”

 

  • “गहराई अस्पर्शित रहे स्थितियों के संघात से, सागर बिखर नहीं जाता हवाओं के आघात से।”

 

  • “असली उपनिषद् वो है जो आपसे एक नया उपनिषद् लिखवा दे।”

 

  • “उत्तेजना की चाह ऊब की निशानी है।”

 

  • “असली मेहनत करी नहीं जाती , हो जाती है।”

 

  • “बीमारी को दवाई नहीं ठीक करती, बीमारी को सबसे पहले आपकी ठीक होने की अभीप्सा ठीक करती है।”

 

  • “राम खोज के रुक जाने का नाम है |

    राम उस पूरेपन का नाम है, जिसमें अब किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं रह गयी ।”

 

  • “ग्रंथो में डूबना ही तो स्वर्ग है।”

 

  • “जब मन भर जाता है इधर से, उधर से, इकठ्ठा किये हुए झूठों से, बाहरी सामग्री से, व्यर्थ की गन्दगी से और उस सामग्री से नाता जोड़ लेता है, मोह बैठा लेता है; तब सफाई गंदी लगने लगती है उसको। कचड़े के साथ रहने के अभ्यस्त हो जाओ, तो कचड़े से रिश्ता बैठ जाता है, आँखों को आदत लग जाती है। मोह इसी का नाम है।”

 

  • “आतंरिक धोखेबाज़ी है टालना; आतंरिक धोखेबाज़ी है प्रतीक्षा।”

 

  • “रौशनी तो निजी होती है। अँधेरा सामूहिक होता है।”

 

  • “राम की कोई घर वापसी नहीं होती, आप की राम वापसी होती है।”

 

  • “जब मन रौशन हुआ तब दीवाली जानो।”

 

  • “वास्तविक उत्सव अपने पीछे उत्सवों की एक अनंत श्रृंखला छोड़ के जाएगा। उत्सव के बाद अनजानापन और अकेलापन नहीं आ सकता।”

 

  • “योगी होने का अर्थ है- मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबीलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिल्कुल, बिल्कुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है- ये योग है। रंग अलग-अलग है दोनों के पर तत्व एक हैं। यही योग है। अब दोनों एक हैं।”

 

  • “क्षमा में जीया जाता है, वो एक सतत मनोस्थिति है।”

 

  • “वास्तविक क्षमा चित्त की वो निरंतर अवस्था है, जिसमें चोट खाना ही बड़ा मुश्किल हो जाता है।”

 

  • “बचपन का अर्थ है – तुम्हारी सहजता, तुम्हारी निर्दोषता, तुम्हारी साफ़ आँखें, तुम्हारी निष्कपटता।”

 

  • “बड़ा वो होता है जो अपने बचपने को दोबारा हासिल कर लेता है।”

     

  • “वास्तविक सवाल मान्यताओं से नहीं, मान्यताओं पर उठता है।”

 

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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