अवलोकन

  • अवलोकन आपके हाथ में है। साक्षित्व आपके हाथ में नहीं है। मन से मन को विचारो। मन ही मन का अवलोकन करता है। मन का उचित प्रयोग यही है: खुद को देखना, दृश्य और दृष्टा को एकसाथ देखना।”

 

  • डर बाहर कहीं नहीं होता। सारा का सारा डर मन है। पूरा मन डर है। अपने मन में पैठ कर के देखना है कि चल क्या रहा है। डर मन में है और मन डर है। मन की हरेक तरंग डर है। मानसिक गतिविधि लगातार चल रही है और उसी में हमें पैठना है।”

 

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • तुम सोचते हो कि अपनी चतुराई में तुम आपदाओं से बचने के उपाय कर रहे हो। तुम आपदाओं से बचने का इंतज़ाम नहीं, आपदाओं को इकट्ठा करते हो। जीवन भर खट-खट कर तुम अपने बुढ़ापे के कैंसर के लिए पैसा इकट्ठा करते हो, और देख नहीं पाते कि खट-खट कर तुमने कैंसर ही इकट्ठा कर लिया है।”

 

  • जीवन के जिन पहलुओं को देखने का आपका मन नहीं करता हो, उधर ही देखिये। वहीँ देखना समाधान है।”

 

  • भूल का कोई सुधार नहीं होता। कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे। आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है। भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।”

 

  • शुद्धतम रूप से गुरु बोध मात्र है। आत्मज्ञान, आत्मविचार ही आत्मबोध बन सकता है। आत्मविचार में जब तुम अपने आप को देखते हो, तभी संभव होता है गुरु का तुम्हारे लिए कुछ कर पाना। जो स्वयं को देखने को राज़ी नहीं, गुरु उसके लिए कुछ नहीं कर पायेगा। गुरु ही प्रेरणा देता है आत्मविचार की, और आत्मविचार का आखिरी फल होता है आत्मबोध – यानि गुरु की प्राप्ति। गुरु से ही आदि, गुरु पर ही अंत; गुरु ही है आत्मा अनंत।”

 

  • असली जब आँखों को ताकत देता है तब आँखें नकली को नकली की तरह देख पाती हैं।”

 

  • ऊंची से ऊंची उपलब्धि मेरी यही हो सकती है कि मैं बहरा हो जाऊँ, अंधा हो जाऊँ। वो सुन सकूं जो सीधे-सीधे कहा ही जा रहा है। वो देख सकूं जो साक्षात ही है।”

 

  • जिस क्षण तुमने बदलते हुए को देख लिया उस क्षण तुम उसके संग हो लिए जो बदलता नहीं।”

 

  • जितना तुममें देहभाव गहरा होगा, उतना ही संसार तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण रहेगा। संसार को शून्य जानने के लिए वो दृष्टि चाहिए, जो पहले खुद को शून्य जाने।”

 

  • सीधा देखने के लिये दृष्टि सीधी चाहिए। सूक्ष्म को देखने के लिए दृष्टि सूक्ष्म चाहिए।”

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    उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

 

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