अहंकार

  • अस्ति है समाप्ति,शून्यता है अनंतता।”

 

  • मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि।”

 

  • मोह त्यागो, और त्याग को भी त्यागो।”

 

  • “कोई भी ढंग का काम करने के प्रति अहँकार प्रतिरोध देता है, विरोध करता है | उस विरोध का नाम तुमने आलस रख दिया है |”

 

  • स्वयं का विसर्जन ही महादान है।”

 

  • तुम अपनी चेतना की वर्तमान स्थिति ही हो।”

 

  • पापी को लक्ष्य करो, पाप को नहीं। बेहोशी में किया कर्म ही पाप है, और बेहोश मन ही पापी। जब तक बेहोश मन रहेगा, तब तक बेहोशी के पाप रहेंगे ही।”

 

  • समस्याएं अहंकार के लिए ही हैं।”

 

  • संतों के वचनों का आमतौर पर हम जो भी अपने मन से अर्थ करते हैं वो उल्टा ही होता है। उल्टे मन से सीधा अर्थ कभी निकल ही नहीं सकता। इन अर्थों से तो भ्रमों को बढ़ावा मिलता है। इसीलिए साईं को भी हमने अपना अहंकार बचाने का माध्यम बना लिया है।”

 

  • हल्के मन में अहंकार की कोई जगह नहीं होती।”

 

  • भक्ति का अर्थ है अहंकार से मुक्त होकर अपने से विराट को मान्यता देनाऔर जानना कि वो असली है और मैं नकली हूँ।”

 

  • अहंकार अपने से ज़्यादा किसी को महत्व नहीं देता।”

 

  • प्रकृति और परमात्मा साथ हैं। इनसे अगर कुछ छिटका हुआ है तो वो अहंकार है।”

 

  • “‘मैं अपने अहंकार को ख़त्म कर दूँगा’, यह सबसे बड़ा अहंकारी वक्तव्य है।”

 

  • उपरोक्त दो मनोदशाओं के अतिरिक्त एक और है- वो अहंकार है। उसे मिले, तो वो अर्जित करने की कोशिश करता है और मिले तो पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पता है। और की चाह रह जाती है।”

 

  • चोट खाए अहंकार, माफ़ करे अहंकार।”

 

  • अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो। अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो।”

 

  • अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो।”

 

  • अहंकार एक जलन है। तपिश है। किसी में डूब जाऊं जो कुछ शीतल करे। जिस समय अहंकार को दिख जाता है कि ये सब ताल-तलैया झूठे हैं वो ख्वाब लेना बंद कर देता है। यही शीतलता है।”

 

  • जहां स्वार्थ सिद्ध हो वहां कभी आलस नहीं आता; आलस मन की स्वयं को बनाए रखने की चाल है। हमने सत्य, मुक्ति को बहुत पीछे की प्राथमिकता दी है, जहाँ सत्य और मुक्ति होंगे वहां हमें आलस जाएगा। नींद, आलस अहंकार का कवच हैं।”

 

  • बौद्धिक उछाल से उठते काल्पनिक प्रश्न दागें। सवाल वो पूछिये जो व्यक्तिगत हो, क्योंकि अहंकार व्यक्तिगत होता है। आप स्वयं से ही तो त्रस्त हैं। अपने को छुपाएँ – अपने सवाल में अपने मन और जीवन को सामने लाएँ।”

 

  • जब हम पूछते हैं, ‘समर्पण किसको?’ तो हम अपने अहंकार को सुरक्षित रखना चाहते हैं, उसका पता-ठिकाना याद रखना चाहते हैं, ताकि एक दिन उसे वापस ले सकें। समर्पण किसी को नहीं किया जाता। बस समर्पण किया जाता है।”

 

  • सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।”

 

  • अहंकार को कभी आश्वस्ति नहीं होती और अहंकार से ज़्यादा कोई आश्वस्त होना नहीं चाहता।”

 

  • अहंकार आत्मा तक नहीं जा सकता। आत्मा ही आत्मा के क़रीब जा सकता है।”

 

  • मन पहले कहता है कि ‘नहीं’ निभाऊंगा और फिर कहता है कि ‘मैं’ निभाऊंगा| यहाँ पर अहंकार दोनों जगह कायम है| इसलिए कह रहे हैं कि तुम निभाना, हम कुछ नहीं करेंगे| जब तुम्हें उचित लगता है बुला लेना, हमसे बाधा पाओगे| हम उपलब्ध हैं सुनने के लिए| हम में बस गूंज पाओगे|”

 

  • बिंदु की लीला से ‘अहं’ वृत्ति का जन्म होता है। तो अहं वृत्ति एक अपूर्णता के साथ पैदा होती है। वही अपूर्ण, पूर्ण होने के लिये साथी चाहता है, विषय चाहता है।”

 

  • अहम् भाव जब प्रकृति से जुड़ जाता है तो शरीर कहलाता है।”

 

  • जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता। तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी। आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।”

 

  • जो इन्द्रियों को रुचे और अहम् को ऊर्जा दे वही मन को पसंद आता है। सामान्यतः जो भी मन को अस्वीकार हो वो मन के लिए दवा साबित हो सकता है।”

 

  • “जो कुछ तुम्हारे अहँकार को तोड़ता है, वो करने में तुम्हें आलस आता है |”

 

  • “‘मन’, ‘बुद्धि’, और ‘चित्त’, इन तीनों से एक होने का भाव अहंकार कहलाता है| तादात्म्य| इन तीनों से जो तादात्म्य होता है, वो अहंकार कहलाता है|”

 

  • “अहंकार माने अपनी परिभाषा दूसरों से लेना ।”

 

  • अहंकार कौन? जो तुम हो और जो मरना नहीं चाहता।

    मृत्यु क्या? जो प्रतिपल घट रही है और तुम्हे ख़त्म ही किए दे रही है। जिसने मृत्यु को स्वीकार कर लिया उसने अहंकार को विसर्जित कर लिया।”

 

  • “हमारे आंसू अहंकार के अलावा किसी और स्रोत से नहीं निकलते ।”

 

  • “अहंकार को आश्वस्ति कभी नहीं होती और अहंकार से ज़्यादा आश्वस्त कोई होना नहीं चाहता।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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