आत्मा

  • तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता।”

 

  • क्रांति है अपना साक्षात्कार, महाक्रांति अपना सहज स्वीकार।”

 

  • शरीर और आत्मा के मध्य सेतु है मन।”

 

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • आत्मा गुरु है और मन चेला। इनके अलावा कभी कोई गुरु हुआ है कोई चेला।”

 

  • करनी के दो अलग अलग स्त्रोत हैं: गुरु और चेला, आत्मा और मन। गुरु का कर्म: निष्काम कर्म चेले का कर्म: सकाम कर्म कर्म का उद्गम यदि गुरु है तो चेला कर्ता भासित भले ही होगा, पर कर्म निष्काम होगा।”

 

  • प्रेम का अर्थ- एक ऐसा मन जिसकी गति सदा आत्मा की तरफ है। प्रेमी जीवन के सब रंगों से गुज़रता है, पर आत्मा की ओर उन्मुख। आत्मा, सत्य के साथ रहना ही प्रेम है। यदि तुम्हारा प्रेम सत्य से घबराता है, तो वो प्रेम आसक्ति है, छल है मात्र।”

 

  • आत्मा की पुकार और संसार की आसक्ति के बीच इंसान अटका रहता है जीवन भर।”

 

  • साधु का आदर करने के लिए आपने अंदर साधुता चाहिए साधु से प्रेम आत्मा से प्रेम है , परम से प्रेम है ।”

 

  • आप जिस तल पर हो दुनिया आपको उसी तल पर दिखाई देगी बस आत्मा के तल पर आपको असली साधु का दर्शन हो सकता है ।”

 

  • धन्यता – जो धन्य हो गया है। जिसे वास्तविक धन प्राप्त हो गया है। मन का आत्मा से एक हो जाना – यही धन्यता है ।”

 

  • शुद्धतम रूप से गुरु बोध मात्र है। आत्मज्ञान, आत्मविचार ही आत्मबोध बन सकता है। आत्मविचार में जब तुम अपने आप को देखते हो, तभी संभव होता है गुरु का तुम्हारे लिए कुछ कर पाना। जो स्वयं को देखने को राज़ी नहीं, गुरु उसके लिए कुछ नहीं कर पायेगा। गुरु ही प्रेरणा देता है आत्मविचार की, और आत्मविचार का आखिरी फल होता है आत्मबोध – यानि गुरु की प्राप्ति। गुरु से ही आदि, गुरु पर ही अंत; गुरु ही है आत्मा अनंत।”

 

  • जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता। तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी। आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।”

 

  • जब आत्मा का नूर चहरे पर चमकता है, तब उसे सुंदरता कहते हैं। वही है वास्तविक सौंदर्य – सत्यं शिवं सुन्दरम्।”

 

  • आत्मा सार है। संसार आत्मा का छिलका है। अपने जीवन को देखें कि उसमें कितना महत्व है सार के लिए और कितना छिलके के लिए।”

 

  • हम सब रस-भोगी हैं। सतही मन के लिए रस प्रसन्नता की उत्तेजना है और आत्मा से जुड़े मन के लिए रस आनन्द की शान्ति है।”

 

  • आत्मा के अलावा और किसे पाया जा सकता है।”

 

  • अहंकार आत्मा तक नहीं जा सकता। आत्मा ही आत्मा के क़रीब जा सकता है।”

 

  • अवसर एक ही है। आत्मा एकमात्र अवसर है।”

 

  • आत्मा पूर्ण है और संसार अपूर्ण| जो अपूर्ण है वो भी पूजनीय है, क्योंकि वह अभिव्यक्ति उसी पूर्ण की है |”

 

  • किसी के भी जीवन में शरीर और विचारों से प्रवेश करना नीचता है| किसी के जीवन में आत्मा के राजपथ से प्रवेश करना उत्तम है |”

 

  • मूल भी तुम, फूल भी तुम, आत्मा भी तुम, जीव भी तुम| यही ज्ञान है, यही प्रेम है और यही आहिंसा है| ज्ञान जब गहरा होता है, तब प्रेम बन जाता है ।”

 

  • बाहर और भीतर में बंटवारा हुआ तो इस घर्षण से संसार और सत्य अलग हो जाएँगे, विचार और आत्मा अलग हो जाएँगे ।”

 

  • जो सुरति में है उसे संसार और आत्मा, दोनों उपलब्ध हो जाएँगे ।”

 

  • “क्या ख़रीददार क्या व्यापारी
    इस बाज़ार में सब भिखारी
    विक्रय का लोभ न क्रय कि तैयारी
    आत्मा पूरी ,पूरी शान हमारीउलझे यदि तो उलझन भारी
    न भूलो संसार काँटों की झाड़ी।”

 

  • “आत्मा वो बिंदु है जिसे संसार छू नहीं सकता, पर जिसके होने से पूरा संसार है|”

 

  • “आत्मा परम स्वतंत्र है बाँधी जा नहीं सकती।”

 

  • “स्वात्मा हि प्रतिपादितः” का अर्थ यह होता है कि – ये ‘आत्मा’ वो तत्व है, जिसका विस्तार ‘अहंकार’ और ‘संसार’ हैं। जब विस्तार सिमट जाता है, तो सिर्फ़ ये तत्व जलता रहता है, प्रकाशित होता रहता है। और जब ये विस्तार फैल जाता है, तो विस्तार ही विस्तार दिखाई देता है, तब यह तत्व आसानी से तब प्रतीत नहीं होता।”

 

  • “समेट लो, तो आत्मा’, फैला दो, तो संसार।”

 

  • “आत्मा को पाने के लिए अहंकार के विरुद्ध जाना पड़ता है।”

 

  •  एक ही आत्मा है। सारे भेद, सारी विविधताएँ और नानात्व मन में होते हैं, आत्मा में नहीं होते।”

 

  •  “परमात्मा कुछ होता ही नहीं, मात्र आत्मा है।”

 

  • “भय को, विचारों को, संस्कारों कोइनको मन की चर्बी जानो। 
    ये मन का नाहक का बोझ है, ये ज़बरदस्ती चढ़े हुए हैं। और आत्मा को मन की माँसपेशी जानो; आत्मा को मन की ऊर्जा जानो। 
    वो मन को सुन्दर गति देती है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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