आदत

  • अलग-अलग संस्कार ही अलग-अलग व्यक्ति बनते हैं।”

 

  • तुम अब गधे रहे नहीं पर करते तुम ढेंचू-ढेंचू ही हो। आदत है, व्यर्थ आदत है।”

 

  • हम उन्हें भ्रांत कहते हैं जो हमारे बनाए हुए ढर्रों पर नहीं चलते |”

 

  • “शक़ करना तुम्हारी आदत बन चुकी है| यकीन तुम्हें आता ही नहीं क्योंकि यक़ीन का श्रद्धा से बहुत गहरा सम्बन्ध है|”

 

  • ढर्रों पर चलना विक्षिप्तता है| पर विक्षिप्तता इस हद तक भी जा सकती है कि आप आदतें और ढर्रे भी बना पाएं |”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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