आध्यात्मिकता

  • “संसार आध्यात्मिकता को नैतिकता के तल तक ले आता है।”

 

  • “जिसे प्रकृति में शीतलता मिलने लगी, वो आध्यात्मिक हो गया।”

 

  • “आध्यात्मिकता है अपनी विशुद्ध नग्नता को वापस पाना।”

 

  • “किसी ने उगता हुआ सूरज देखा । किसी ने बरसात का सूरज देखा । किसी ने अमेरिका में बैठकर देखा । किसी ने अफ्रीका में बैठकर देखा । और सबने देखा सूरज लेकिन आधा-तिरछा देखा या किसी माध्यम से देखा । अब जो देखने वाले थे, वो चले गए । जिन्होंने देखा था, वो चले गये । उनकी लिखी किताबें बची हैं । किताबों में ज़िक्र किसका है- ‘सूरज का और चश्मे का’ । सूरज तो पढ़ने वाले जान नहीं पाते क्योंकि सूरज तो बताने की चीज़ नहीं है । सूरज तो अनुभव करने की चीज है ।सूरज तो जान नहीं पाते । हाँ, चश्मे को जान जाते हैं ।”

 

  • “आध्यात्मिकता में दो में से एक घटना घटेगी: – ‘मैं’ विस्तीर्ण हो जायेगा – सब समा लिया। – ‘मैं’ बिंदुरूप हो जायेगा – सब छोड़ दिया। दोनों घटनाएं वास्तव में एक ही हैं। आध्यात्मिकता में दो में से एक घटना घटेगी: – ‘मैं’ विस्तीर्ण हो जायेगा – सब समा लिया। – ‘मैं’ बिंदुरूप हो जायेगा – सब छोड़ दिया। दोनों घटनाएं वास्तव में एक ही हैं।”

 

  • “आध्यात्मिक मन दुःख का शिकार नहीं हो सकता।”

 

  • “आम मन समाज और नैतिकता से भरा होता है। इसी कारण उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम न सामाजिक होता है न नैतिक होता है। प्रेम बस आध्यात्मिक होता है।”

 

  • “आध्यात्मिकता क्या है? आध्यात्म का अर्थ है अपने आप को जानना। पूरा जानना। जो ज़रा भी जानने को उत्सुक है, वो आध्यात्मिक है। बस ज़रा सा आध्यात्मिक है।”

 

  • “आध्यात्मिक व्यक्ति- जो मूल में फूल देखे, और फूल में मूल | जो फूल और शूल दोनों को एक समान देखे |”

 

  • “अध्यात्म परमात्मा की बात बाद में है, और दुनिया की बात पहले। अध्यात्म का अर्थ है दुनिया में बेवकूफ नहीं बनना।” 

 

  • “आध्यात्मिकता इसीलिए है कि जीवन — भरा, पूरा, शांत हो सके। लगातार जिस खौफ़ में, जिस तड़प में, जिस परेशानी में हम जीते हैं, उससे मुक्ति मिल सके।”

 

  • “समस्त आध्यात्मिकता का ध्येय है — डर से मुक्ति।”

 

  • “सीधे रहो, सरल रहो यही आध्यात्मिकता है, यही परमात्मा है।”

 

  •  “आध्यात्मिकता स्वर्ग या भगवान् के बारे में नहीं है, ये मूर्ख ना होने के बारे में है।”

 

  • “आध्यात्मिकता का अंत होता है ऐसे अनुग्रह के भाव पर जहाँ शिकायतें बचतीं ही नहीं पर आध्यात्मिकता की शुरुआत होती है बड़ी गहरी शिकायत से। जिनके पास शिकायत नहीं उनके लिए आध्यात्मिकता नहीं। अंत में कोई शिकायत नहीं बचेगी, अंत में तो बस धन्यवाद बचेगा।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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