अद्वैत

  • “कुछ बँटा हुआ नहीं है, सब एक है। बँटा हुआ दिखता है, क्योंकि मन बँटा हुआ है। “
  • “समस्त द्वैतों के मूल में जो अद्वैत है, उसी की इच्छा से सारे द्वैत पैदा होते हैं, उदित होते हैं।”
  • “अद्वैत को पाने का एक ही तरीका है, द्वैत में पूरी तरह डूब जाना क्यूँकी द्वैत के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।”
  • “दृष्टि ऐसी रखो जो उसी को न देखे जो उठ रहा है, गिर रहा है; जो चलायमान है, जिसमे स्पन्दन हो रहा है, जिसमे गति हो रही है।  वो गहरी गति के बीच भी उसको देखे जो अचल है, स्थिर है।”

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Advertisements