अद्वैत

  • “कुछ बँटा हुआ नहीं है, सब एक है। बँटा हुआ दिखता है, क्योंकि मन बँटा हुआ है। “
  • “समस्त द्वैतों के मूल में जो अद्वैत है, उसी की इच्छा से सारे द्वैत पैदा होते हैं, उदित होते हैं।”
  • “अद्वैत को पाने का एक ही तरीका है, द्वैत में पूरी तरह डूब जाना क्यूँकी द्वैत के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।”
  • “दृष्टि ऐसी रखो जो उसी को न देखे जो उठ रहा है, गिर रहा है; जो चलायमान है, जिसमे स्पन्दन हो रहा है, जिसमे गति हो रही है।  वो गहरी गति के बीच भी उसको देखे जो अचल है, स्थिर है।”
  • “तुम्हारा स्वभाव है अनछुआ रहना, तुम्हारा स्वभाव है – अद्वैत।”
  • “अद्वैत को और पाओगे कहाँ द्वैत के अलावा?”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं