आसक्ति

  • “खेल इस बात का नहीं होता है कि वासना उठी और उससे आसक्त हुए कि नहीं हुए। खेल इस बात का है कि मन ऐसा हो जाए कि मन में ऐसी उलटी-पुलटी बात आये ही ना।”

 

  • “पाखंडी कौन है? नास्तिक जो झूठा आस्तिक होने कि कोशिश कर रहा है ।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं