जागृति

  • “एक मात्र अभिशाप है ,‘न जानना’।”
  • “जागृति कठोरता नहीं देती, जागृति करुणा देती है।”
  • “जानना तुम्हारा स्वभाव है।”
  • “पाप सोने में नहीं है, पाप पूरी तरह न जगने में है।”
  • “जो जानता है, उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा और मोह दोनों से हटकर है। जो नहीं जानता, उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा का विपरीत है। 
  • “हमें किसी भी बात पर यकीन नहीं है क्योंकि जो कुछ भी हम जानते हैं वो हमारा अपना नहीं है । उसे हमने खुद कभी जाना नहीं है । “
  • “जब आप के भीतर घमासान नहीं मचा होता तो दुनिया को जानना बड़ा सहज हो जाता है।”

 

  • “एक जगा हुआ, एक वास्तविक रूप से बुद्धिमान व्यक्ति जो अपनी निजता में जीता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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