जागृति

  • “एक मात्र अभिशाप है ,‘न जानना’।”
  • “जागृति कठोरता नहीं देती, जागृति करुणा देती है।”
  • “जानना तुम्हारा स्वभाव है।”
  • “पाप सोने में नहीं है, पाप पूरी तरह न जगने में है।”
  • “जो जानता है, उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा और मोह दोनों से हटकर है। जो नहीं जानता, उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा का विपरीत है। 
  • “हमें किसी भी बात पर यकीन नहीं है क्योंकि जो कुछ भी हम जानते हैं वो हमारा अपना नहीं है । उसे हमने खुद कभी जाना नहीं है । “
  • “जब आप के भीतर घमासान नहीं मचा होता तो दुनिया को जानना बड़ा सहज हो जाता है।”
  • “एक जगा हुआ, एक वास्तविक रूप से बुद्धिमान व्यक्ति जो अपनी निजता में जीता है।”
  • “जानने में कोशिश नहीं होती, सिर्फ सहज रूप से होना होता है| उपस्थिति होती है। कोशिश नहीं, उपस्थिति। पेशेंस चाहिए, एफर्ट नहीं।”
  • “जग गए हो, ये कहना बड़ी भ्रान्ति है। कोई जग जाता नहीं है। जगने की प्रक्रिया, सतत चेतना कीहै; कंटीन्यूअस अवेकनिंग। ‘जग गए हो’, जैसे स्टेटमेंट का कोई अर्थ नहीं होता। लगातार जगतेरहना होता है। क्योंकि सुलाने वाली ताकतें बहुत हैं।”
  • “दिया मात्र तब दिया है, जब उसकी उपस्थिति में दूसरा सजग हो जाये। रोशनी मात्र तबरोशनी है, जब उसकी उपस्थिति में दूसरा जान पाए, बोध पाए।”
  • “जागरण का ताप ही वृत्तियाँ जला देगा|”
  • “जागरण ही वो ताप है, जो वृत्तियों को गला देता है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं