परिवर्तन

  • “जो अपने जीवन को बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक विकास भी बाधित हो जाएगा।

    अन्दर और बाहर एक साथ चलते हैं।”

  • “जब मन बदल रहा है, तो जीवन बदलेगा।

    और जो जीवन बदलने को तैयार नहीं है, उसका मन भी नहीं बदलेगा। “

  • “तुम जब तक तुम हो, तुम्हें कुछ नया मिल कहाँ सकता है? कुछ नया, तुम्हें तब मिलेगा जब ‘तुम’ तुम ही ना रहो।”
  • “बाहरी बदलाव आंतरिक बदलाव का सहज फल है|मन बदलता है तो कर्म बदलते हैं, सूक्ष्म बदलता है तो स्थूल बदलता है|”
  • “असली आदमी वो है जो बदलाव के बीच उसको देख ले जो बदल नहीं रहा है। क्योंकि अगर तुम सिर्फ़ बदलाव को देखोगे तो जिंदगी खौफ़ में बीतेगी।”
  • “परिवर्तन का अर्थ कुछका कुछ औरहो जाना नहीं है।परिवर्तन का अर्थ है कुछका ना कुछहो जाना।”
  • “परिवर्तन है मन का मौन हो जाना।”
  • ” परिवर्तन है अनिर्भरता और अनासक्ति।”
  • “जिसने बदलने की इच्छा की वो सिर्फ़ अपने आप को सुरक्षित करता है बदलने के विरुद्ध।”

  • “नित्यता का अर्थ ही है बदलाव से मुक्ति।”
  • “जब आतंरिक व्यवस्था बदलती है तो संसार बदल जाता है।”

 

  • “जब आपा बदलता है तो संसार भी बदलता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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