कर्ताभाव

  • जो संसार में गुरु ढूंढता है उसे ढूंढ ढूंढ के भी कुछ नहीं मिलेगा। वो संसार में ढूंढेगा, और संसार में ही भटकेगा। बिरला ही होता है जो संसार को छोड़ अपने आप को देखता है, – ऐसे सुपात्र को गुरु स्वयं ही पास बुला लेता है। स्वयं को जिसने भी ईमानदारी से देखा है, उसने अपनी क्षुद्रता और अक्षमता को ही देखा है। जब तुम स्वीकार कर लेते हो कि तुमसे नहीं होगा, तब तुम विराट को मौका देते हो तुम्हारे लिए कुछ कर पाने का। समर्पण का अर्थ होता है अपने कर्ताभाव का समर्पण, इस भावना का समर्पण कि तुम अपना हित ख़ुद कर लोगे।”

 

  • “‘जो करोगे वो तुम ही करोगे’, यह श्रद्धा है, समर्पण है| ‘हमें कुछ नहीं करना’, यह अकर्ताभाव है, विरोध है| जीवन दोनों को एक साथ लेकर चलने का नाम है|”

 

  • जो हो रहा है होने दो तुम इसमें अपना कर्ताभाव लाओ। बस जो हो रहा है उन सब के साक्षी मात्र बने रहो और उनसे पूरा गुज़र जाओ।”

 

  • “जितनी तुममें श्रद्धा की कमी होगी, उतना तुम्हारा कर्ताभाव ज़्यादा होगा|”

 

  • “जितनी तुममें श्रद्धा की कमी होगी, उतना तुम्हारा कर्ताभाव ज़्यादा होगा| तुम्हें लगेगा कि “अगर मैंने नहीं किया तो मेरा क्या होगा? मुझे ही तो अपना रास्ता बनाना है| अगर मैंने अपनी परवाह नहीं की, तो कौन करेगा? दुनिया में दुश्मन हैं, मुझे अपनी रक्षा करनी है| मैं एक ऐसी जगह पर आ गया हूँ जो शत्रुवत है|”

    उसको ये नहीं लगता है कि अस्तित्व उसका मित्र है| उसको ये नहीं लगता कि कुछ ना कुछ प्रबंध तो हो ही जाएगा| उसको ये नहीं लगता कि आकस्मिक तौर पर ही सही, कहीं ना कहीं से उसे मदद मिल ही जाएगी| उसको ये लगता है कि आकस्मिक हमला और दुर्घटना ज़रूर हो सकते हैं पर आकस्मिक मदद नहीं मिल सकती |”

 

  • “जब तुम्हें कुछ न कुछ करना ही है, तो तुम कुछ ऐसा करो, जो तुम्हें सत्य की याद दिलाता हो। जो तुम्हें मुक्ति के करीब ले जाता हो।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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