कर्म

  • जिसके लिए भविष्य जीवित है, वो कर्मफ़ल से मुक्त नहीं हो सकता।”

 

  • असुरक्षा के भाव से किये गए हर कर्म से हम ये उम्मीद करते हैं कि उससे सुरक्षा मिल जायेगी। बिना डर के तो हमें साँस लेना भी नहीं आता।”

  • जहाँ समय है, वहाँ कर्मफल है। शरीर और मन, दोनों पर कर्मफल का असर होता है। शरीर पर स्थूल रूप से दिखाई देता है और मन पर सूक्ष्म रूप से। इसमें कोई अपवाद संभव नहीं है। अतः शरीर और मन दोनों को कर्मफल भुगतना ही होगा।”

 

  • कर्मफल उसी के लिए है जो इससे भागना चाहता है। तुम इसका विरोध करो तो तुम कर्मफल, प्रारब्ध से मुक्त हो जाओगे।”

 

  • कर्मफल मिलता नहीं, ग्रहण किया जाता है।”

 

  • आत्मविचार है अपनी ओर जाना। जब ‘क्या कर रहे हैं’ तक ईमानदारी से जाते हैं तो करने वाले तक पहुँच जाते हैं। कर्म से नज़दीकी कर्ता से भी परिचय करा देती है। आत्म विचार सारे अन्य विचारों को विगलित करता है। अतः बोध में विचार- यानि कि आप –बचते ही नहीं।”

 

  • करनी के दो अलग अलग स्त्रोत हैं: गुरु और चेला, आत्मा और मन। गुरु का कर्म: निष्काम कर्म चेले का कर्म: सकाम कर्म कर्म का उद्गम यदि गुरु है तो चेला कर्ता भासित भले ही होगा, पर कर्म निष्काम होगा।”

 

  • भूल का कोई सुधार नहीं होता। कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे। आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है। भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।”

 

  • जो हो रहा है होने दो तुम इसमें अपना कर्ताभाव लाओ। बस जो हो रहा है उन सब के साक्षी मात्र बने रहो और उनसे पूरा गुज़र जाओ।” 

 

  • “कर्म का भी उद्धेश्य यही है कि आप अपने ज्ञान-रूप को पहचान लें। पर अगर कर्म अपने आप में बस एक चक्र बन गया है, वो ज्ञान की तरफ़ नहीं ले जा रहा, तो वो कर्म फ़िज़ूल है।”

 

  • “काम को पूरी सच्चाई से चुनो और फिर उसमें निर्विकल्प होकर डूब जाओ।”

 

  • “जब तुम्हें कुछ न कुछ करना ही है, तो तुम कुछ ऐसा करो, जो तुम्हें सत्य की याद दिलाता हो। जो तुम्हें मुक्ति के करीब ले जाता हो।”

 

  • “कर्म फ़ल बनाना एक नयी कहानी को जन्म देने के समान है।

 

  • “जब कर्म फल की अभीप्सा नहीं होती है तो कर्मफल विलुप्त हो जाता है।”

 

  • “तुम अगर कर्म में डूबे हुए हो तो कर्म अपने आप हो जाएगा।”

 

  • “बिना फ़ल की उम्मीद के आप एक कदम नहीं बढ़ा सकते क्यूँकी आपका मन अपूर्णता के भाव के कारण लगातार किसी मंजिल की तलाश में है।”

 

  • “ज़िम्मेदारी का मतलब होता हैउचित कर्म।”

 

  • “जीवन में कार्य-कारण का इतना विराट तंत्र चल रहा है कि कौनसी चीज़ कहाँ जाकर के क्या असर कर देगी हमें नहीं पता। इसीलिए न कृष्ण कहते हैं कि तुम कर्मफल पर अपना अधिकार मानों ही मत। कर्मफल इतनी ज़्यादा विविध बातों से, इतने अनंत कारणों से निर्धारित होता है कि उसका तुम्हें कुछ पता नहीं चल सकता कि कर्मफल कहाँ से आया और क्यों आया। उसके पीछे बहुत-बहुत सारे कारक हैं।तो अपना काम करो, जो तुम्हारा धर्म है।”

 

  • “कर्म फ़ल मिलता नहीं हैग्रहण किया जाता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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