गुरु

  • असली गुरु कौन? जिसे तुम कोशिश के बाद भी त्याग पाओ।”

 

  • गुरु जब साफ़ करता है, तब मैल ही नहीं धुलता, कपड़ा भी घुल जाता है। तुम नग्न हो जाते हो। पहले तुम्हें तीन पृथक इकाई दिखते हैं – तुम, गुरु और परमात्मा।”

 

  • गुरु जब साफ़ करता है, तब मैल ही नहीं धुलता, कपड़ा भी घुल जाता है। तुम नग्न हो जाते हो। पहले तुम्हें तीन पृथक इकाई दिखते हैं – तुम, गुरु और परमात्मा। जब मैल धुल जाता है तब अलग-अलग दिखना बंद हो जाता है। तुम, गुरु, परमात्मा सब एक हो जाते हैं।”

 

  • गुरु का काम होता है आपको आपसे रूबरू कर देना।”

 

  • बड़ी से बड़ी मूर्खता यह है कि हम व्यापारियों को गुरु बना लेते है। इनका स्थान बाज़ार में है, मंदिर में नहीं। इनको आदर्श मत बना लेना। मंदिर बाज़ारू नहीं होता।”

 

  • वैज्ञानिक से विज्ञान सीखो। व्यापारी से व्यापार सीखो। पर जीवन या तो जीवन से सीखो या गुरु से।”

 

  • गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो तुम्हें पैदा करता है।”

 

  • कुविचार: मेरी विचारणा से मेरी समस्या का समाधान हो जाएगा। सुविचार: विचारों की भीड़ और उनका द्वन्द ही तो समस्या है। गुरु: जो कुविचार छोड़ सुविचार की ओर ले जाये।”

 

  • आत्मा गुरु है और मन चेला। इनके अलावा कभी कोई गुरु हुआ है कोई चेला।”

 

  • योगभ्रष्ट कौन? जो शिष्य तो बना, पर गुरुता को उपलब्ध हो पाया।”

 

  • गुरु कौन? जो उपाय जाने। जो तुम्हारी चालाकी से ज़्यादा चालाक हो।”

 

  • समर्पण तुम्हें करना है। गुरु मात्र एक विधि है, जिसके सामने तुम अपनी बीमारियाँ रख सको – समर्पित कर सको। तुम बीमारी से मुक्त हो जाओ और गुरु बीमारी से अप्रभावित रह जाए।”

 

  • शुद्धतम रूप से गुरु बोध मात्र है। आत्मज्ञान, आत्मविचार ही आत्मबोध बन सकता है। आत्मविचार में जब तुम अपने आप को देखते हो, तभी संभव होता है गुरु का तुम्हारे लिए कुछ कर पाना। जो स्वयं को देखने को राज़ी नहीं, गुरु उसके लिए कुछ नहीं कर पायेगा। गुरु ही प्रेरणा देता है आत्मविचार की, और आत्मविचार का आखिरी फल होता है आत्मबोध – यानि गुरु की प्राप्ति। गुरु से ही आदि, गुरु पर ही अंत; गुरु ही है आत्मा अनंत।”

 

  • जो संसार में गुरु ढूंढता है उसे ढूंढ ढूंढ के भी कुछ नहीं मिलेगा। वो संसार में ढूंढेगा, और संसार में ही भटकेगा। बिरला ही होता है जो संसार को छोड़ अपने आप को देखता है, – ऐसे सुपात्र को गुरु स्वयं ही पास बुला लेता है। स्वयं को जिसने भी ईमानदारी से देखा है, उसने अपनी क्षुद्रता और अक्षमता को ही देखा है। जब तुम स्वीकार कर लेते हो कि तुमसे नहीं होगा, तब तुम विराट को मौका देते हो तुम्हारे लिए कुछ कर पाने का। समर्पण का अर्थ होता है अपने कर्ताभाव का समर्पण, इस भावना का समर्पण कि तुम अपना हित ख़ुद कर लोगे।”

 

  • सूना और नीरस जीवन जीते शर्म नहीं आती, गुरु की बात मानने में शर्म आती है।”

 

  • गुरु सत्य और संसार के बीच की सीढ़ी है।”

 

  • गुरु लक्ष्य भी बताएंगे और मार्ग भी। हमें तो न ‘राम’ का पता है, उस तक पहुँचने का मार्ग। हमारे लिए तो जो ‘राम’ है, वह बस हमारी कल्पना में ही है।”

 

  • माँ-बाप का भला करने के लिए सबसे पहले ‘बेटे’ को मरना होगा। ‘बेटा’ रहकर कोई माँ-बाप का भला नहीं कर पाया है। ‘बेटा’ मरेगा तभी उसमें गुरु दिख पाएगा।”

 

  • गुरु के शब्दों से नहीं सीखा जाता, उसके शब्दों के पीछे के मौन से सीखा जाता है ।”

 

  • “गुरु अगर गुरु है, तो सदा गुरु ही है, उसकी गुरुता अविच्छिन्न है।”

 

  • “गुरु की गुरुता को मुट्ठी में कैद करोगे तो गुरु से भी कुछ नहीं पाओगे।”

 

  • “मन की ओर की यात्रा का संकेत कौन दे? वो गुरु| और वो यात्रा जहाँ जा के ख़त्म हो वो जगह कौन सी? गुरु।”

 

  • “गुरु वो जो कुविचार को छोड़ के तुम्हें सुविचार की ओर प्रेरित करे।”

 

  • “गुरु का शब्द सीमित नहीं है, उसकी गूँज तो हर तरफ है, कोई सुनने वाला होना चाहिए बस।”

 

  •  “वास्तव में गुरु और शिष्य का संबंध, उनके बीच एक सेतु, उनके बीच एक जुड़ाव तभी बनता है जब शिष्य को यह समझ में आ जाता है कि मैं कौन हूँ।”

 

  • “जबतक गुरु व्यक्ति है, और जबतक उसके शब्द मात्र  विचार हैं, तब तक आपका अहंकार आपको सुनने नहीं देगा। तब तक आप निर्णयता बन कर खड़े ही रहोगे। तब तक आप एक दीवार के पीछे छुप कर रहोगे, उपलब्ध हो ही नहीं पाओगे।”

 

  • “गुरु वो है जो तुम्हारी सारी गंदगी लेने को तैयार है। गुरु एक विधि है, जिसके सामने तुम जाकर अपनी सारी गंदगी छोड़ सकते हो। और वो ले लेगा। उसमें काबिलियत यह है कि वो तुम्हारी सारी गंदगी ले लेगा पर गन्दा नहीं होगा।”

 

  • “हम सोचते आये थे कि गुरुदेता है।

    मज़े की बात यह है कि देते तुमहो।

    तुम देते हो, गुरु लेता भी नहीं है।

    वो बस उसे यूँ धारण कर लेता है कि जैसे नीलकंठ।”

 

  • “सूक्ष्मतम रूप से जो बोध तुम्हारे भीतर अवस्थित है, उसी का नाम ‘गुरु’ है।”

 

  • ” मैं तुम्हारा गुरु तब हुआ, जब मैं तुम्हारे भीतर बैठा हूँ।”

 

  • “गुरु होना तो बड़ी महीन, बड़ी दैवीय, बड़ी आध्यात्मिक, बड़े प्रेम की घटना है। बिल्कुल दिल से दिल का नाता है।यहाँ कहाँ प्रेम, और कहाँ दिल और कहाँ अध्यात्म? गुरु से नियम-क़ायदे का नहीं, आँसुओं का रिश्ता होता है। वहाँ रिश्ता ही तब बनता है, जब आँसू बिल्कुल सफ़ाई कर देते हों। जैसे दिल की ज़मीन पर आँसुओं का पोंछा लगाया हो, इतनी सफ़ाई होनी चाहिए। वहाँ चालाकी और चतुराई नहीं हो सकती, वहाँ धोखेबाज़ी नहीं हो सकती।”

 

  • “गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है। वह मात्र उसको जगाता है जो तुम्हारे भीतर पहले ही मौजूद है।”

 

  • “एक गुरु से तुम्हें फ़ायदा सिर्फ़ तब होता है, जब तुम्हें उसकी गुरुता पसंद आ जाये।”

 

  • “वास्तविक गुरु को आप नहीं चुनते, वो आपको चुनता है और आपको पता भी नहीं चलेगा कि उसने आपको क्यों चुन लिया है। वो अचानक आएगा, आपके सिर पे हाथ रख देगा और चूँकि वो अचानक आएगा तो बहुत सम्भावना होती है कि आप उसे ठुकरा दो।”

 

  • “गुरु ही गुरु को जान सकता है।”

 

  • “जगा हुआ चेला ही तो गुरु है।”

 

  • “गुरु गोविन्द को पाने का ज़रिया नहीं है, गुरु ही गोविन्द हैं |”

 

  • “पहला गुरु तो जीवन है|”

 

  • “कोई भी किताब, ग्रंथ, शास्त्र, जीवंत गुरु का स्थान नहीं ले सकता।”

 

  • “गुरु का मतलब ही वही है: जिसको अपने लिए कुछ नहीं पाना। जिसकी अपनी यात्रा पूरी हो गयी है। वो अब है ही इसलिए कि दूसरों को भी कुछ मिले।”

 

  • “आत्म-विचार का फल होता है आत्म-बोध, और आत्म-बोध बोध है, और ‘गुरु’ विशुद्ध ‘बोध’ मात्र है।”

 

  • “गुरु कौन है?

    प्रकाश में प्रवेश करने की आपकी इच्छा ही गुरु है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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