गुलामी

  • “गुलाम कौन? जो अधूरी मुक्ति से राज़ी हो

 

  • “जब तक वो भीतर की चीज़ नहीं मिल जाती, तब तक आदमी बाहर के थपेड़ों का गुलाम बना रहता है।”

 

  • “या तो एक से समक्ष समर्पण कर दो, या इन सैंकड़ो, हज़ारों की गुलामी करते रहो।

 

  • “जब तक तुम बाहरी प्रभावों को ही अपना नाम देते रहोगे कि, मैं यही हूँ”, तब तक जीवन में कोई गति नहीं रहेगी, कोई गर्मी नहीं रहेगी। तब तक तुम सिर्फ़ बाहर के गुलाम रहोगे।”

 

  • “आपने गुलामी को ही आज़ादी मान लिया है, यही है आखिरी गुलामी।”

 

  • “हम जो बार-बार अपनी असमर्थता का रोना रोते हैं, वह कुछ नहीं है, हम एक बड़ा दोहरा खेल खेलना चाहते हैं। हम कहते हैं, हमारा लालच भी बरकरार रहे और हम गुलाम भी न बनें। यह अब नियमों के विपरीत बात कर रहे हैं आप। आप चाहते हैं आपका लालच भी बरकरार रहे और आपको गुलाम भी न बनना पड़े। जहाँ लालच है, वहाँ गुलामी है। जिसको गुलामी छोडनी है, उसे लालच छोड़ना होगा। अगर आप बार-बार पा रहे हैं कि आप गुलाम बन जा रहे हैं, तो देखिए कि क्या-क्या लालच है, उस लालच को हटा दीजिए और गुलामी को हटा दिया आपने।”

 

  • “तुम जिसको फ़ायदा समझते हो, वो तो तुम्हारी ग़ुलामी है।”

 

  • “मालिक बदलते रहें, इससे क्या ग़ुलामी बदल जाती है?।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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