जीवन

  • जन्म इसलिए होता है ताकि जीवन को जान सकें। जन्म अवसर है सही मायने में जीवित होने का।”

 

  • किसी के भी जीवन में शरीर और विचारों से प्रवेश करना नीचता है| किसी के जीवन में आत्मा के राजपथ से प्रवेश करना उत्तम है |”

 

  • “‘जो करोगे वो तुम ही करोगे’, यह श्रद्धा है, समर्पण है| ‘हमें कुछ नहीं करना’, यह अकर्ताभाव है, विरोध है| जीवन दोनों को एक साथ लेकर चलने का नाम है|”

 

  • जीतने का भाव इस बात की पुष्टि है कि हारने का डर है। जो जीतने की कोशिश में लगा हुआ है वह जीवन नष्ट कर रहा है क्योंकि समय तुमसे तुम्हारी हर जीत छीन लेता है। कभी कोई जीत आखिरी हुई है?”

 

  • अगर जीवन में कुछ ऐसा नहीं है जो असीम है तो हार निश्चित है।”

 

  • जीवन जीने की कला ही यह है कि उस आखिरी लक्ष्य की प्राप्ति सर्वप्रथम हो। उसको पाओ फ़िर क़दम बढ़ाओ।”

 

  • उसके एक तल पर आकार, रूप, रंग, गति, परिवर्तन, उठना-बैठना, जीवन-मृत्यु हैं, और दूसरे तल पर कुछ नहीं, मात्र बोध | उस तल पर विचार और शब्द नहीं, मात्र बोध है |”

 

  • जीवन जीने की कला: पहला तल दूसरे से मिला रहे, साकार निराकार से मिला रहे, द्वैत अद्वैत में समाहित रहे, बाहर भीतर से एक रहे |”

 

  • जीवन ऐसा हो कि विद्या और अविद्या दोनों साथ चलें, शोर और मौन एक साथ रहें | दोनों तलों को साधना है, और प्रतिपल, और एक साथ |”

 

  • संत की कहानी उसके शब्द नहीं बयां करते, संत का जीवन ही सत्य की कहानी कहता है |”

 

  • हम जीवन ऐसा जीते हैं कि हमारी हर गतिविधि को ऊर्जा भय और लोभ से ही मिलती है।”

 

  • जिन क्षणों में आप मौत के कष्ट की कल्पना कर रहे होते हैं उस समय जीवन बड़ा ही कष्टपूर्ण हो जाता है।”

 

  • हमारा जीवन मात्र वृत्तियों की अभिव्यक्ति।”

 

  • जीवन आक्रमण नहीं, रमण।”

 

  • वैज्ञानिक से विज्ञान सीखो। व्यापारी से व्यापार सीखो। पर जीवन या तो जीवन से सीखो या गुरु से।”

 

  • ज़िन्दगी में जो कुछ भी बहुत हिफ़ाज़त, रखरखाव, संरक्षण माँगता हो वो मुर्दा है। उसको बचाना छोड़ दो। वो गिर जाएगा। हिफ़ाज़त करना छोड़ दो। ज़रा अनासक्ति चाहिए, निर्मम होना पड़ता है। जीवन से प्रेम होना चाहिए तभी मुर्दा बोझ को छोड़ सकते हो। प्रेम और अनासक्ति, बोध और निर्ममता एक साथ हैं।”

 

  • जो कुछ भी जीवन से मिला है वो तो जाएगा।”

 

  • प्रेम का अर्थ- एक ऐसा मन जिसकी गति सदा आत्मा की तरफ है। प्रेमी जीवन के सब रंगों से गुज़रता है, पर आत्मा की ओर उन्मुख। आत्मा, सत्य के साथ रहना ही प्रेम है। यदि तुम्हारा प्रेम सत्य से घबराता है, तो वो प्रेम आसक्ति है, छल है मात्र।”

 

  • आप कैसे हैं और आपका जीवन कैसा है- यह एक साथ बदलता है। यह मज़ाक की बात है कि हम सत्य के समीप जाएँ, बोध को उपलब्ध हो जाएँ, और हमारा जीवन जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहे। बोध आपके जीवन को बदले इसकी आपने अनुमति दी है? जो अपने जीवन को बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक बदलाव रुक जाएगा। जो पा रहा है भीतर, वो गा रहा हो बाहर- तो उसका भीतर का बदलाव रुक जाएगा। जब मन बदल रहा है तो जीवन बदलेगा, और जो बदलाव को रोकेगा उसका मन बदलना रुक जायेगा।”

 

  • परमात्मा से प्रेम लगना बड़े सौभाग्य की बात है। लेकिन ये सौभाग्य, चुनौती और खतरा दोनों लेकर आता है: जो पायेगा उसे गाना पड़ेगा। उसे अपने रोम-रोम से अपने प्रेम की उद्घोषणा करनी पड़ेगी। और जो ये हिम्मत नहीं दिखा पायेगा वो महापाप का भागी बनेगा। दोहरा जीवन जीना विश्वासघात है, परम सत्ता के प्रति।”

 

  • आत्मा की पुकार और संसार की आसक्ति के बीच इंसान अटका रहता है जीवन भर।”

 

  • अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो।”

 

  • तुम सोचते हो कि अपनी चतुराई में तुम आपदाओं से बचने के उपाय कर रहे हो। तुम आपदाओं से बचने का इंतज़ाम नहीं, आपदाओं को इकट्ठा करते हो। जीवन भर खट-खट कर तुम अपने बुढ़ापे के कैंसर के लिए पैसा इकट्ठा करते हो, और देख नहीं पाते कि खट-खट कर तुमने कैंसर ही इकट्ठा कर लिया है।”

 

  • यह मत पूछो कि गुस्सा आने पर क्या करें। पूछो कि जीवन कैसा हो जिसमें कुंठा और क्रोध के बीज ही हों।”

 

  • जीवन के जिन पहलुओं को देखने का आपका मन नहीं करता हो, उधर ही देखिये। वहीँ देखना समाधान है।”

 

  • बौद्धिक उछाल से उठते काल्पनिक प्रश्न दागें। सवाल वो पूछिये जो व्यक्तिगत हो, क्योंकि अहंकार व्यक्तिगत होता है। आप स्वयं से ही तो त्रस्त हैं। अपने को छुपाएँ – अपने सवाल में अपने मन और जीवन को सामने लाएँ।”

 

  • खेल तो चलता रहेगा – सवाल यही है कि जीवन तुमसे खेल रहा है या तुम जीवन से?”

 

  • भूल का कोई सुधार नहीं होता। कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे। आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है। भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।”

 

  • जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता। तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी। आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।”

 

  • निकटता का अर्थ है एक ऐसा जीवन जिसमें निकटता संभव है। निकटता का अर्थ है पहचानों का मिटना, जैसे पानी का पानी से मिलना, जैसे बूंदों का अनंत सागर से एक होना। हम एक के नहीं, इसीलिए हम किसी के भी करीब नहीं जा पाते हैं।”

 

  • जीवन में जो भी कचरा है, उससे निर्भय होकर गुज़रने के लिए, साहस और श्रद्धा दोनों चाहिए।”

 

  • आत्मा सार है। संसार आत्मा का छिलका है। अपने जीवन को देखें कि उसमें कितना महत्व है सार के लिए और कितना छिलके के लिए।”

 

  • हम शरीर और मन रूप में प्रतिक्षण बदल रहे हैं। इसलिए जो अभी है, वो अभी ही जीया जा सकता है। यही जीवन है।”

 

  • मृत्यु का अर्थ है- जो था और अब नहीं रहा। जो इस बदलाव को समझ जाता है, वो मृत्यु के पार हो जाता है। वही जीवन-मुक्त हो जाता है।”

 

  • मृत्यु के तथ्य में गहराई है, विस्तार(विचार, धारणा) नहीं। हम विस्तार को गहराई के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जीवन में गहराई नहीं है, तो इसे फैला लो। मन है ही ऐसा। वह सतह-सतह पर ही दौड़ लगाता है, गहराई में प्रवेश नहीं करता। जो विस्तार में जीयेगा, उसे दुःख ही मिलेगा।”

 

  • मनुष्य जीवन इसलिए मुश्किल है क्योंकि हर क्षण सब कुछ बदल जाता है, और इसी बात से दुःख मिलता है।”

 

  • सूना और नीरस जीवन जीते शर्म नहीं आती, गुरु की बात मानने में शर्म आती है।” 
  • “जीवन का अर्थ यही है:किसकी संगति कर रहे हो? क्या काम कर रहे हो? कहाँ से कमाते हो? किसका खाते हो?क्या देखते हो? क्या पढ़ते हो? किन क्रियाओं में तुम्हारा दिन व्यतीत होता है?यही है जीवन।”
  • “जीवन जीने की कला ये है कि लहरों में उठतेगिरते भी ये एहसास हमेशा बना रहे कि लहर आनीजानी है, वास्तव में मैं समुद्र में हूँ। हाँ वो समुद्र कभी दिखाई न पड़ेगा, क्योंकि लहरों से प्रथक वो कुछ है ही नहीं।”

  • “सारा जीवन दूसरों की चाहतें पूरी करने में लगाना है या कभी ये भी जानना है कि मैं कौन हूँ?””
  • “हर धर्म का स्रोत एक है; धर्मों का धर्म, जीवन है।”
  • “जीवन ही पहला और आखिरी गुरु है । जीवन ही परम शास्त्र है जो जीवन को नहीं पढ़ते और शास्त्रों को ही पढ़ते रहते हैं वो कुछ नहीं पाएँगे ।”
  • “जीवन अभी है और पूरा है।”
  • “तुम्हारे जीवन पर जो हक पूरा दिखाते हैं,वो मौत के समय कहाँ छुप जाते हैं?”
  • “कुछ पाना नहीं है जीवन में, कुछ पाना नहीं है जीवन में। पाने लायक जो है वो पहले ही है, पाने लायक जो है वो पहले ही है जीवन में।”
  • “हम जैसा जीवन जी रहे हैं, वैसा ही जीते रहें, और साथहीसाथ उलझनों से मुक्त हो जाएँजीवन को समझ भी जाएँसत्य के समीप जाएँबोध हम में जगेमूर्ख जैसे रह जाएँ ये असंभव है।”
  • “जिसके जीवन में मुक्ति नहीं, आनंद नहीं और प्रेम नहीं, वो मुर्दा।”
  • “जीवन जितना अच्छा रहेगा, जितना शुद्ध रहेगा, तुम पाओगे कि मन को  व्यवस्थित, नियंत्रित करने की ज़रूरत अब है ही नहीं।”

 

  • “जो तुम अपनेआप को परिभाषित करोगे उसी अनुसार तुम्हारे जीवन में वरीयतायें बन जानी हैं।”

 

  • “जिसने आफ़तों में मज़ा लेना सीख लिया है, वही इस  जीवन का आनंद उठा पाते हैं।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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