तुलना

 

  • “कमी हमेशा तुलना के फ़लस्वरूप आती है।”

 

  • “तुलना को बीमारी मत बनने दो।”

  • “चित को ऐसा कर लें कि उसका तुलना करने का आधार बदल जाए। चित तुला तो रहेगा, सदा रहेगा — चित ये न तुलना करे कि कितना पाया; चित तो यह देखे कि कहीं बाँटने में तो कोई कमी नहीं रह गयी।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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