दुःख

  • जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता।”
  • बदलने की इच्छा ही विक्षिप्तता है। जो है उसके प्रवाह से छेड़खानी की कोशिश ही दुःख है।”

 

  • मैं हूँ’ का आना दुःख और ‘मैं यह हूँ’ महादुःख का आगमन है।”

 

  • सुख दुःख, आपदा संपदा, का अर्थ है, इन दोनों से गुज़र जाना। इनका विरोध नहीं करना।”

 

  • योगी कौन है? योगी वो है जो दुःख से पूरा गुज़रे, सुख से पूरा गुज़रे और दोनों से अछूता रह जाए।”

 

  • सुख का विरोध है, दुःख का विरोध है। सुख और माँगना, दुःख कम करने की मांग करना।”

 

  • “• जब दुख आए तो जहाँ हो वहीं रहना। पीछे हटना। जब सुख आये तब भी जहाँ हो वहीँ रहना। आगे बढ़ना। आगे पीछे। सुख दुःख। तुम और तुम्हारा अचल आसन।”

 

  • “• अरे, इतना ही कहा था कि सुख से मत चिपको, ये कब कहा था कि दुःख से चिपक जाओ?”

 

  • तुम ही सुख-दुःख हो।”

 

  • जहाँ सीमाएँ हैं वहाँ दुःख है।”

 

  • ये बिल्कुल झूठी बात है कि दुःख में इंसान भगवान को याद करता है। दुःख में क्या याद आता है? दुःख में हम सुख को याद करते हैं, सत्य को नहीं। दुःख का अर्थ ही है कि प्रस्तुत स्थिति की तुलना की जा रही है, किसी स्मृति या कल्पना से। दुःख में अगर सुख की याद आए, तो दुःख बचेगा ही कहाँ? हम दुःख में सुख का सुमिरन करते हैं, सत्य का नहीं।”

 

  • दुःख में उसकी याद आती है जिसकी तुलना में दुःख लग रहा हो। दुःख को यदि अपने भीतर कोई पैठ ही जाने दे, कोई अभीप्सा रहे, कल्पना रहे, तो दुःख दुःख रहेगा ही नहीं।”

 

  • जिसे सुख में सत्य याद गया, उसे दुःख भी तुरंत याद जाएगा। दुःख नहीं बचेगा और सुख भी नहीं बचेगा।”

 

  • दुखी आदमी सिर्फ यह याद करता है की कैसे बचूँ। राम नहीं चाहिए उसे। उसे दुःख से हटना है बस। समाधि नहीं पानी है, बस दुःख से त्वरित छुटकारा चाहिए।”

 

  • आध्यात्मिक मन दुःख का शिकार नहीं हो सकता।”

 

  • पाप दुःख की ज्वाला में नहीं जलते; पाप बोध की ज्वाला में जलते हैं।”

 

  • सुमिरन करने से दुःख ही नहीं छूटता, सुख-दुःख दोनो छूटते हैं। जब जाते हैं, तब दोनों एक साथ जाते हैं। मात्र सहजता बचती है।”

 

  • सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।”

 

  • हमारे दुःख का कारण है बदलाव को स्वीकार करना, इसलिए दुखी होने के लिए स्मृतियों से जुड़ाव होना चाहिये।”

 

  • मृत्यु के तथ्य में गहराई है, विस्तार(विचार, धारणा) नहीं। हम विस्तार को गहराई के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जीवन में गहराई नहीं है, तो इसे फैला लो। मन है ही ऐसा। वह सतह-सतह पर ही दौड़ लगाता है, गहराई में प्रवेश नहीं करता। जो विस्तार में जीयेगा, उसे दुःख ही मिलेगा।”

 

  • मनुष्य जीवन इसलिए मुश्किल है क्योंकि हर क्षण सब कुछ बदल जाता है, और इसी बात से दुःख मिलता है।”

 

  • विचार का उठना ही दुःख है। संसार स्वयं विचार है, तो वो दुःख कैसे मिटा सकता है?”

 

  • सुख की उम्मीद का दूसरा नाम है, दुःख।”

 

  • दुखी कौन? जिसे सुख चाहिए।”

 

  • सत्य निर्विचार में है। निर्विचार में ही सुख-दुःख से मुक्ति है।”
  • “अगर आप हर मोड़ पर दुःख पाते हो, दुःख के नए-नए कारण आपके जीवन में प्रविष्ट होते जाते हैं, तो आपको तलाश करनी पड़ेगी ईमानदारी से कि – “दुःख कहाँ है?” अन्यथा आप झूठे कारणों को निपटाते जाओगे, उनका निवारण करते जाओगे, हटाते जाओगे, और रोज़ पाओगे कि कोई नया कारण, कोई नई घटना, कोई नया व्यक्ति आ गया है, जिसके कारण आपको दुःख मिल रहा है। घटनाएँ बदलती रहेंगी, व्यक्ति बदलते रहेंगे, कायम क्या रहेगा? दुःख कायम रहेगा।”

 

  •  जो जितनी चालाकियाँ सीख लेगा, वो उतना ज़्यादा कष्ट में, दुविधा में, अन्दर बँटा बँटा सा रहेगा।”

 

  • “यह जो तुम्हारे खोपड़े का निरंतर चलते रहना है ना – यही उलझाव है। यही तुम्हारा बोझ है। यही तुम्हारा दुःख है।”

 

  • “संसार में दुःख तब है जब तुम संसार के सामने याचक की तरह खड़े रहते हो | संसार में दुःख तब है जब तुम नहीं हो और बस संसार है, और तुम्हें संसार से अपने आप को इकट्ठा करना है, निर्मित करना है, टुकड़ा-टुकड़ा | तब संसार दुःख है, अन्यथा संसार दुःख नहीं है |”

 

  • “दुःख, ‘दुःख’ क्यों है? क्योंकि आपके भीतर कोई है, जो उसे नहीं चाहता। जब मैं कह रहा हूँ कि दुःख को गहराई से अनुभव करो, तो मैं कह रहा हूँ कि उसका विरोध करो ही मत। वो जो भीतर बैठा है, जो दुःख को रोकता है, और सुख को आमंत्रित करता है, उसको हटाओ।”

 

  • “दुःख कही नहीं है, समझना बात को, स्थितियाँ हैं। दुःख तुम्हारे विरोध में है। ये बात जिसने समझ ली, बस उसने फिर समझ ही लिया सबकुछ। सब स्थितियाँ हैं।  पर तुम कुछ चाहते थे, कोई और उम्मीद लेकर बैठे थे, तो तुम स्थितियों का विरोध करते हो। इस विरोध का नाम ‘दुःख’ है।”

 

  • एक ही तथ्य है और एक ही सत्य; दूसरे की कल्पना ही दुःख है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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