दुनिया

  • अध्यात्म परमात्मा की बात बाद में है, और दुनिया की बात पहले। अध्यात्म का अर्थ है दुनिया में बेवकूफ नहीं बनना।”

 

  • डर क्या है? डर मन की वो स्थिति है जिसमें में वो सरल सम्मुख अनंत सत्य की गोद से विलग है। डर मन की वो स्थिति है जिसमें उसने अपनी ही काल्पनिक, सीमित, मर्त्य दुनिया को सत्य मान लिया है।”

 

  • आप जिस तल पर हो दुनिया आपको उसी तल पर दिखाई देगी बस आत्मा के तल पर आपको असली साधु का दर्शन हो सकता है ।”

 

  • दुनिया पैसे की अंधी दौड़ है। उसकी वजह ज़रूरतें नहीं हैं, बल्कि यह क़ि जो मैं खरीदना चाहता हूँ वह पैसे से मिलता नहीं, पर मुझे लगता है कि शायद और पैसा कमाने से ख़रीदा जा सके। ध्यान से देखो तुम्हें वास्तव में किसकी चाहत है, और क्या उसे पैसे से खरीदा जा सकता है।”

 

  • दुनिया का मतलब है संसार और समय। दुनिया समक्ष है पर वह मात्र बदलाव का प्रवाह है। आप भी इस प्रतीत होती दुनिया से अलग कुछ नहीं हैं। यह गौर से देखने के लिए करीब आना आवश्यक है।”

 

  • क्या आपको सम्पूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है? वो अकेलापन जगत से भागने का नहीं है पर एक सरल, सुन्दर अकेलापन है |”

 

  • जगत पदार्थ है, तो स्त्री वस्तु मात्र।”

 

  • जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता। तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी। आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।”

 

  • संसार क्या? जो अपने होने का खूब आभास कराता है पर पास जाने पर खोखला नज़र आता है।”

 

  • संसार में कोई नहीं जो तुम्हें अद्वैत तक ले जा सके। जो खुद द्वैत में है वो कैसे अद्वैत का पता देगा? वो तो बाधा ही बनेगा। अद्वैत तक तो तुम्हें अद्वैत ही ले जाएगा। कैसे? ऐसे द्वैतपूर्ण सवाल पूछो !”

 

  • जितना तुममें देहभाव गहरा होगा, उतना ही संसार तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण रहेगा। संसार को शून्य जानने के लिए वो दृष्टि चाहिए, जो पहले खुद को शून्य जाने।”

 

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • आत्मा की पुकार और संसार की आसक्ति के बीच इंसान अटका रहता है जीवन भर।”

 

  • संसारी आदमी को संसार का, कुछ पता नहीं होता। तभी तो वो संसारी है।”

 

  • जो संसार में गुरु ढूंढता है उसे ढूंढ ढूंढ के भी कुछ नहीं मिलेगा। वो संसार में ढूंढेगा, और संसार में ही भटकेगा। बिरला ही होता है जो संसार को छोड़ अपने आप को देखता है, – ऐसे सुपात्र को गुरु स्वयं ही पास बुला लेता है। स्वयं को जिसने भी ईमानदारी से देखा है, उसने अपनी क्षुद्रता और अक्षमता को ही देखा है। जब तुम स्वीकार कर लेते हो कि तुमसे नहीं होगा, तब तुम विराट को मौका देते हो तुम्हारे लिए कुछ कर पाने का। समर्पण का अर्थ होता है अपने कर्ताभाव का समर्पण, इस भावना का समर्पण कि तुम अपना हित ख़ुद कर लोगे।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • संसार कितना भी हावी हो जाए, तुम उससे बचने की ताकत मांगो, ‘वो’ देगा।”

 

  • आत्मा सार है। संसार आत्मा का छिलका है। अपने जीवन को देखें कि उसमें कितना महत्व है सार के लिए और कितना छिलके के लिए।”

 

  • विचार का उठना ही दुःख है। संसार स्वयं विचार है, तो वो दुःख कैसे मिटा सकता है?”

 

  • संसार से तुम्हें सुख मिल सकता है, आनंद नहीं। सुख नकली है, कल्पना है, विचार है। आनंद सत्य है, स्वभाव है।”

 

  • सद्गुरु वो जो मौजूद तो संसार में हो, पर संसार के पार ले जाए।”

 

  • गुरु सत्य और संसार के बीच की सीढ़ी है।”

 

  • हमारा संसार हमारी वृत्तियों का ही विस्तार है। इन वृत्तियों के प्रयत्न से मदद नहीं मिलेगी।”

 

  • संसार परमात्मा का छिलका है। और एक नहीं, कई छिलके, प्याज़ की तरह। और इन छिलकों के नीचे मूल कहीं छिप सा गया है।”

 

  • सत्य का ही रूप है संसार, पर संसार को ही सत्य मत मान लेना।”

 

  • संसार प्यारा है क्योंकि सत्य का रूप है। संसार से सत्य की जितनी दूरी होगी, उतना ही प्रेम की संभावना कम होगी।”

 

  • केंद्र से जुड़े होने का ही नाम सौंदर्य है और ऐसे में उसे सौंदर्य नहीं ‘नूर’ कहते हैं। ख़ूबसूरत नहीं, नूरानी बनो। संसार का मतलब है वो मन जो अलग-अलग करता है, भेद करता है, और चुनाव करता है |”

 

  • संसार का अर्थ है- आप पूर्ण रूप से किसी के हो सके, और आप पूर्ण रूप से कुछ त्याग सके| जिसको पाया उसको पाया नहीं, जिसको छोड़ा उसको छोड़ा नहीं |”

 

  • संसार वह जहाँ सब जूठा है, बाहरी है, नकली है |”

 

  • कभी ऐसा हुआ है कि आप विचारों से, संसार से अनछुए रह जाओ? जो संसार में उलझ गया वो नीच| जो अनछुआ रह गया वो उत्तम |”

 

  • जो सत्य को समर्पित है वो संसार से कैसे भाग सकता है? संसार उतना ही पूजनीय जितना उसका स्रोत |”

 

  • आत्मा पूर्ण है और संसार अपूर्ण| जो अपूर्ण है वो भी पूजनीय है, क्योंकि वह अभिव्यक्ति उसी पूर्ण की है |”

 

  • संसार को ऐसे देखना है कि उसके स्त्रोत की सुरति सदा बनी रहे |”

 

  • सत्य को देखने के कारण मैंने उस संसार को आख़िरी मान लिया जो है ही नहीं |”

 

  • संसारी कौन? संसारी वो जो संसार के विषय में पूर्णतया अज्ञानी है |”

 

  • संसार का विरोध इसलिये क्योंकि संसार की प्रकृति है प्रभावित करना, संस्कारित करना| जो संसार के आकर्षण से खिंचे और उसके डराने से डरे, वो संसार का विरोध ही कर रहा है| उस विरोध के लिए गहरा समर्पण चाहिए| तो संसार का विरोध करो ताकि तुम संसार में प्रेम से रह सको| जितना गहरा प्रेम, उतना गहरा विरोध |”

 

  • आप असली संत तक पहुँच पाओ इसलिए संसार अपने अंदर नकली संत पैदा कर लेता है |”

 

  • पाना तो तुम सत्य को ही चाहते हो पर संसार तुम्हें गलत दिशा में मोड़ देता है |”

 

  • अगर तुम्हारे पास वो धन नहीं है जो संसार से आगे जाये तो तुम महागरीब हो।”

 

  • संसार का अर्थ ही है सीमा। सीमित होने का भाव और असीमित होने की चेष्टा, इसी का नाम संसार है।”

 

  • सीमाओं को मान्यता देने के दो ही तरीके हैं। एक सीमा के अंदर रहना और दूसरा सीमा के बाहर जाना। संसार इन्हीं दोनों चेष्टाओं का नाम है।”

 

  • संसार का अर्थ ही है खुले आकाश में लकीर खींचना। जो जितनी लकीरें खींचता है, वो संसार को उतनी ही मान्यता देता है।”

 

  • बाहर और भीतर में बंटवारा हुआ तो इस घर्षण से संसार और सत्य अलग हो जाएँगे, विचार और आत्मा अलग हो जाएँगे |”

 

  • संसार में जियो पर सुरति में |”

 

  • संसारी होना है, सन्यासी होना है | दोनों अधूरे हैं | साथ हों | मौन भी, उद्गार भी; सत्य भी, संसार भी | ऐसे को संसारी-सन्यासी कहते हैं |”

 

  • संसारी-सन्यासी आपको मिलकर भी नहीं मिलेगा, और समझ भी नहीं आएगा | वह बोलते हुए मौन में रहता है और थमे-थमे दौड़ता है |”

 

  • संसार में आपकी दुर्गति होकर रहेगी अगर आप सत्य से संपृक्त नहीं”

 

  • संसार की कोई कीमत नहीं सन्यास के बिना | कितने दिन चलेंगी पत्तियां जड़ों के बिना?”

 

  • संसारी-सन्यासी सत्य के आगे समर्पित और संसार का बादशाह है |”

 

  • जो सुरति में है उसे संसार और आत्मा, दोनों उपलब्ध हो जाएँगे | संसार को लक्ष्य बनाना है, निरति को |”

 

  • योगी का पुरस्कार ही यही है कि संसार उसे भ्रांत समझे |”

 

  • हम हमेशा घर्षण में जीते हैं। हम में और संसार में निरंतर द्वन्द चल रहा होता है।”

 

  • दुनिया का मतलब है संसार और समय। दुनिया समक्ष है पर वह मात्र बदलाव का प्रवाह है। आप भी इस प्रतीत होती दुनिया से अलग कुछ नहीं हैं। यह गौर से देखने के लिए करीब आना आवश्यक है।”

 

  • संसार को जितनी धुंधली आँखों से देखोगे उतना ही संसार पुख्ता होता जाएगा। करीब आएंगे तो पाएंगे कि कुछ है ही नहीं। जब संसार नहीं, तो आप भी नहीं।”

 

  • सत्य को गौर से देखेंगे तो संसार मिटेगा, देखने वाला भी मिटेगा। और संसार के मिटने पर जो शेष बचता है वह सत्य ही है।”

 

  • जो अपने आप को संसार का ही मान कर चलता है उसे संसार की लहरों के साथ उठना-गिरना पड़ेगा। कहाँ है आपके पास ‘वो’ जो आपके पास ‘था’?”

 

  • संसार का अर्थ ही है, क्लेश, हिंसा, टुकड़े-टुकड़े, और निरंतर द्वन्द की स्थिति। धारणाओं को, मन को बचाने की लड़ाई जिसने लड़ी है वो पूर्णपराजित होगा।”

 

  • संसार की प्रकृति ही वैर है।”

 

  • सांसारिक मन सत्य को भी अपने तल पर गिरा लेता है। संसार तो कबीर को भी साहित्य से जोड़ देता है।”

 

  • संसार आध्यात्मिकता को नैतिकता के तल तक ले आता है।”

 

  • हम अपने-अपने संसार के केंद्र में हैं और ‘हम’ सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं ।”

 

  • समझदार व्यक्ति संसार को इतना भी महत्व नहीं देता कि उसका परित्याग करे।”

 

  • चलायमान संसार में अचलता की ख़ोज ही सबसे बड़ी मूर्खता है।”

 

  • जो समय ने दिया है उस पर समय का प्रभाव होगा ही। शरीर समय है। शरीर चाह कर भी समय के पार नहीं जा सकता। और मन भी समय-संसार ने दिया है।”

 

  • ऐसी इन्द्रियाँ जो संसार को पूरा-पूरा अनुभव कर पाती हैं, स्वस्थ इन्द्रियाँ कहलाती हैं। ऐसी आँखें निराकार को देखती हैं, ऐसे कान अनहद को सुनते हैं।”

 

  • संसार में साधन आपका दास है, सत्य में आप साधन के दास हो।”

 

  • सत्य और संसार दो नहीं।”

 

  • संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो।”

 

  • धार्मिकता है संसार को संसार जानना।”

 

  • “क्या ख़रीददार ?क्या व्यापारी?
    इस बाज़ार में सब भिखारी ।  

           विक्रय का लोभ न क्रय की तैयारी
           आत्मा पूरी ,पूरी शान हमारी

           उलझे यदि तो उलझन भारी
           न भूलो संसार काँटों की झाड़ी

  • “दुनिया के बारे में तुम्हारी धारणा ये है कि “दुनिया बुरी जगह है, खतरनाक जगह है| जहाँ कभी भी कोई भी अनहोनी घटना हो सकती है” और अगर तुम इस भाव के साथ जी रहे हो तो जीवन नर्क है|”

 

  • “संसार निस्सार है, ये बार-बार संतों को इसलिए बताना पड़ता है कि नकली को असली समझ कर, कहीं असली को न भूल जाओ।”

 

  • “समेट लो, तो आत्मा’, फैला दो, तो संसार।”

 

  • “संसार का अर्थ है भ्रम की पूजा।”

 

  • “दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं – एक वो, जो जानते हैं कि पूजने को कुछ है नहीं, और दूसरे वो जो भ्रम की पूजा करते हैं। इन दूसरे किस्म के लोगों का नाम है संसार।”

 

  • “संसार में जो कुछ है वो हमारी इन्द्रियों पर निर्भर है।
    इन्द्रिय, इन्द्रिय तभी तक है जब तक कि वो संसार का एहसास करातीं है।
     “

 

  •  “आपका पूरा संसार आपके शरीर पर आधारित है, इस बात को ध्यान से समझिएगा, पूरा संसार हमारा हमारे शरीर से शुरू होता है। संसार और शरीर एक ही हैंदोनों पदार्थ। 

 

  • “आप संसार को उतना ही जानते हो, जितनी आपकी इन्द्रियों की संरचना है।”

 

  • “जो कीमती है और असली है, दुनिया में नहीं मिलेगा; दुनिया में तो वही मिलेगा जो क्षुद्र है।”

 

  • “संसार आपके मन का प्रक्षेपण है ।”

 

  • “जिसे संसार मैं नहीं मिल रहा उसे कहीं नहीं मिलेगा| जिसे अभी नहीं मिल रहा, उसे कभी नहीं मिलेगा।”

 

  • “दुनिया को भी अगर बारीकी से देख लिया तो अपने आप को भी समझ जाओगे।”

 

  • “जब तक तुम अपनेआप को एक कटा हुआ हिस्सा समझोगे, दुनिया का, तब तक तुम्हारे मन में छवि हमेशा यही बनती रहेगी कि, जैसे दुनिया तुम्हारी दुश्मन है, और सब तरीके से तुम पर हमला करने चली आ रही है।”

 

  • “संसार का वास्तविक स्वरूप तो सिर्फ़ एक जगे हुए आदमी को ही दिखाई देता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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