धारणा

 

  • “तुम्हारा दुश्मन  तुम्हारा अपना मन है। तुम्हारी धारणाएँ ही दुश्मन हैं तुम्हारी।”

 

  • “यह जो तुमने जंजाल खड़ा कर रखा है ना ,धारणाओं का ,विचारों का ,अड़चनों का ,डर का ,उसको हटाओ फिर जीवन बड़े सहज रूप से बढ़ेगा, जो होना होगा वो हो जाएगा। तुम्हारी ज़रुरत भी नहीं पड़ेगी जो होना होगा वो अपने आप हो जाएगा।”

  • जहाँ पर मन अपने डरों से, अपनी धारणाओं से, अपनी व्यस्तताओं से थोड़ा हट रहा है, तब गीत जन्मता है। इसीलिए प्रेम की भाषा गीत है।”

 

  • “दुनिया के बारे में तुम्हारी धारणा ये है कि “दुनिया बुरी जगह है, खतरनाक जगह है| जहाँ कभी भी कोई भी अनहोनी घटना हो सकती है” और अगर तुम इस भाव के साथ जी रहे हो तो जीवन नर्क है।”

  • “ये भी एक बड़ी मुर्खतापूर्ण अवधारणा है कि बोधयुक्त आदमी, जगा हुआ आदमी, पत्थर हो जाता है| कि उसकी आँखें सूख जाती हैं, रो नहीं सकती| कि वो हँस नहीं सकता, कि वो नाच नहीं सकता, कि उसके भीतर कोई भाव अब उठते नहीं| ये बेवकूफी की बात है, ऐसा कुछ भी नहीं है|कृष्ण खूब नाचते हैं, दुखी भी होते हैं, हँसते भी हैं, छल भी कर लेते हैं| जो स्थिति की माँग है, वैसे ही हो जाते हैं| क्योंकि योगी हैं, आत्मा को पा लिया है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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