निर्भरता

  • “निर्भरता, मुक्ति की दुश्मन है।”
  • “जो परिणामो पर निर्भर है, वो तो हार-जीत के बीच में झूलता रहेगा; वो जीत कर भी नहीं जीतेगा, वो सदा हारा ही हुआ है क्योंकि उसकी जीत कभी आखरी नहीं होगी।”
  • “नदी यह बताती है कि अपने रास्ते खुद बनाओ, दूसरों के ऊपर निर्भर मत रहो।”

  • “जितना तुम्हारे भीतर यह भाव रहेगा कि मैं वही हूँ जैसा दूसरे मेरे बारे में सोचते हैं, या कि मैं वह हूँ जो स्थान मुझे दूसरे दे दें, उतना ज़्यादा तुम दूसरों पर निर्भर रहोगे और डरे हुए रहोगे।”

——————————————————

उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Advertisements