प्रेम

  • मूल भी तुम, फूल भी तुम, आत्मा भी तुम, जीव भी तुम| यही ज्ञान है, यही प्रेम है और यही आहिंसा है| ज्ञान जब गहरा होता है, तब प्रेम बन जाता है |”

 

  • प्रेम एक प्रवाह है- मुझसे समष्टि की ओर और समष्टि से मेरी ओर |”

 

  • संसार का विरोध इसलिये क्योंकि संसार की प्रकृति है प्रभावित करना, संस्कारित करना| जो संसार के आकर्षण से खिंचे और उसके डराने से डरे, वो संसार का विरोध ही कर रहा है| उस विरोध के लिए गहरा समर्पण चाहिए| तो संसार का विरोध करो ताकि तुम संसार में प्रेम से रह सको| जितना गहरा प्रेम, उतना गहरा विरोध |”

 

  • कुछ पाने की हर इच्छा प्रेम और मुक्ति की है| पर तुम्हें पकड़ा दिए गए हैं धारणाएं और बंधन |”

 

  • अनंतता अनंत के लिए है। प्रेम प्रेमी के लिए है मुक्ति मुक्त के लिए है। अमरता अमर्त्य के लिए है।”

 

  • जैसे ही कहा कि कुछ द्वार हरि के हैं, आप ये कह रहे हो कि बाकी सारे द्वार हरि के नहीं हैं। आपने हरि को भी विषय बना लिया, आपने हरि को विशिष्ट बना दिया। अब हरि से प्रेम मिलना असंभव है।”

 

  • “• यदि कर्त्तव्य वास्तव में विदा हुआ है तो प्रेम आएगा।”

 

  • “• प्रेम में वो वादे भी निभ जाते हैं जो किए ही नहीं।”

 

  • प्रेम – मीठे-कड़वे के परे।”

 

  • प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं।”

 

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • ज़िन्दगी में जो कुछ भी बहुत हिफ़ाज़त, रखरखाव, संरक्षण माँगता हो वो मुर्दा है। उसको बचाना छोड़ दो। वो गिर जाएगा। हिफ़ाज़त करना छोड़ दो। ज़रा अनासक्ति चाहिए, निर्मम होना पड़ता है। जीवन से प्रेम होना चाहिए तभी मुर्दा बोझ को छोड़ सकते हो। प्रेम और अनासक्ति, बोध और निर्ममता एक साथ हैं।”

 

  • प्रेम का अर्थ- एक ऐसा मन जिसकी गति सदा आत्मा की तरफ है। प्रेमी जीवन के सब रंगों से गुज़रता है, पर आत्मा की ओर उन्मुख। आत्मा, सत्य के साथ रहना ही प्रेम है। यदि तुम्हारा प्रेम सत्य से घबराता है, तो वो प्रेम आसक्ति है, छल है मात्र।”

 

  • प्रेम प्रदर्शन नहीं, सत्य का दर्शन है।”

 

  • सत्य प्रेम है, प्रेमपत्र नहीं। अपनी साखियों के माध्यम से तुम्हें जहाँ को बुला रहे हैं कबीर, वहाँ को जाओ। साखी पकड़कर मत बैठ जाओ।”

 

  • परमात्मा से प्रेम लगना बड़े सौभाग्य की बात है। लेकिन ये सौभाग्य, चुनौती और खतरा दोनों लेकर आता है: जो पायेगा उसे गाना पड़ेगा। उसे अपने रोम-रोम से अपने प्रेम की उद्घोषणा करनी पड़ेगी। और जो ये हिम्मत नहीं दिखा पायेगा वो महापाप का भागी बनेगा। दोहरा जीवन जीना विश्वासघात है, परम सत्ता के प्रति।”

 

  • प्रेम से मन बचता ही इसलिए है, प्रेम को तमाम सीमाओं में बांधता ही इसलिए है, क्योंकि अदम्य होता है प्रेम, विस्फोट होता है प्रेम। उसके आगे मन ठहर सकता है, मन के सारे तर्क। डरपोक और कायर मन के लिए प्रेम नहीं है।”

 

  • “प्रेम में माँग नहीं रखी जाती, प्रार्थना में शर्तें नहीं रखी जाती, वहाँ बस उपलब्ध हो जाते हैं। “
  • तुम्हारे मन को कोई विचलित करे, ये अन्याय है तुम्हारे साथ। रिझाने वालों को धोखेबाज़ जानना, खुश नहीं होना; रिझाना प्रेम नहीं चालबाज़ी है।”

 

  • आम मन समाज और नैतिकता से भरा होता है। इसी कारण उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम सामाजिक होता है नैतिक होता है। प्रेम बस आध्यात्मिक होता है।”

 

  • साधु का आदर करने के लिए आपने अंदर साधुता चाहिए साधु से प्रेम आत्मा से प्रेम है , परम से प्रेम है ।”

 

  • तुम्हें पक्का ही होता कि प्रेम है, तो संदेह क्यों होता?”

 

  • सतही प्रेम में विषय महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जैसे-जैसे प्रेम गहराता जाएगा, वैसे-वैसे रूप, रंग, आकार के होने का भाव ही जाता जाएगा। और केवल तभी सहज संबंध हो सकता है।”

 

  • आकर्षण एक दूरी है, वो तुम्हारे होने को और पुख्ता करता है। प्रेम तुम्हें गला देता है। निकटता सिर्फ़ प्रेम में ही संभव है।”

 

  • मन और शरीर सीमाएं हैं। इन सीमाओं का उपयोग करके कोई असीम नहीं हो सकता। प्रेम असीम है।”

 

  • संसार प्यारा है क्योंकि सत्य का रूप है। संसार से सत्य की जितनी दूरी होगी, उतना ही प्रेम की संभावना कम होगी।”
  • “अनाड़ी मन जो होता है, उसके लिए जमीन का प्रेम, जमीन से बंधे रहने की जंजीर बन जाता है।

    और जो ज्ञानी होता है, उसके लिए ज़मीन का प्रेम, आसमान में उड़ने का पंख बन जाता है।”

  • “प्रेम क्या है? प्रेम की तलाश का अंत हो जाना ही प्रेम है।”
  • “जब प्रेम ख़त्म हो जाता है, तो प्रेम की बातें शुरू हो जाती हैं। और प्रेम की बातें इस बात का पक्का सबूत हैं कि प्रेम ख़त्म है।”
  • कर्तव्य हमेशा सीमित होता है।

    प्रेम असीमित होता है।”

  • “प्रेम और धर्म एक साथ चलते हैं।

           प्रेम महाधर्म है।”

  •  प्रेम तुम्हारी एक आंतरिक स्थिति है। जिसमें तुम आनंदित हो।”
  • “प्रेम जागरूकता की मस्ती है, समझ की मस्ती।”

  •  अगर बेफ़िक्री नहीं है, बेपरवाही नहीं है, तो प्रेम नहीं है।”

  • “प्रेम माने जब किसी से यूँही बिना वजह, अकारण, निःस्वार्थ, जुड़ गए हो।

    वजह कुछ नहीं, सम्बन्ध फिर भी है। अगर वैसा कुछ भी है तुम्हारी ज़िन्दगी में तो वो प्रेम है।”

  • “दूसरे से प्रेम हो इसके लिए ज़रूरी है दूसरे से मुक्ति।”
  • “जो तुम पर निर्भर है, वो तुम्हें कभी मुक्ति नहीं दे सकता।और जो मुक्ति ना दे वो प्रेम नहीं।”
  • “प्रेम पहले आता है, फिर बोध।”

  • जहाँ प्रेम होता है, वहाँ बड़ी इच्छा नहीं होती है शुक्रिया अदा करने की|

  • प्रेम में दिया जाता है तो असीमित दिया जाता है।

  • प्रेम का यही तकाज़ा है, वो उम्मीदें नहीं रखता।

  • जो गहरा प्रेम होता है वो एक होता है, विषय कोई भी हो

  • “प्रेम अधिकार नहीं जताता, प्रेम मुक्ति देता है।”

  • प्रेम वही है जो मन को ठीक वहाँ तक स्पर्शित कर जाए जहाँ पर स्पर्श की सीमा है। जिसके आगे स्पर्श होना भी बंद हो जाता है। अन्यथा, प्रेम मात्र मानसिक रह जाएगा। अगर उसने मन की सीमाओं को जाकर छुआ नहीं, छू कर तोड़ा नहीं, छू कर गला नहीं दिया, तो प्रेम मात्र मानसिक है।

  • प्रेम वही जो आत्मा को छू जाए। आत्मा को स्पर्शित करने का अर्थ ही यही है कि ऐसी जगह जहाँ मन नहीं है। वो मन का आख़िरी छोर है। वहाँ पर कारण होते नहीं।

  • प्रेम भी गीत की तरह अतार्किक होता है, इसीलिए प्रेम की भाषा गीत है।

  • प्रेम भिगा सकता है, भिगा कर गला सकता है, आप पर छा सकता है, पर कभी भी आपके मन में समा नहीं सकता।वो सदा एक खुला आकाश है जिसमें मन बस एक छोटी सी इकाई है। वो मन में कैद नहीं किया जा सकता।वो मन का आकाश हो सकता है, मन का माहौल हो सकता है, वो मन का पूरा वातावरण हो सकता है, पर वो मन की कोई वस्तु नहीं हो सकता।

  • प्रेम क्या है?

    जो दूसरे को मुक्ति दे, वही प्रेम है।

 

  • “जहां ममता है वहाँ प्रेम नहीं हो सकता, जहां अहंता है वहाँ प्रेम नहीं हो सकता।”

 

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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