भावनाएं

  • “भावना कुछ नहीं है, भावना बस वृत्ति का प्रकट हो जाना है।”

 

  • “मन के तहखाने में जो वृत्तियाँ छिपी रहती हैं, जब वो प्रकट हो जाती हैं तो उन्हें भावना कहते हैं।”

 

  • “भावनाओं में बहने का मतलब है वृत्तियों का दास होना।”

 

  • “भावुक करके ही तुम पर कब्ज़ा किया जा सकता है।”

 

  • “दूसरों की भावनाओं को बहुत महत्व न दो, उससे पहले ज़रूरी है कि अपनी भावनाओं को महत्व न दो|”

 

  • “भावुकता कुछ नहीं है| जब विचार का असर शरीर पर दिखने लगे, तब उसे भावुकता कहते हैं|”

 

  • “जो भी कोई तुम्हें गुलाम बनाना चाहेगा, एक बात पक्की मान लेना भावुकता का प्रदर्शन ज़रूर करेगा।”

 

  • “जो इंसान खुद भिखारी नहीं होगा वो दूसरे भिखारियों के लिए भी दया की भावना नहीं रखेगा ।”

 

  • “हम दो चीज़ों में जीतें हैं: या तो हम कृपालु हो जाएँगे, या फिर बेरहम। इन दोनों ही स्थितियों में, हम जी भावनाओं में ही रहे हैं।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं