भ्रम

  • “तुम्हारे कष्ट ही प्रमाण हैं तुम्हारे भ्रमित होने का।”

 

  • “ये बड़े से बड़े भ्रमों में से एक है कि, “जीवन नहीं बदलूँगा और मन की शान्ति को भी पा लूँगा”।”

 

  • “हम रमण को भ्रमण समझ लेते हैं। भ्रमण ही है भ्रम ।”

 

  • “मैल क्या है? मैल ये भ्रम है, मैल ये भाव है कि मैं वो हूँ जो मैं अपनेआप को समझता हूँ, यही मन का मैल है, और यही मन है|”

 

  • “अपने आस-पास की दुनिया को देख लो या अपने ही मन को टटोल लो, तुम्हें यही दिखाई देगा कि कोई भी चीज़ ऐसी नहीं होती जिसमें मन लगा रह सके| कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं होता| थोड़ी देर के लिए तुम्हें भ्रम ज़रूर हो जाएगा की मन लग गया है पर भ्रम टूटेगा| और जितनी बार वो भ्रम टूटेगा उतनी बार तुम भी टूटोगा|”

 

  • “जहाँ कहीं भी अश्रद्धा रहेगी वहां अंधविश्वास को रहना ही रहना है|”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं