मन

  • मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि।”

 

  • विचार और वृत्तियाँ ही हैं मन।”

 

  • तुम अपनी चेतना की वर्तमान स्थिति ही हो।”

 

  • पापी को लक्ष्य करो, पाप को नहीं। बेहोशी में किया कर्म ही पाप है, और बेहोश मन ही पापी। जब तक बेहोश मन रहेगा, तब तक बेहोशी के पाप रहेंगे ही।”

 

  • शरीर और मन में योग्यता ही नहीं है निकट जाने की।”

 

  • मन और शरीर सीमाएं हैं। इन सीमाओं का उपयोग करके कोई असीम नहीं हो सकता। प्रेम असीम है।”

 

  • हम सब रस-भोगी हैं। सतही मन के लिए रस प्रसन्नता की उत्तेजना है और आत्मा से जुड़े मन के लिए रस आनन्द की शान्ति है।”

 

  • साधारण मन को रस अपने छोटे होने के डर में या बड़प्पन की लालसा में आता है। जो दास हो गया उसे तो बस कृष्ण के सुमिरन में ही रस आता है।”

 

  • रस विषय में नहीं, रस मन में भी नहीं। रस केंद्र में होता है, परिधि पर नहीं।”

 

  • संसार का मतलब है वो मन जो अलग-अलग करता है, भेद करता है, और चुनाव करता है |”

 

  • तथ्य से जब सत्य तक जाना हो तो स्वयं से होकर गुज़रना पड़ेगा, अपने मन को समझना पड़ेगा |”

 

  • मन पहले कहता है कि ‘नहीं’ निभाऊंगा और फिर कहता है कि ‘मैं’ निभाऊंगा| यहाँ पर अहंकार दोनों जगह कायम है| इसलिए कह रहे हैं कि तुम निभाना, हम कुछ नहीं करेंगे| जब तुम्हें उचित लगता है बुला लेना, हमसे बाधा पाओगे| हम उपलब्ध हैं सुनने के लिए| हम में बस गूंज पाओगे|”

 

  • ध्यान के अतिरिक्त मन की कोई और शक्ति नहीं |”

 

  • जो मन को मारे वो वास्तविक धन है और जो मन की असुरक्षा से निकला हो वो नकली धन है।”

 

  • मन का भटकाव शुरू हुआ है सीमित को मान्यता देने की शुरुआत से। इसीलिए मन की वापसी भी वहीं से होगी।”

 

  • जो ऊँचे से ऊँचा लक्ष्य है वो तुम्हारे भीतर है और उसे पाया ही जा चुका है। मन तब धीर है, शांत है।”

 

  • हर लक्ष्य उस आख़िरी लक्ष्य को पाने की चाह है। और वो आख़िरी लक्ष्य है मन का साफ़ होना।”

 

  • जीवन जीने की कला ही यह है कि उस आखिरी लक्ष्य की प्राप्ति सर्वप्रथम हो। उसको पाओ फ़िर क़दम बढ़ाओ।”

 

  • इंसान का मन हमेशा ऐसी सामग्री की तलाश में रहता हैं जिसमें उसके भयों और सपनों को आश्रय मिल सके।”

 

  • संतों के वचनों का आमतौर पर हम जो भी अपने मन से अर्थ करते हैं वो उल्टा ही होता है। उल्टे मन से सीधा अर्थ कभी निकल ही नहीं सकता। इन अर्थों से तो भ्रमों को बढ़ावा मिलता है। इसीलिए साईं को भी हमने अपना अहंकार बचाने का माध्यम बना लिया है।”

 

  • मन की तीन स्थितियाँ: एक: मैं सुरक्षित नहीं हूँ। दो: मैं सुरक्षित हूँ। तीसरी: रक्षा का मुद्दा ही नहीं है, विचार ही नहीं है रक्षा का।”

 

  • संसार का अर्थ ही है, क्लेश, हिंसा, टुकड़े-टुकड़े, और निरंतर द्वन्द की स्थिति। धारणाओं को, मन को बचाने की लड़ाई जिसने लड़ी है वो पूर्णपराजित होगा।”

 

  • सांसारिक मन सत्य को भी अपने तल पर गिरा लेता है। संसार तो कबीर को भी साहित्य से जोड़ देता है।”

 

  • हल्के मन में अहंकार की कोई जगह नहीं होती।”

 

  • मृत्यु के कष्ट की कल्पना मन की गहरी चाल है अपनी असुरक्षा को कायम रखने की। ऐसा मन जीवन बीमा कराएगा, मकान बनवाएगा।”

 

  • जो त्यागना है वही मन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है और यह सहजता नहीं है। आकर्षण, विकर्षण ।”

 

  • “‘मैं हूँ’ का आना दुःख और ‘मैं यह हूँ’ महादुःख का आगमन है।”

 

  • जो समय ने दिया है उस पर समय का प्रभाव होगा ही। शरीर समय है। शरीर चाह कर भी समय के पार नहीं जा सकता। और मन भी समय-संसार ने दिया है।”

 

  • जहाँ समय है, वहाँ कर्मफल है। शरीर और मन, दोनों पर कर्मफल का असर होता है। शरीर पर स्थूल रूप से दिखाई देता है और मन पर सूक्ष्म रूप से। इसमें कोई अपवाद संभव नहीं है। अतः शरीर और मन दोनों को कर्मफल भुगतना ही होगा।”

 

  • संत वो जिसके लिए मौका उठा तो बोध उठा, मौका गया तो मन शांत।”

 

  • जिस अधूरे मन से कदम उठाते हैं समर्पण के लिए, उसी अधूरे मन से भय उठता है।”

 

  • सुख क्या है? मन को उसके संस्कारों के अनुरूप विषय मिल जाना।”

 

  • मन मन को विचारे, परम को नहीं।”

 

  • ध्यान है मन का स्वरस में डूबना।”

 

  • साहसी मन समस्या को नहीं, स्वयं को सुलझाता है।”

 

  • मन की दौड़ ही मन का बंधन है।”

 

  • अवलोकन आपके हाथ में है। साक्षित्व आपके हाथ में नहीं है। मन से मन को विचारो। मन ही मन का अवलोकन करता है। मन का उचित प्रयोग यही है: खुद को देखना, दृश्य और दृष्टा को एकसाथ देखना।”

 

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • भौतिक मन श्रद्धा और अंधविश्वास को एक ही मान लेता है |”

 

  • आत्मा गुरु है और मन चेला। इनके अलावा कभी कोई गुरु हुआ है कोई चेला।”

 

  • मन गहरा समुद्र है जो डर से भरा हुआ है। इसी समुद्र को भवसागर कहते हैं, इसी के पार जाना है।”

 

  • डर बाहर कहीं नहीं होता। सारा का सारा डर मन है। पूरा मन डर है। अपने मन में पैठ कर के देखना है कि चल क्या रहा है। डर मन में है और मन डर है | मन की हरेक तरंग डर है | मानसिक गतिविधि लगातार चल रही है और उसी में हमें पैठना है |”

 

  • प्रेम का अर्थ- एक ऐसा मन जिसकी गति सदा आत्मा की तरफ है। प्रेमी जीवन के सब रंगों से गुज़रता है, पर आत्मा की ओर उन्मुख। आत्मा, सत्य के साथ रहना ही प्रेम है। यदि तुम्हारा प्रेम सत्य से घबराता है, तो वो प्रेम आसक्ति है, छल है मात्र।”

 

  • आप कैसे हैं और आपका जीवन कैसा है- यह एक साथ बदलता है। यह मज़ाक की बात है कि हम सत्य के समीप जाएँ, बोध को उपलब्ध हो जाएँ, और हमारा जीवन जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहे। बोध आपके जीवन को बदले इसकी आपने अनुमति दी है? जो अपने जीवन को बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक बदलाव रुक जाएगा। जो पा रहा है भीतर, वो गा रहा हो बाहर- तो उसका भीतर का बदलाव रुक जाएगा। जब मन बदल रहा है तो जीवन बदलेगा, और जो बदलाव को रोकेगा उसका मन बदलना रुक जायेगा।”

 

  • मन ऐसा हो जो प्रतीक्षा में भी प्रतीक्षारत रहे।”

 

  • प्रेम से मन बचता ही इसलिए है, प्रेम को तमाम सीमाओं में बांधता ही इसलिए है, क्योंकि अदम्य होता है प्रेम, विस्फोट होता है प्रेम। उसके आगे मन ठहर सकता है, मन के सारे तर्क। डरपोक और कायर मन के लिए प्रेम नहीं है।”

 

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • मन जिधर को भागता है, उसी को वो खुशी मानता है। मन सुख की तरफ नहीं भागता है, बल्कि मन जिधर को भागे वहीँ उसका सुख है। मन किधर को भागेगा, वो संस्कारों पर निर्भर करेगा।”

 

  • आध्यात्मिक मन दुःख का शिकार नहीं हो सकता।”

 

  • मन की ख्वाहिश बस यही है कि मज़ा लूँ, और सज़ा भी मिले। पर जहाँ मज़ा है, वहाँ सज़ा है।”

 

  • डर क्या है? डर मन की वो स्थिति है जिसमें में वो सरल सम्मुख अनंत सत्य की गोद से विलग है। डर मन की वो स्थिति है जिसमें उसने अपनी ही काल्पनिक, सीमित, मर्त्य दुनिया को सत्य मान लिया है।”

 

  • विज्ञापन से बचो। विज्ञापन मनोरंजन नहीं, तुम्हारे मन पर आक्रमण हैं। विज्ञापन बुद्धि के साथ धोखा और कामना के लिए न्यौता हैं।”

 

  • भागने का नाम मन है, चाहे वो किसी भी तरफ भागे।”

 

  • तुम्हारे मन को कोई विचलित करे, ये अन्याय है तुम्हारे साथ। रिझाने वालों को धोखेबाज़ जानना, खुश नहीं होना; रिझाना प्रेम नहीं चालबाज़ी है।”

 

  • जहां स्वार्थ सिद्ध हो वहां कभी आलस नहीं आता; आलस मन की स्वयं को बनाए रखने की चाल है। हमने सत्य, मुक्ति को बहुत पीछे की प्राथमिकता दी है, जहाँ सत्य और मुक्ति होंगे वहां हमें आलस जाएगा। नींद, आलस अहंकार का कवच हैं।”

 

  • आम मन समाज और नैतिकता से भरा होता है। इसी कारण उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम सामाजिक होता है नैतिक होता है। प्रेम बस आध्यात्मिक होता है।”

 

  • धन्यता – जो धन्य हो गया है। जिसे वास्तविक धन प्राप्त हो गया है। मन का आत्मा से एक हो जाना – यही धन्यता है ।”

 

  • जीवन के जिन पहलुओं को देखने का आपका मन नहीं करता हो, उधर ही देखिये। वहीँ देखना समाधान है।”

 

  • बौद्धिक उछाल से उठते काल्पनिक प्रश्न दागें। सवाल वो पूछिये जो व्यक्तिगत हो, क्योंकि अहंकार व्यक्तिगत होता है। आप स्वयं से ही तो त्रस्त हैं। अपने को छुपाएँ – अपने सवाल में अपने मन और जीवन को सामने लाएँ।”

 

  • आत्मबल इच्छाशक्ति नहीं है। इच्छा नहीं होती आत्मबल में। जब तक इच्छा का ज़ोर लगाओगे, तब तक आत्मबल की असीम ताक़त को नहीं पाओगे। इच्छाशक्ति है मन की अकड़, आत्मबल है मन का समर्पण। जब व्यक्तिगत इच्छा को ऊर्जा देना छोड़ते हो तब समष्टि का बल तुम्हारे माध्यम से प्रवाहित होता है- वह आत्मबल है।”

 

  • भूल का कोई सुधार नहीं होता। कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे। आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है। भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।”

 

  • जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता। तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी। आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।”

 

  • जो इन्द्रियों को रुचे और अहम् को ऊर्जा दे वही मन को पसंद आता है। सामान्यतः जो भी मन को अस्वीकार हो वो मन के लिए दवा साबित हो सकता है।”

 

  • मन को तुम चाहे जितना अँधेरे से भर लो, हृदय में तो प्रकाश ही है। तुम जितना भी भागोगे, ‘उससे’ कैसे बचोगे। अपने आप से दूरी बना कर कौन जी सकता है? तुम जिससे से भाग रहे हो, वही भागने की ऊर्जा देता है।”

 

  • हम शरीर और मन रूप में प्रतिक्षण बदल रहे हैं। इसलिए जो अभी है, वो अभी ही जीया जा सकता है। यही जीवन है।”

 

  • शरीर और मन समय में हैं। जहाँ समय है, वहाँ मृत्यु है।”

 

  • मृत्यु के तथ्य में गहराई है, विस्तार(विचार, धारणा) नहीं। हम विस्तार को गहराई के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जीवन में गहराई नहीं है, तो इसे फैला लो। मन है ही ऐसा। वह सतह-सतह पर ही दौड़ लगाता है, गहराई में प्रवेश नहीं करता। जो विस्तार में जीयेगा, उसे दुःख ही मिलेगा।”

 

  • दिमाग ठीक रखो सब ठीक रहेगा।”

 

  • “मन जहाँ ही जाये, वहीं  समाधि है।”

 

  •  मन को पूरी छूट दो लेकिन साथ ही साथ उसपर नज़र भी रखी जाए।”

 

  • “संसारी मन के लिए इच्छा होती है, नहीं तो अनिच्छा होती है।”

 

  • “अनाड़ी मन जो होता है, उसके लिए जमीन का प्रेम, जमीन से बंधे रहने की जंजीर बन जाता है।

    और जो ज्ञानी होता है, उसके लिए ज़मीन का प्रेम, आसमान में उड़ने का पंख बन जाता है।”

 

  • “मन की बड़ी चाह यही है, कि, “मैं जैसा चल रहा हूँ, मेरा जीवन वैसा ही चलता रहे। लेकिन इसके साथ-साथ मैं होशियार भी हो जाऊँ” – ये हो नहीं पाएगा।”

 

  • “मन ऐसा न रखो कि वह लगातार कहीं पहुँचने की इच्छा रखता हो, जिसके भीतर महत्वकांक्षाएँ भरी हुई हों। जिस पर जब इधर-उधर से आक्रमण होते हों, विषयों के, वासनाओं के, इच्छाओं, कामनाओं के, दृश्यों के, ध्वनियों के, तो वो जो जल्दी से बहक जाता हो।”
  • “जब मन बदल रहा है, तो जीवन बदलेगा।

    और जो जीवन बदलने को तैयार नहीं है, उसका मन भी नहीं बदलेगा। “

 

  • “मन की वो शक्ति जो लगातार गति करती रहती है, उसको हम ‘बुद्धि’ कहते हैं।”

 

  • “मन स्वयं ही निर्धारित करके रखता है कि मेरे साथ कितनी ज़बरदस्ती करोगे| आप नहीं निर्धारित करते।”

 

  • “मन तो प्रभावों के संकलन का नाम है, जैसे माहौल में उसे रखोगे वैसा हो जाएगा।”

 

  • “जब जानते ही हो कि मन अभी विषयों से आसक्त ही है तो उसे ऐसे विषय दो जो उसे केंद्र की ओर वापस ला सकें।”

 

  • “यह दावा करना कि मन के पार जा चुके हैं, मन की बड़ी गहरी चाल होती है।”

     

  • “आपके मन की जो गुणवत्ता है, ठीक वही गुणवत्ता आपके सम्बन्धों की होगी।”

 

  • “जिसके सम्बन्ध खराब होंउसे स्पष्ट समझना चाहिए – “मेरे मन में कुछ है, जो सड़ा हुआ है उसे आत्मशोधन करना होगा, उसे अकेले होना होगा। उसे किसी के साथ नहीं बैठना है शेयरिंग के लिए, उसे एकांत चाहिए। क्योंकि जो कुछ भी ख़राब है, वो मन में ख़राब है। मन का परिष्कार करना होगा। पर अकेले होने कि जगह आप बारबार कोशिश ये करोगे कि मैं उस व्यक्ति के साथ हो जाऊँबातचीत करूँ। उस बातचीत से निकलेगा क्या? तुमतुम हो, वोवो है, तो बातचीत नई कैसे हो जाएगी? तुम सौ बार कर लो बातचीत।पुराने रास्तों पर चल के नया परिणाम आ जाएगा क्या? नई जगह पहुँच जाओगे क्या? तुम वही जो सदा से हो, वो वही जो सदा से हैतो बातचीत में कुछ नया कहाँ से आ जाना है? एक ही चक्र में घूमते रहोगे। तुम्हें उसके साथ नहीं होना है, तुम्हें तो इस वक़्त मौन की आवश्यकता है। तुम्हें तो अकेले हो जाने की आवश्यकता है। अकेले हो जाओ, बदल जाओ।”

 

  • “मन के लिए अज्ञान के साथ भी चिपकना आसान रहता है और ज्ञान के साथ भी चिपकना आसान रहता है। पर न चिपकना बड़ा मुश्किल है। क्योंकि प्रकृति बड़ी लुभावनी है।”

 

  • “जब मन सधा हुआ नहीं रहता, तब शरीर ही अपना वैरी हो जाता है।”

 

  • “मन ठीक रखो, जीवन में सबकुछ संतुलित रहेगा।”

 

  •  साफ़ मन के साथ जो है, उसे कहते हैं, ‘सद्बुद्धि। दूषित मन के साथ जो है, उसे कहते हैं, ‘कुबुद्धि।”

 

  • “मन वो, जो पूरे संसार की रचना करता है”| तो इन्द्रियों से सामग्री को भीतर लेता है, और उन सामग्रियों से चित्र और छवियाँ रचता है| उसको कहते हैं ‘मन’|

    ‘बुद्धि’ वो, जो उन छवियों को अर्थ देती है और उनकी विवेचना करती है|

    ‘चित्त’ वो, जिसमें वो सारे अर्थ, सारी छवियाँ, सारी विवेचनाएँ, जाकर संग्रहित हो जाते हैं।”

 

  • “दिनरात जिनकी आवाज़ें सुन रहे हो और दिनरात जिनकी शक्लें देख रहे हो  वैसा ही तुम्हारा मन हो जाना है, असंभव है कि प्रभाव न पड़े।”

 

  • “मन भी निर्मल होता है क्योंकि मन ही मलिन हो सकता है।

    मात्र मन ही निर्मल हो सकता है क्योंकि मन ही मलिन हो सकता है।

    वो जो है, न निर्मल है, न मलिन है।”

 

  • “मन में विचार नहीं आते, विचार ही मन हैं। मन और विचार एक ही हैं।”

 

  • “मन और संसार दोनों विचार के अलावा और कुछ नहीं हैं।”

 

  • “मन ने जो पकड़ा सब अधूरा, मन कहाँ जान पाएगा पूरा।”

 

  • “मन ऐसा हो कि उसमें जब भी ख़याल उठें, तो साथ ही साथ यह भाव भी उठे, एक और ख़याल भी उठे, कि ख़याल व्यर्थ हैं।”

 

  • “जो जटिल चित्त होता है, उसको फ़ायदा, जटिलता से ही होता हैजटिलता ही जटिलता को काटती है और उसे सरलता की ओर ले जाती है।”

 

  • “जहाँ मन आत्मस्थ हो जाए, मात्र वही जगह मंदिर कहलाए।”

 

  • “जो मन से जन्म पाता है, वो मृत्यु भी पायेगा।जिसका आना है, उसका जाना भी होगा।”

 

  •  मन है, मन का विस्तार है, और मन का केंद्र है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। और जो कुछ है वो इन्हीं तीनो में समाया हुआ है।

 

  • मन का काम इतना ही है कि वो मन को देखे 

 

  • “आध्यात्मिक मन वो, धार आ गई है जिसमें। जो महीन से महीन भेद भी कर लेता है, और वहाँ भी स्थित रहता है जहाँ कोई भेद भी नहीं है।”

 

  • “मन सोचता सिर्फ़ उसको है, जिसको अतीत में अनुभव कर चुका है।”

 

  • “मन से जो किया जाए वो सौदा तो हो सकता है, इश्क नहीं हो सकता।”

 

  • “आपका मन कैसा है उसका सूचक आपकी रोजाना की ज़िंदगी ही है।”

 

  • “मन को आत्मा चाहिए, जैसे पक्षी को आकाश।”

 

  • “दिन-रात जिनकी आवाज़ें सुन रहे हो और दिन-रात जिनकी शक्लें देख रहे हो – वैसा ही तुम्हारा मन हो जाना है, असंभव है कि प्रभाव न पड़े।”

 

  • “मन ऐसा रखो जिसमें लालसा ही न उठे। ज़िन्दगी ठीक रखनी पड़ती है। अगर तुम दिनभर अपनी सारी वासनाओं को तूल दे रहे हो, और शाम को फिर जब बाहर निकलोगे खाना खाने, और माँस दिखाई देगा, तो क्या यह वासना भी नहीं चढ़ेगी सिर पर? इसीलिए सात्विक जीवनशैली बहुत ज़रूरी है। सात्विक जीवनशैली वही होती है जिससे विचार अपने आप शाँत रहते हैं। तुम जितना गन्दा खाना खाओगे, तुम जितने गन्दे तरीकों की बात सुनोगे, दृश्य देखोगे, साहित्य पढ़ोगे, उतना तुम्हारे मन में कुत्सित विचार उठेंगे।”

 

  • “अनाड़ी मन जो होता है, उसके लिए जमीन का प्रेम, जमीन से बंधे रहने की जंजीर बन जाता है।और जो ज्ञानी होता है, उसके लिए ज़मीन का प्रेम, आसमान में उड़ने का पंख बन जाता है।अनाड़ी मन के लिए तथ्य सिर्फ एक बंद कोठरी रह जाते हैं, मुर्दा तथ्य। और जागृत मन के लिए, यही तथ्य सत्य का द्वार बन जाते हैं। जमीन तुम्हारा बंधन भी है और तुम्हारा अवसर भी। इसी से चिपके रह गए और ध्यान न दिया और समर्पित न हुए, तो इससे बड़ा बंधन नहीं है।”

 

  • “सिर्फ़ एक विकसित मन ही दोस्ती कर सकता है।”

 

  • “तुम्हारे चित्त पर है, तुम्हारा चित्त अगर लहरा रहा है, तो उसे लहरें ही दिखाई देंगी। सब कुछ तुम्हारे ही मन में तो है, लहरें कोई बाहर थोड़ी हैं, लहराते मन के लिए लहरें हैं और शांत मन के लिए समुद्र है।”

 

  • “मन जब आत्मा में दृढ नहीं होता तब वो अपनी ही बनाई दुनिया में भटकता है।”

 

  • “मन का जो पूरा तरीका है, उसकी जो पूरी व्यवस्था है वो जानते हो क्या है? वो ये है की जो उसके पास है, उसको वो भूलता है, पर चूंकि भूलता है इसीलिए, कष्ट में आ जाता है। कष्ट में आते ही वो ढूँढ़ता है, लेकिन ढूँढता वो सही जगह पर नहीं है, गलत जगह पर ढूंढ़ता है। मन को कुछ नहीं चाहिए होती मन को शान्ति चाहिए होती है, शान्ति उसे उपलब्ध है पर उसे भूल जाता है, अशांत हो जाता है।”

 

  • “मन नासमझ ही रहना चाहता है क्योंकि मन हमेशा ही ध्यान से भागना चाहता है।”

 

  • “मन के भागने को ये मत समझ लेना कि वो कुछ पाने जा रहा है कहीं। मन हमेशा, कुछ छोड़ के कहीं और जा रहा होता है।”

 

  • “मन जैसे जैसे, सच्चाई के संपर्क में आता है, उसके साथ दो घटनाएँ घटती हैं। पहली तो ये, कि डर छोड़ता जाता है, और दूसरी ये कि क्योंकि वो डर से ही पोषण पाता था, डर पर ही ज़िंदा रहता था, तो डर छोड़ने के कारण बेचैन होता जाता है। ये तो उसको दिखता है, कि डर छोड़ा है, तो हल्कापन है। ये तो उसको दिखता है, कि ज़िम्मेदारी छोड़ी है, भविष्य की चिंता छोड़ी है, तो एक हलकापन है।”

 

  • “मन, हर उस चीज़ से डरेगा जो सीमित है।”

 

  • “हम क्या हैं? हम परतें हैं| हम एक के बाद एक कपड़ो की परतें हैं, हम आवरण की परतें हैं, हम संस्कारों की पर्ते हैं, उसको ही कपड़ा कहा जाता है, कपड़ा और कुछ नहीं है| हमारा भ्रम ये रहता है कि परतें ठीक हैं, उनमे बस थोड़ा सा कुछ गन्दा हो गया है| हमें ये समझ में नहीं आता है कि परत थोड़ी सी गंदी नहीं है, परत पूरी की पूरी ही गंदी है| तुम में दुर्गुण नहीं आ गया है, दुर्गुणों का नाम ही तुम हो|”

 

  • “बेचैनी का नाम ही तो मन है और मन से ही जगत है|”

 

  • “मन से लड़ना, मन को और ताकत दे देगा| चुप-चाप सर झुका दो हो जाएगा, उसी का नाम प्रार्थना है |”

 

  • “जो सबसे जरूरी होगा, उसमें रहोगे तो मन कहीं भागेगा नहीं|”

 

  • “स्त्रोत पर होने का मतलब होता है – जो ऊँचे से ऊँची उपलब्धि हो सकती थी, वो हमने पा ली है| मन का जो आखिरी ठिकाना हो सकता था, वो मिला ही हुआ है| आखिरी लक्ष्य पा लिया है|”

 

  • “मन छूट सकता है, मन से ढर्रे नहीं छूट सकते। उसके बाद मन को छोड़ो, उसके बाद बोलो जा जितने ढर्रो में जीना है, जी।”

 

  • “मन के अतिरिक्क्त कभी जीना सीखा नहीं, और जब तक मन से संग्लग्न रहोगे, तब तक मन की हर बीमारी, तब तक मन की हर लघुता, तुम्हारी बीमारी और तुम्हारा छोटापन बन जाएगी । यह गलत संगत का नतीजा है ।”

 

  • “खेल इस बात का नहीं होता है कि वासना उठी और उससे आसक्त हुए कि नहीं हुए। खेल इस बात का है कि मन ऐसा हो जाए कि मन में ऐसी उलटी-पुलटी बात आये ही ना।”

 

  • “‘मन की ताकत तो मन की स्त्रोत से समीपता ही है’।”

 

  • “जब पूरा मन सोया पड़ा रहे, उस समय जो जगे सो संयमी।”

 

  • “मन की कोई भी गतिविधि समय बर्बाद करना ही है क्यूँकी मन की गतिविधि के होने का अर्थ ही है ध्यान का न होना।”

 

  • “मन की ही पकड़ जब ढीली हो जाए, वही कुर्बानी है। पर मन की पकड़ ढीली तब होगी, जब मन को पहले ये दिखाई दे, कि कुछ और है जो बेशकीमती है, और मुझे उस दिशा जाना है।”

 

  • “मन तर्क की तलाश में रहता है लगातार।”

 

  • “इन्द्रियों के पीछे की इन्द्रिय है मन|”

 

  • “मन माया की ओर आकर्षित होता है क्योंकि माया पर छाप है उसकी जिससे माया आयी है ।”

                                                        ——————————————————

                  उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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