विचार

  • विचार करो, विचारों में कोई बुराई नहीं! पर शर्त ये है कि तुम्हारे विचारों के पीछे निर्विचार बैठा हो।”

 

  • उसके एक तल पर आकार, रूप, रंग, गति, परिवर्तन, उठना-बैठना, जीवन-मृत्यु हैं, और दूसरे तल पर कुछ नहीं, मात्र बोध | उस तल पर विचार और शब्द नहीं, मात्र बोध है ।”

 

 

 

  • बाहर और भीतर में बंटवारा हुआ तो इस घर्षण से संसार और सत्य अलग हो जाएँगे, विचार और आत्मा अलग हो जाएँगे |”

 

  • तुम्हारे पास ऐसा कुछ है ही नहीं जो प्रतिपल छिन नहीं रहा है। और जो प्रतिपल छिन रहा है वही तो विचार है। विचार ही है जो एक क्षण भी तुम्हारे पास नहीं रुकता।”

 

  • जब शरीर से तादात्म्य होता है तब हर भय मृत्यु का ही होता है। मृत्यु एक घटना नहीं है जो घटेगी इस शरीर के साथ। मृत्यु एक विचार है जो हर पल घट ही रहा है ।”

 

  • मन की तीन स्थितियाँ: एक: मैं सुरक्षित नहीं हूँ। दो: मैं सुरक्षित हूँ। तीसरी: रक्षा का मुद्दा ही नहीं है, विचार ही नहीं है रक्षा का।”

 

  • उन वृत्तियों से जो पैदा होता है वो नाती है, मतलब विचार और संसार।”

 

  • सत्य विचार में नहीं समाएगा।”

 

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • सोचो ज़रूर पर सोचते ही मत रह जाओ। विचार को निर्विचार में समाने दो।”

 

  • आत्मविचार है अपनी ओर जाना। जब ‘क्या कर रहे हैं’ तक ईमानदारी से जाते हैं तो करने वाले तक पहुँच जाते हैं। कर्म से नज़दीकी कर्ता से भी परिचय करा देती है। आत्म विचार सारे अन्य विचारों को विगलित करता है। अतः बोध में विचार- यानि कि आप –बचते ही नहीं।”

 

  • कुविचार: मेरी विचारणा से मेरी समस्या का समाधान हो जाएगा। सुविचार: विचारों की भीड़ और उनका द्वन्द ही तो समस्या है। गुरु: जो कुविचार छोड़ सुविचार की ओर ले जाये।”

 

  • मुक्ति का विचार उठ रहा है, यह तो ठीक है, पर यह विचार भी करो कि मुक्ति की कीमत क्या है। क्या वो कीमत देने को तैयार हो?”

 

  • शुद्धतम रूप से गुरु बोध मात्र है। आत्मज्ञान, आत्मविचार ही आत्मबोध बन सकता है। आत्मविचार में जब तुम अपने आप को देखते हो, तभी संभव होता है गुरु का तुम्हारे लिए कुछ कर पाना। जो स्वयं को देखने को राज़ी नहीं, गुरु उसके लिए कुछ नहीं कर पायेगा। गुरु ही प्रेरणा देता है आत्मविचार की, और आत्मविचार का आखिरी फल होता है आत्मबोध – यानि गुरु की प्राप्ति। गुरु से ही आदि, गुरु पर ही अंत; गुरु ही है आत्मा अनंत।”

 

  • जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता। तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी। आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • भविष्य का सपना, अगले जन्म का ही विचार है।”

 

  • विचार का उठना ही दुःख है। संसार स्वयं विचार है, तो वो दुःख कैसे मिटा सकता है?”

 

  • संसार से तुम्हें सुख मिल सकता है, आनंद नहीं। सुख नकली है, कल्पना है, विचार है। आनंद सत्य है, स्वभाव है।”

 

  • शरीर और विचार प्रबंध हैं, सदा दूरी बनाए रखने के।”
  • “वो सब विचार, ख्याल, वो सारी बातें, वो सारे भाव, जो तुम्हारे मन से उतरते ही नहीं हैं, जिनके बारे में तुम लगातार सोचते हो, जो चक्कर काटते रहते हैं भीतर, उनके प्रति चेत जाओ।”
  • “सोचने में बिलकुल कोई बुराई नहीं है। सोचना बिलकुल प्राक्रतिक बात है, स्वस्थ बात है।

    अस्वस्थता है उस विचार के साथ जुड़ जाना।”

  • “विचार परस्थितयों से जन्मते हैं।”
  • “विचार का अर्थ ही है वो जो बदल रहा हो।”
  • “सूक्ष्म विचार वो जो आत्मा के संपर्क से निकलते हैं।”
  • “जिस विचार में समय को महत्व मिल रहा हो वो सूक्ष्म नहीं हो सकता।जिस विचार में स्थान को या व्यक्ति को या रूप को या व्यक्तित्व को जगह मिल रही हो वो सूक्ष्म विचार नहीं हो सकता।”
  • “मैं जो कर रह हूँ अगर मैं उसमें डूबा हुआ हूँ, तो मुझे यह अवकाश ही कैसे मिलेगा कि मैं दूसरों के कहे हुए को सुनकर के परेशान हो जाऊँ। या कि दूसरे नहीं भी कह रहे तो अपने ही विचारों से मैं परेशान हो जाऊँ।”
  • “आत्म-विचार ही सुविचार है।”

 

  • “वितर्क काटता है अतीत को, कुतर्क काटता है यथार्थ को।”


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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

 

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