शांति

  • मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि।”

 

  • शान्ति का प्रयास ही अशांति है।”

 

  • हम सब रस-भोगी हैं। सतही मन के लिए रस प्रसन्नता की उत्तेजना है और आत्मा से जुड़े मन के लिए रस आनन्द की शान्ति है।”

 

  • साक्षित्व का अर्थ है कि सारे बदलावों के बीच में आप शांत हो।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • सीमाओं में रहना समझौता है। तुम समझौता करके शांत नहीं रह पाओगे क्योंकि सीमाओं में रहना तुम्हारा स्वभाव नहीं है।”

 

  • जो ऊँचे से ऊँचा लक्ष्य है वो तुम्हारे भीतर है और उसे पाया ही जा चुका है। मन तब धीर है, शांत है।”

 

  • मनुष्य एक तल पर अंतहीन भटकाव है और दूसरे तल पर शांत बिंदु | उसके एक तल पर गहरे से गहरा अज्ञान, अन्धकार है और दूसरे तल पर साफ़ ज्ञान की रोशनी |”

 

  • “• दिल ऐसा शान्त रहे जैसे सफ़ेद चोटी हिमालय की, और बाहर ऐसा नाच रहे जैसे चोटी से बहती पहाड़ी नदी।”

 

  • साक्षित्व का अर्थ है कि सारे बदलावों के बीच में आप शांत हो।”

 

  • विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें। यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।”

 

  • “जो स्वयं शांत हो जाता है वो बिलकुल समझ जाता है कि बाहर क्या-क्या अशांति चल रही है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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