शून्यता

  • जितना तुममें देहभाव गहरा होगा, उतना ही संसार तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण रहेगा। संसार को शून्य जानने के लिए वो दृष्टि चाहिए, जो पहले खुद को शून्य जाने।”

 

  • जब भीतर शून्यता होती है, तब बाहर तथाता होता है ।”

 

  • जब कहो कि सब वहीँ से आता है, तो कहो, ‘पूर्ण’जब कहो कि सब वहीँ घुल जाता है, तो कहो, ‘शून्य’।”

 

  • “‘शून्यता’ का अर्थ है – बोझ से खाली होना। “सिर पर कुछ लाद कर नहीं चल रहा हूँ, पाँव नहीं काँप रहें हैं, उड़-सा रहा हूँ,” – ये है शून्यता।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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