श्रद्धा

 

  • स्वयं का विसर्जन ही महादान है।”
  • भौतिक मन श्रद्धा और अंधविश्वास को एक ही मान लेता है |”

  • तुम ये इच्छा करो ही मत कि तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो तुम ये कहो कि, “जो बुरे से बुरा भी हो सकता हो, मुझमें ये सामर्थ्य हो कि उसमें भी कह सकूँ कि ठीक है, होता हो जो हो ।” लेकिन याद रखना, जो बुरे से बुरे में भी अप्रभावित रह जाए उसे अच्छे से अच्छे में भी अप्रभावित रहना होगा तुम ये नहीं कह सकते कि, “ऐसा होगा तो हम बहुत खुश हो जायेंगे, लेकिन बुरा होगा तो दुःखी नहीं होंगे ।” जो अच्छे में खुश होगा, उसे बुरे में दुःखी होना ही पड़ेगा तो अगर तुम ये चाहते हो कि तुम्हें डर लगे, कि तुम्हें दुःख सताए, कि तुम्हें छिनने की आशंका रहे तो तुम पाने का लालच भी छोड़ दो ।”

 

  • जीवन में जो भी कचरा है, उससे निर्भय होकर गुज़रने के लिए, साहस और श्रद्धा दोनों चाहिए।”

 

  • चतुराई छोड़ो, सरल हो जाओ, सहज हो जाओ, दास हो जाओ। जब सहज श्रद्धा होती है तब आप समझ को उपलब्ध हो जाते हो।”

 

  • भक्ति इस आखिरी बात का ज्ञान है कि नक़ली को नक़ली जान पाने की ताक़त नक़ली नहीं दे सकता। और जब ये ज्ञान गहरे रूप में बैठ जाता है तो सिर श्रद्धा में झुक जाता है, यही भक्ति है।”

 

  • “‘जो करोगे वो तुम ही करोगे’, यह श्रद्धा है, समर्पण है| ‘हमें कुछ नहीं करना’, यह अकर्ताभाव है, विरोध है| जीवन दोनों को एक साथ लेकर चलने का नाम है|”

 

  • जब परहेज़ में श्रद्धा नहीं तो दवाई में श्रद्धा कैसे हो सकती है?”

 

  • उस पर छोड़ना ही निभाना है |”

 

  • “जितनी तुममें श्रद्धा की कमी होगी, उतना तुम्हारा कर्ताभाव ज़्यादा होगा|”

 

  • “जब आत्मविश्वास विगलित हो जाता है, जो बचता है वो श्रद्धा कहलाती है।”

 

  • “मन अगर श्रद्धालु नहीं होगा परमात्मा के प्रति तो वो यक़ीन नहीं कर सकता, दुनिया का भी।”

 

  • “तुम कहते हो, “पुराने को तब छोड़ेंगे, पहले नया लाकर दो। गारंटी होनी चाहिए। नए को जाँच लेंगे, परख लेंगे, तब पुराने को जलने देंगे”।होता कुछ और है। जब पुराना जल जाता है, तब नया उतरकर आता है। यही तो परीक्षा है। यहीं पर तो श्रद्धा चाहिए।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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