संबंध

  • प्रतिफल की अपेक्षा ही है संबंधों का रोग।”
  • सतही प्रेम में विषय महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जैसे-जैसे प्रेम गहराता जाएगा, वैसे-वैसे रूप, रंग, आकार के होने का भाव ही जाता जाएगा। और केवल तभी सहज संबंध हो सकता है।”

 

  • हर स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद परमात्मा है| दो व्यक्तियों के बीच तभी कोई स्वस्थ संबंध संभव है यदि वो पहले परमात्मा से जुड़े हों |”

 

  • प्रेम बेहोशी का सम्बन्ध नहीं।”
  •  “आपके मन की जो गुणवत्ता है, ठीक वही गुणवत्ता आपके सम्बन्धों की होगी।”
  • “कोई भी सम्बन्ध उस दिन डर का सम्बन्ध बन जाता है, जिस दिन उसमें निर्भरता आ जाती है।”
  •  तुम जिसपर भी निर्भर हो गए, उसका और तुम्हारा रिश्ता डर का हो जाएगा और वहा प्रेम खत्म हो जाएगा।”

  • “प्रेम के सम्बन्ध में बुनियादी चीज़ होती है अपनी आतंरिक परिपूर्णता।”

  • “जब तक तुमने दूसरे का प्रभाव अपने ऊपर से हटाया नहीं, तब तक तुम्हारा दूसरे से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहीं हो सकता।”

  • “अपने में जो पूरा है सिर्फ़ वही स्वस्थ तरीके से दूसरे से जुड़ सकता है।

    अपने में पूरे रहो, फिर तुम्हारे सारे सम्बन्ध स्वस्थ होंगे, उनमें प्रेम होगा।

    फिर वो निर्भरता के और शोषण के सम्बन्ध नहीं होंगे।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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