सत्य

  • तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता।”

 

  • आँखें बंद हों तो सूरज कभी नहीं उगता।”

 

  • एक ठीक रखो, सब ठीक रहेगा।”

 

  • महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना।”

 

  • जो वास्तविक है, उसका कोई अनुभव नहीं हो सकता।”
  • हमने दुर्योधन की तरह कृष्ण (सत्य) की जगह उनकी नारायणी सेना (संसार) को चुन रखा है। और चुनाव ऐसा हो तो हार तो पक्की है ही।”

                     

  • सांसारिक मन सत्य को भी अपने तल पर गिरा लेता है। संसार तो कबीर को भी साहित्य से जोड़ देता है।”

 

  • सत्य के प्रति गहरा अप्रतिरोध और झूठ के प्रति गहरा विरोध। वस्तुतः दोनों एक ही बात हैं।”

 

  • आजा से आशय है मूल, मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो कबीर का ‘बिंदु’ है।”

 

  • हरि को विषय बनाते ही हरि तुम्हारी सुध नहीं लेंगे। सत्य, धारणाओं की सुध नहीं लेता ।”

 

  • बेचैनी आशा रूप में: कुछ मिल जाएगा। बेचैनी ममता रूप में: कुछ छूट जाए। आशा और ममता तब उठते हैं जब आप सत्य से दूर होते हैं।”

 

  • जो भी तुम इकट्ठा करोगे वो सत्य नहीं हो सकता।”

 

  • संसार में साधन आपका दास है, सत्य में आप साधन के दास हो।”

 

  • संसार में साधन आपका दास है, सत्य में आप साधन के दास हो।”

 

  • सत्य विचार में नहीं समाएगा।”

 

  • सत्य और संसार दो नहीं।”

 

  • सत्य ही वर्तता और वर्तमान ही सत्य।”

 

  • सत्य को सिर्फ़ सत्य ही जान सकता है।”

 

  • सत्य को सिर्फ़ सत्य ही जान सकता है।”

 

  • सत्य-एक, अनेक।”

 

  • पर्दों के पीछे से सत्य दिखेगा।”

 

  • सत्य अपने होने में भी है।”

 

  • प्रेम का अर्थ- एक ऐसा मन जिसकी गति सदा आत्मा की तरफ है। प्रेमी जीवन के सब रंगों से गुज़रता है, पर आत्मा की ओर उन्मुख। आत्मा, सत्य के साथ रहना ही प्रेम है। यदि तुम्हारा प्रेम सत्य से घबराता है, तो वो प्रेम आसक्ति है, छल है मात्र।”

 

  • प्रेम प्रदर्शन नहीं, सत्य का दर्शन है।”

 

  • आप कैसे हैं और आपका जीवन कैसा है- यह एक साथ बदलता है। यह मज़ाक की बात है कि हम सत्य के समीप जाएँ, बोध को उपलब्ध हो जाएँ, और हमारा जीवन जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहे। बोध आपके जीवन को बदले इसकी आपने अनुमति दी है? जो अपने जीवन को बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक बदलाव रुक जाएगा। जो पा रहा है भीतर, वो गा रहा हो बाहर- तो उसका भीतर का बदलाव रुक जाएगा। जब मन बदल रहा है तो जीवन बदलेगा, और जो बदलाव को रोकेगा उसका मन बदलना रुक जायेगा।”

 

  • सत्य प्रेम है, प्रेमपत्र नहीं। अपनी साखियों के माध्यम से तुम्हें जहाँ को बुला रहे हैं कबीर, वहाँ को जाओ। साखी पकड़कर मत बैठ जाओ।”

 

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • ये बिल्कुल झूठी बात है कि दुःख में इंसान भगवान को याद करता है। दुःख में क्या याद आता है? दुःख में हम सुख को याद करते हैं, सत्य को नहीं। दुःख का अर्थ ही है कि प्रस्तुत स्थिति की तुलना की जा रही है, किसी स्मृति या कल्पना से। दुःख में अगर सुख की याद आए, तो दुःख बचेगा ही कहाँ? हम दुःख में सुख का सुमिरन करते हैं, सत्य का नहीं।”

 

  • जिसे सुख में सत्य याद गया, उसे दुःख भी तुरंत याद जाएगा। दुःख नहीं बचेगा और सुख भी नहीं बचेगा।”

 

  • सत्य से कोई दूर होता है, पास होता है। हम जहाँ हैं वहीँ सत्य है। बस एक कदम की दूरी है। तुम जहाँ हो वहीँ जग जाओ।”

 

  • डर क्या है? डर मन की वो स्थिति है जिसमें में वो सरल सम्मुख अनंत सत्य की गोद से विलग है। डर मन की वो स्थिति है जिसमें उसने अपनी ही काल्पनिक, सीमित, मर्त्य दुनिया को सत्य मान लिया है।”

 

  • जहां स्वार्थ सिद्ध हो वहां कभी आलस नहीं आता; आलस मन की स्वयं को बनाए रखने की चाल है। हमने सत्य, मुक्ति को बहुत पीछे की प्राथमिकता दी है, जहाँ सत्य और मुक्ति होंगे वहां हमें आलस जाएगा। नींद, आलस अहंकार का कवच हैं।”

 

  • सत्य को ‘तुम’ नहीं समझ सकते हो। सत्य ही सत्य को समझ सकता है।”

 

  • संसार से तुम्हें सुख मिल सकता है, आनंद नहीं। सुख नकली है, कल्पना है, विचार है। आनंद सत्य है, स्वभाव है।”

 

  • सत्य निर्विचार में है। निर्विचार में ही सुख-दुःख से मुक्ति है।”

 

  • गुरु सत्य और संसार के बीच की सीढ़ी है।”

 

  • सत्य का ही रूप है संसार, पर संसार को ही सत्य मत मान लेना।”

 

  • संसार प्यारा है क्योंकि सत्य का रूप है। संसार से सत्य की जितनी दूरी होगी, उतना ही प्रेम की संभावना कम होगी।”

 

  • जो सत्य को समर्पित है वो संसार से कैसे भाग सकता है? संसार उतना ही पूजनीय जितना उसका स्रोत |”

 

  • सत्य को देखने के कारण मैंने उस संसार को आख़िरी मान लिया जो है ही नहीं |”

 

  • तथ्य से जब सत्य तक जाना हो तो स्वयं से होकर गुज़रना पड़ेगा, अपने मन को समझना पड़ेगा |”

 

  • झूठ जब भी आपके सामने आएगा यही कहता हुआ आएगा कि वो असली है, सत्य है |”

 

  • पाना तो तुम सत्य को ही चाहते हो पर संसार तुम्हें गलत दिशा में मोड़ देता है |”

 

  • मान्यता कह कर नहीं आती कि ‘मैं मान्यता हूँ’| वो अपने आप को सत्य बोलकर ही आती है |”

 

  • भीतर परमात्मा बैठा हुआ है, और बाहर उसके अवतार ही अवतार हैं। भीतर सत्य बैठा हुआ है और बाहर उसकी गूंज ही गूंज है।”

 

  • बाहर और भीतर में बंटवारा हुआ तो इस घर्षण से संसार और सत्य अलग हो जाएँगे, विचार और आत्मा अलग हो जाएँगे |”

 

  • संसारी होना है, सन्यासी होना है | दोनों अधूरे हैं | साथ हों | मौन भी, उद्गार भी; सत्य भी, संसार भी | ऐसे को संसारी-सन्यासी कहते हैं |”

 

  • संसार में आपकी दुर्गति होकर रहेगी अगर आप सत्य से संपृक्त नहीं |”

 

  • संसारी-सन्यासी सत्य के आगे समर्पित और संसार का बादशाह है |”

 

  • संत की कहानी उसके शब्द नहीं बयां करते, संत का जीवन ही सत्य की कहानी कहता है |”

 

  • सत्य आएगा भीतर, तो तुम्हारा मकान चरचरा जाएगा | इसीलिये तुम सत्य के लिये दरवाज़ा नहीं खोलते |”

 

  • “‘साईं’ और ‘कोई’ को समझने के लिए ‘सत्य’ और ‘संसार’ को समझना होगा।”

 

  • सत्य को गौर से देखेंगे तो संसार मिटेगा, देखने वाला भी मिटेगा। और संसार के मिटने पर जो शेष बचता है वह सत्य ही है।”

 

  • जो है, वो है ही। कुछ उसे बदल नहीं सकता। जो नित्य है, वो सत्य है। सत्य नाश्वान और परिवर्तनशील नहीं है|”

 

  • सत्य, असत्य की रक्षा क्यों करेगा? होना, होने की रक्षा क्यों करेगा?”

 

  • सत्य सिर्फ अपनी रक्षा करता है क्योंकि उसके अलावा कुछ है ही नहीं। जो सत्य की गोद में नहीं हैं वही रक्षा की माँग करते हैं ।”

 

  • जो सत्य से दूरी बना बैठे हैं, उनकी सज़ा है वो भय। वो संशय में ही जियेंगे ।”

 

  • जीज़स का शरीर मर सकता है, जीज़स का सत्य, जीज़स का तत्व नहीं मर सकता है।”

 

  • सत्य की मृत्यु नहीं हो सकती। सत्य संयोगवश हुई घटना का नाम नहीं है।”

 

  • सच क्या कभी तुम्हें भाएगा?”
  • “सोच को सच मत मान लेना। सच को आज तक किसी ने सोचा नहीं।”
  • “सच बोला नहीं जा सकता| सच में बोला जा सकता है|”
  • “दो तरह की दृष्टियाँ होती हैं, एक वो जो वस्तु और व्यक्ति देखती है, दूसरी वो जो उसी वस्तु और उसी व्यक्ति में विराट को देखती है | एक वो जो संसार-मात्र देखती है, दूसरी वो जो उसी संसार में सत्य को देखती है | संसार और सत्य अलग नहीं किये जा सकते | जिस क्षण आपने दोनों को अलग कर दिया, न संसार बचा, न सत्य बचा ।”
  • “जो सत्य के समीप होता है वो संसार पर राज करता है।”

  • “सत्य के सान्निध्य से बेहतर कोई विधि नहीं।”
  • “जो कुछ भी मानसिक है वो सत्य नहीं है।”
  • “सत्य में कोई रास्ता नहीं है पर, सत्य की तरफ जाने वाले रास्ते हैं।
  • “चीजों से दूर हुआ जाता हैसत्य से दूर नहीं हुआ जाता।”

  • “जिन्हें आवरण रखने हों, सत्य उनके लिए नहीं है। जिन्हें प्रतिष्ठा का, मर्यादा का और अपने नाम का बड़ा डर हो, जो अपनी इज्ज़त गंवाने से बड़े घबराते हों, सत्य, मुक्ति, प्रेम उनके लिए ज़रा भी नहीं है ।”

  • “तुम सीधे हो जाओ, मामला बहुत सीधा है।

    तुम सहज हो जाओ, मामला बहुत सहज है।

    कोई साहस नहीं चाहिए।

    सत्य के लिए साहस नहीं सहजता चाहिए।”

  • तथ्य सत्य का द्वार है।”

  • त्यौहार का मतलब ही यही है कि सत्य को कीमत देना।”

 

  • असत्य कुछ नहीं, सब आंशिक सत्य है

 

 

उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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