सत्संग

  • “सत्संगनित्य का संग है  वो टूट नहीं सकतावो सतत स्मृति हैवो जीवन संगीत है।

  • “सत्संग से श्रेष्ठम विधि कोई होती नहीं।”
  • “ग्रन्थों के साथ सत्संग हो सकता है, तर्क या बहस नहीं।”
  • “सत्संग का अर्थ है- ऐसा माहौल जिसमें तुम्हारा ही मन आत्मा के संग हो जाए’।”

  • सत्संग वैकुंठ तक जाने का ज़रिया नहीं है, सत्संग ही वैकुंठ है ।”

  • सत वो है, जो नित्य है!

    सत्संग का अर्थ है – नित्य के साथ होना, कुछ ‘समय’ के लिए नहीं, नित्य।”

  • “सत्संग का आत्यांतिक अर्थ तो यही है कि आत्मा का आकाश, आत्मा के आकाश के क़रीब आया और आकाश, आकाश में विलीन हो गया।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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