समझ

  • “सिखाने वाला एक है, माध्यम हज़ार।”

  • “कर्तव्य जब समझ से प्रस्फुटित होता है, तो धर्म कहलाता है।”

 

  • “सत्य को ‘तुम’ नहीं समझ सकते हो। सत्य ही सत्य को समझ सकता है।”

 

  • “मृत्यु का अर्थ है- जो था और अब नहीं रहा। जो इस बदलाव को समझ जाता है, वो मृत्यु के पार हो जाता है। वही जीवन-मुक्त हो जाता है।”
  • “किसी ने उगता हुआ सूरज देखा । किसी ने बरसात का सूरज देखा । किसी ने अमेरिका में बैठकर देखा । किसी ने अफ्रीका में बैठकर देखा । और सबने देखा सूरज लेकिन आधा-तिरछा देखा या किसी माध्यम से देखा । अब जो देखने वाले थे, वो चले गए । जिन्होंने देखा था, वो चले गये । उनकी लिखी किताबें बची हैं । किताबों में ज़िक्र किसका है- ‘सूरज का और चश्मे का’ । सूरज तो पढ़ने वाले जान नहीं पाते क्योंकि सूरज तो बताने की चीज़ नहीं है । सूरज तो अनुभव करने की चीज है । सूरज तो जान नहीं पाते । हाँ, चश्मे को जान जाते हैं ।”

 

  • “पापी को लक्ष्य करो, पाप को नहीं। बेहोशी में किया कर्म ही पाप है, और बेहोश मन ही पापी। जब तक बेहोश मन रहेगा, तब तक बेहोशी के पाप रहेंगे ही।”

 

  • “समय में कुछ भी लौटकर नहीं आता। अभी जो है, वो बदलेगा। इस बदलाव को समझने में ही ‘उसकी’ प्राप्ति है जो बदलता नहीं। इस बदलाव को जिसने जान लिया, उसका जन्म सार्थक हुआ।”

 

  • “कीमत उस शब्दकोश की नहीं जहाँ से शब्द आ रहे हैं, कीमत उस स्रोत की है जहाँ से इन शब्दों को समझने की ताक़त मिली है।”

 

  • “डिब्बा हीरे को कब पहचान पाया है? डिब्बा में इतनी ही समझ होती तो वो डिब्बा थोड़े ही रहता।”

 

  • “चतुराई छोड़ो, सरल हो जाओ, सहज हो जाओ, दास हो जाओ। जब सहज श्रद्धा होती है तब आप समझ को उपलब्ध हो जाते हो।”

 

  • “तथ्य से जब सत्य तक जाना हो तो स्वयं से होकर गुज़रना पड़ेगा, अपने मन को समझना पड़ेगा |”

 

  • “संसारी-सन्यासी आपको मिलकर भी नहीं मिलेगा, और समझ भी नहीं आएगा | वह बोलते हुए मौन में रहता है और थमे-थमे दौड़ता है |”

 

  • “‘साईं’ और ‘कोई’ को समझने के लिए ‘सत्य’ और ‘संसार’ को समझना होगा।”

 

  • “समझदार व्यक्ति संसार को इतना भी महत्व नहीं देता कि उसका परित्याग करे।”

 

  • “दो प्रकार की मूर्खताएं हैं: नकल और अकल। जो नकल करता है वो दूसरे को श्रेष्ठ मानता है, और जो अकल लगाता है, उसे अपनी बुद्धि पर भरोसा है। दोनों नासमझ हैं। न नकलची बनो न अकलची।”

 

  • “मेरी बातों को समझ के चौखटे में लाने की कोशिश मत करो। जो समझता फिरता है उसी से तो तुम्हें मुक्ति चाहिए। मत समझो, बस साथ चलो।”

  • “समय नहीं कुछ सिखाता, समझ सिखाती है|”
  • “समझ तुम्हारी अपनी है। जब‘उसको’ तुम अपना जानते हो, तो जो बाहर की बेकार की चीजें हैं, जो ज़िंदगी को भरे रहती हैं, जो बहुत समय ख़राब करती हैं, जो बहुत सारी ऊर्जा ले जाती हैं, फिर उन सबसे मोह छूटता है, फिर ज़िंदगी में एक गर्मी आती है, श्रेष्ठता आती है।”

  • “जीवित होने का अर्थ ही यही है कि जीवन को अपनी दृष्टि से देखना, अपनी समझ से जीना। जो अपनी समझ से नहीं जी सकता, वो ज़िंदा ही नहीं है, मुर्दा है। “
  • “आध्यात्मिक मन दुनिया को जितनी गहराई से समझता है उतना संसारी मन कभी भी नहीं समझ सकता।”
  •  जिसने सूक्ष्मतम को समझ लिया वो बाकी बातों के लिए बड़ा प्रवीण अपनेआप हो जाता है।”

  • “कुछ भी समझने के लिए सबसे पहले अपनी आँख साफ होनी चाहिए।”
  • “जिसको समझ में आता है वो यह भी समझ जाता है कि नासमझी महामूर्खता है।”
  • “ज़िम्मेदारी के केंद्र में समझदारी होती है ,बिना समझदारी के कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती।”

 

  • “दुनिया में सकारात्मक-नकारात्मक नहीं होते, बस दो चीज़ें होती हैं- समझ और नासमझी।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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