समाज

  • आप संत को उन तरीकों से संत जानते हो जिन तरीकों से समाज ने आपको समझा दिया है| यह समाज की चाल है ताकि आप असली तक जा पाओ| असली तो बुलाता है| वो लगातार बुलाता है |”
  • समाज नहीं, सामाजिकता है रोग।”

  • आम मन समाज और नैतिकता से भरा होता है। इसी कारण उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम सामाजिक होता है नैतिक होता है। प्रेम बस आध्यात्मिक होता है।”
  • जो उसके जैसा है, उसे वही भाता है। जो सामाजिक मंदिर की पूजा करेगा, लगातार खौफ में जिएगा ।”
  • “एक पूर्णतया धार्मिक जगत में मंदिरों के लिए कोई स्थान नहीं होगा | वहाँ अवतार भी नहीं होंगे, न पैगम्बर होंगे | क्योंकि जब हर कोई पैगम्बर है, और पत्तापत्ता अवतार है तो फिर कोई अवतार नहीं बचा | अब किसको अवतार बोलोगे ? वहाँ कोई विशेष नहीं होगा, हमने विशेष खोजे हैं | हमने प्रभुता को और प्रभु को अलग करा है |”
  • “समाज आपको कोई हानि नहीं पहुँचा सकता अगर आप जागरूक हैं।”
  • “हम जिसको ‘सभ्यता’ कहते हैं, वो और कुछ नहीं है, वो प्रकृति से नफ़रत करने की शिक्षा है।”
  • ” निष्काम दृष्टि से देखोगे, तो सत्य दिखाई देगा। सकाम दृष्टि से देखोगे तो संसार दिखाई देगा ।”
  •  “संसार ही सत्य है, आँख साफ़ करो, आँख। नज़र का बड़ा पैनापन नहीं चाहिये, नज़र की निर्दोषिता चाहिये, नज़र की मासूमियत चाहिये। नज़र का भोलापन चाहिये ।”
  • “जिस प्रकार के अपराध जिस समाज में सबसे ज्यादा होते हैं वो समाज वही है जिस ने उन बातों पर सबसे ज्यादा बंदिश लगा रखी होती है। जितना दबाओगे तुम विचार को उतनी ऊर्जा दोगे।”
  • “जो बाहर हो रहा है वही भीतर हो रहा है, जो जगत की कहानी है वही तुम्हारे घर की कहानी है |”
  • “दो बातें ध्यान रखो जिसे अपने ऊपर भरोसा होता है ना उसे दूसरों पर बहुत गुस्सा नहीं आता है क्योंकि उसपर दूसरों की बातों का प्रभाव ही नहीं पड़ता|”
  • “दुनिया की कोई ताक़त तुमसे वो नहीं करवा सकती जिस बारे में तुम्हें स्पष्टता है।”
  • “संसार क्या? जो अपने होने का आभास तो खूब कराता हो लेकिन जैसे ही करीब जा कर के ध्यान से उसे देखो तो खोखला नज़र आता हो| वही मैं है, वही संसार है, वही मन है|”
  • “जब मन आत्मा में डूबा होता है तो संसार सत्य में डूबा होता है तब सत्य में और संसार में कोई भेद नही रह जाता है|”
  • “संसारी वो जो रिकॉर्डर है, संसारी वह जो कैमरा है|”
  • “हमारी दृष्टि ऐसी है कि हम अंत्येष्टि उसी की करते हैं जो ख़ास होता है हमारा| हम तो किसी के साथ श्मशान भी तभी जाते हैं जब उससे कुछ नाता हो हमारा |”
  • “अपने आस-पास की दुनिया को देख लो या अपने ही मन को टटोल लो, तुम्हें यही दिखाई देगा कि कोई भी चीज़ ऐसी नहीं होती जिसमें मन लगा रह सके| कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं होता| थोड़ी देर के लिए तुम्हें भ्रम ज़रूर हो जाएगा की मन लग गया है पर भ्रम टूटेगा| और जितनी बार वो भ्रम टूटेगा उतनी बार तुम भी टूटोगा|”
  • “बड़ी कम्पनियाँ बड़े ऑफिस बनाती हैं| और तुम्हारे भीतर हसरत जागती है कि मैं इन बड़े-बड़े ऑफिसों में काम करूँ| और तुम ये देख ही नहीं पाते कि उन बड़े ऑफिसों से निकलते समय तुम कितने छोटे हो जाते हो| कोई बचती है तुम्हारी कीमत? जवाब दो|”
  • “स्वार्थी लोगों ने अपने स्वार्थ के खातिर खूब षड़यंत्र करा है तुम्हें तुमसे ही अनजान रखने का|”
  • “अपने करे संसार तो मिला नहीं, परमात्मा क्या मिलेगा|”
  • “इंसान की कोई हकीकत नहीं है, इंसान तो परिस्थितियों के हाथ में खिलौना है| संसार को इसीलिए कहा गया है कि संसार आईना है, दर्पण है| आप जैसे हो संसार आपको वैसे ही दिखाई देने लगता है, आप जैसे हो संसार आपके साथ वैसा ही व्यवहार करने लगता है|”
  • “जब तक उपयोगी हो, समाज तुम्हारे पीछे लगा ही रहेगा।”
  • “संसार की गहराईयों में ही सत्य पाएंगे आप; संसार से पलायन में नहीं।”
  • “संसार की, वस्तुओं की, देह की आसक्ति में जब इतना दम हो सकता है, तो तुम्हारी सत्य की जिज्ञासा में इतना दम क्यों नहीं हो सकता कि अब जो खतरा आता हो, आए, जो महल टूटते हों, टूटे, पाँव के नीचे से ज़मीन सरकती हो, सरके, जीवन का आधार दरकता हो, दरके, जो बात है, वो तो जान के रहूँगा? अपनेआप को और भुलावे में नहीं रखूँगा।”
  • “हमारा संसार हमारी वृत्तियों का ही विस्तार है, और कुछ नहीं है संसार।”
  • “जो सत्य जानता है न, वो संसार में भी सूरमा होता है। जो सत्य में जीता है, वो संसार में भी सिंह होता है।”
  • “जो सत्य जानता है न, वो संसार में भी सूरमा होता है। जो सत्य में जीता है, वो संसार में भी सिंह होता है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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