सरलता

  • चतुराई छोड़ो, सरल हो जाओ, सहज हो जाओ, दास हो जाओ। जब सहज श्रद्धा होती है तब आप समझ को उपलब्ध हो जाते हो।”

 

  • क्या आपको सम्पूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है? वो अकेलापन जगत से भागने का नहीं है पर एक सरल, सुन्दर अकेलापन है |”

 

  • पीड़ा है सहज स्वभाव से दूरी।”

 

  • बाहरी बदलाव आतंरिक बदलाव का सहज फल है।”

 

  • सतही प्रेम में विषय महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जैसे-जैसे प्रेम गहराता जाएगा, वैसे-वैसे रूप, रंग, आकार के होने का भाव ही जाता जाएगा। और केवल तभी सहज संबंध हो सकता है।”
  • “सरलता का यही अर्थ है, ‘जान जाना’ और कुछ नहीं।”

 

  • “बच्चे जैसा होकर देखिये | एक बार को यह भूल कर देखिये कि परम जैसा कुछ होता है | एक बार ये भूल कर देखिये कि वो शास्त्रों में, ग्रंथों में और मंदिरों में निवास करता है | बिल्कुल साफ़ कर दीजिये मन को, उसके बाद देखिये कि मन उसको बहते पानी में और पेड़ के पत्ते में पाता है कि नहीं पाता है | मैं आपसे कह रहा हूँ, निश्चित रूप से पायेगा |”


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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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