स्थिरता क्या है ?

श्रोता: सर, स्थिर कौन होता है?

वक्ता: गौरव(श्रोता का नाम )  कुछ भी नहीं है  जिसे हम जानते हैं जो स्थिर है|  जिसे हम जानते हैं, हमें जो कुछ भी स्थिर लगता है, वह किसी एक बिंदु से देखने पर लगता है| किसी एक सन्दर्भ में वह स्थिर लग सकता है|  फिजिक्स की भाषा में कहूँ तो किसी एक फ्रेम ऑफ़ रेफ़रेन्स’ में वह स्थिर लग सकता है|  जैसे-तुम यहाँ बैठे हो, तुम्हे यह पंखा स्थिर लग रहा है|  पर  सच तो ये है कि ये पंखा हजार किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रहा है|  चल रहा है ना ?  पृथ्वी घूम रही है, उसके साथ पंखा भी घूम रहा है, और इसकी बड़ी जबर्दस्त गति है|  पर तुम्हें यह स्थिर लग रहा है| ये आँखों का धोखा है|  तुम्हें यह स्थिर सिर्फ इसलिए लग रहा है,  क्योंकि तुम भी स्थिर नहीं हो|  जितनी गति से पंखा भाग रहा है, उतनी ही गति से तुम भी भाग रहे हो|

जो कुछ भी तुम जान सकते हो वो कभी स्थिर नहीं हो सकता| जो कुछ भी तुम देख सकते हो, छू सकते हो, सुन सकते हो, जो कुछ भी तुम्हारे मन, इंद्रियों के दायरे में आता है, वो कभी स्थिर नहीं हो सकता|  वहाँ तो लगातार गति बनी ही रहेगी| गति न हो, तो कुछ भी जानने का ही कोई उपाय नहीं है|

मन की दुनिया में जो स्थिर है, कभी उसको जाना ही नहीं जा सकता| वहाँ तो लगातार गति बनी ही रहती है|  मन ही लगातार गतिशील है|  मन जिसको कह रहा है कि मैं कुछ जान रहा हूँ, वो जानना ही अपने आप में, एक तरह की गति है, एक मूवमेंट है, एक डिस्टर्बेंस है|  एक नए विचार का जन्म है|

तो मन जिसे बोले कि स्थिर है, वो भी स्थिर नहीं|  और मन जिसे बोले अस्थिर है, स्थिर नहीं है, अस्थिर है, वो तो स्थिर नहीं ही है|  कुल बात यह है कि, जो कुछ भी हम जान सकते हैं, समझ सकते हैं, उसमें स्थिरता जैसा कुछ होता ही नहीं|  और ये स्थिरता, अस्थिरता की विपरीत नहीं है, ये कुछ और है|

ये खुला चैलेंज है, कुछ ऐसा ले आओ, जिसको तुम कह सको कि ये ‘स्थिर‘ है|  स्थिर मतलब वो, जो कभी हिलता नहीं, जिसमे कभी कोई परिवर्तन नहीं होता|  जो एक जगह पर कायम है|   कुछ ऐसा तुम पाओगे ही नहीं|  न जीवन में, न अस्तित्व में कुछ ऐसा पाओगे ही नहीं जो कायम है|  सब आना-जाना है|  गति पक्की है|  जो तुम्हें अभी लग भी रहा हो कि ये स्थिर है, जैसे ये पंखा, उसको भी तुम भली-भांति जानते हो कि ये स्थिर रहेगा नहीं|  समय आएगा और इस पंखे को उतार देगा|  ठीक|  ये पंखा हमेशा से यहाँ था नहीं और हमेशा यहाँ रहेगा नहीं|  इसकी स्थिरता जो तुम्हें लग भी रही है, कि स्थिरता है, वह झूठी है|

तो जो स्थिर लग रहा है, वह भी अस्थिर है|  और जो अस्थिर है, वह तो अस्थिर है ही|

फिर प्रश्न ये उठता है कि delete- not needed ‘स्थिरता’ शब्द का कोई मतलब भी हुआ या यह फालतू का ही शब्द है|  जब सब कुछ हिलता- डुलता ही है, सब कुछ गतिशील ही है, तो हम ये शब्द प्रयोग ही क्यों  करते हैं? इसका प्रयोग करना ही नहीं चाहिए – ‘स्थिरता’ |

स्थिर ‘है’|  तुम चूँकि सब जान सकते हो कि अस्थिर है- इसी से पता चलता है कि कुछ है, जो स्थिर भी है| अगर सब कुछ हिल-डुल रहा होता, तो तुम्हारे पास उसको ठीक-ठीक जानने का कोई तरीका नहीं था|

तुम्हारे पास, तुम्हें दिख रहा है अगर साफ-साफ कि सामने जो कुछ है वह हिल-डुल रहा है, और तुमको स्पष्ट दिख रहा है, तुम्हें भूल नहीं हो रही है, तुम्हे भ्रम नहीं हो रहा है, तो इसका अर्थ समझते हो क्या है ? अगर मुझे साफ-साफ दिख रहा है कि सामने बहुत कुछ हिल-डुल रहा है, तो इसका अर्थ है कि मैं हिल-डुल नहीं रहा हूँ|   अगर मैं भी हिल-डुल रहा होता तो मैं कभी जान नहीं सकता था कि सामने क्या हो रहा है|  सामने क्या है जिसमे गति हो रही है?

तो हमने दो बाते कहीं –

पहली – सब कुछ गतिशील है| सब कुछ अस्थिर है|

दूसरी-तुम जान सकते हो कि सब कुछ अस्थिर है|  इन दोनों बातो को जोड़ दो  तो क्या निकलता है? फिर से,

पहली बात – सब कुछ अस्थिर है|  कुछ भी ऐसा नहीं है जो अपनी जगह पर है और रहेगा भी|   लगातार गतिशील है सब कुछ|  दूसरी बात हमने कही कि तुम जान सकते हो कि सब कुछ गतिशील है| तो इन दोनों बातो को जोड़ कर क्या निकलता है ?

इन दोनों बातो को जोड़कर निकलता है कि तुम स्थिर हो| तुम्हारा जो जानना है इसी का नाम ‘स्थिरता’ है|

तुम्हारी समझ ही वह एक मात्र इकाई है जो स्थिर है, स्थिर हो सकती है, और दुनिया की, जिंदगी की तमाम चीज़ों की अस्थिरता को तुम तब तक नहीं जानोगे, जब तक तुम स्थिर नहीं हो|  जो कुछ भी तुम जान सकते हो, आँखों से, कान से,उसका स्वाभाव है अस्थिर रहना|  मूवमेंट में रहना|  और तुम्हारा स्वभाव है- स्थिर रहना|

जो कुछ भी हिल – डुल  रहा है, जान लो, वो तुम नहीं हो|  वो तुम्हारा स्वभाव नही| तुम्हारा स्वभाव, तो स्थिरता ही है|  बहुत कुछ चल रहा है दुनिया में,और तुम दौड़ भी रहे हो|  लेकिन भीतर, कुछ ऐसा बना रहे जो स्थिर रहे|  एक बिंदु ऐसा कायम रहे जो हिलता-डुलता नही|  अगर वह बिंदु है, तो समझना कि अपने स्व्भाव में जी रहे हो|

दुनिया क्या है ? जो अस्थिर रहे|  और दुनिया में तुम्हारा मन और शरीर भी शामिल हैं|

दुनिया क्या है ? जो लगातार अस्थिर रहे, और जिसमे लगातार गति रहे|  और तुम कौन ? जो लगातार स्थिर रहे|  और जो स्थिर होता है, वही दुनिया की अस्थिरता को जान पाता है|स्थिरता क्या है

फिर से-

दुनिया क्या है ? जो लगातार अस्थिर है और जिसमें लगातार बदलाव हो रहे हैं| जिसमें हमेशा कुछ न कुछ चल रहा है|  जिसमें समय है, जिसमें परिवर्तन है|  जिसमें कुछ भी हमेशा नहीं है|

और तुम कौन ?  जो इस लगातार बदलने वाली दुनिया को जान रहा है|   और जान रहा है का मतलब ये नहीं कि मैं बैठा हूँ और जान रहा हूँ|

तुम सब कुछ कर रहे हो|  दौड़ रहे हो,भाग रहे हो|  जीवन चक्र में पूरा हिस्सा ले रहे हो|  पूरी भागीदारी है|  लेकिन इस पूरी  भागीदारी के बावजूद कुछ है जो बिलकुल संयत है, जो बिलकुल शांत है, जो हिल नहीं रहा|   तुम खेल रहे हो|  मैदान में पूरी तरीके से, जान लगा कर दौड़ रहे हो, लेकिन उसके बाद भी भीतर कुछ है,जो बिलकुल शांत है|  तब तो समझना कि जीवन जीया|   तुम पूरी गतिविधि में हो, बोल रहे हो, सुन रहे हो, लिख रहे हो, विचार भी चल रहे हैं, और  इन सब चलती हुई चीज़ों के बीच में,  तुम नहीं चल रहे हो|  और तुम्हारा न चलना, किसी ‘फ्रेम ऑफ़ रेफ़रेन्स में नहीं है|  तुम्हारा न चलना पूर्ण है|  तुम्हारा न चलना वैसे ही है, जैसे कि ये कमरा|  इस कमरे में लोग आते-जाते रहते हैं, लेकिन ये कमरा कहीं नहीं आता-जाता|

तो तुम वैसे हो कि तुम्हारे भीतर सारी घटनाएं आ जा रही हैं, पर तुम स्थिर हो, जैसे ये कमरा स्थिर है|   ये कमरा तो एक दिन ढाह दिया जायेगा, पर तुम कभी नहीं ढाहे जाओगे|  उस अर्थ में कमरे से भी आगे हो|   अभी थोड़ी देर तक हम सब इतने लोग यहाँ पर रहे, कुछ देर में हम लोग यहाँ पर नहीं होंगे|  पर ये जो है – ये यहाँ ही रहेगी,  तुम वैसे हो,’स्थिर’|

तो सारी घटनाएं तुम्हारे भीतर आ रही हैं और जा रही हैं|  और तुम कायम हो|  तुम घटनाओं के साथ आ-जा नहीं रहे हो|  वही ‘स्थिरता‘ है| हां!  सब हो रहा है, हमारे सामने हो रहा है, हम जान रहें हैं कि हो रहा है|  आँख देख रही है कि हम देख रहे हैं कि आँख देख रही है, और जो कुछ देख रही हैं – वह  चलायमान है, उसमे गतिविधि है|  कान सुन रहे हैं|  पूरा शरीर गतिविधि कर रहा है, और शरीर को पूरी गतिविधि करने दो|  पूरी ऊर्जा से चल रहा है शरीर| मन पूरी ताकत से विचार में जुटा हुआ है|  हम किसी में नहीं जुटे हुए|  हम तो मौज में हैं –‘स्थिर‘|   न हिलना – न डुलना|

हिलने-डुलने का गलत मतलब नहीं निकल लेना,  हिलने-डुलने का मतलब ये नहीं हैं कि इस कमरे में कोई चीज पड़ी हुई है, वह हिल – डुल नहीं रही है|   मैं इस कमरे के फर्नीचर की बात नहीं कर रहा हूँ,  ये फर्नीचर हिलता – डुलता नहीं|   मैं पूरे कमरे की ही बात कर रहा हूँ|   ये कमरा कहीं आता – जाता  नहीं|  फर्नीचर मत समझ लेना, कि मैं तुम्हें फर्नीचर कह रहा हूँ कि हिलते – डुलते नहीं हो|  फर्नीचर तो एक दिन फिर भी बहार कर दिया जाएगा कि कहीं से आया था|  लेकिन तुम तो एक बहुत बड़े आकाश की तरह हो, जहाँ कुछ हिलता – डुलता नहीं है|  सब कुछ स्थिर है|  समझ रहे हो ? उसी को स्थिरता बोलते है|  और वह स्थिरता बहुत दूर की कौड़ी नहीं है|

अभी पिछले दो घंटों में,तुम में से बहुत सारे लोग बहुत स्थिर रहे हो|   तमाम घटनायें घटती रहीं, पर तुम अपनी जगह रहे हो|  तुमने उन सारी घटनाओं को होते हुए देखा है|   तमाम द्रश्य तुम्हारे सामने से कौंध गए हैं, तमाम शब्द तुम्हारे कानों में पड़ गए हैं,  पर तुम कायम रहे हो|

ये पिछले दो घंटे में हुआ हैं, पर इसके बाद ऐसा होगा कि नहीं ये मैं नहीं जानता|  अब वो तुम पर निर्भर करता है|   उस स्थिरता को कायम रख पाओगे कि नहीं वह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है| मैं, जो कर्म को रोक दे, उस स्थिरता की बात नहीं कर रहा|  मैं अकर्मण्यता की बात नहीं कर रहा| मैं इनर्शिया की बात नहीं कर रहा|  मैं उस स्थिरता की बात कर रहा हूँ जिसके भीतर सारी गतिविधियाँ लगातार चलती रहती है, हैं फिर भी स्थिरता नहीं टूटती|  मैं खूब तुमसे बहस कर रहा हूँ, फिर भी मेरा ध्यान न टूटे|  दिन भर में जो होता है, होता रहे, उठना, बैठना, चलना, खाना, सोना, और सब होता रहे, और पूरी ताकत से होता रहे, लेकिन फिर भी स्थिरता न टूटे|  पहले जितनी गति से होता था, उससे चार गुनी गति से हो, फिर भी स्थिरता न टूटे|  तब तो समझना कि तुमने ‘स्थिरता’ को जाना|   गहरे कर्म कि बीच भी ‘स्थिरता’ है|  ठीक है|

 – ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।


संवाद देखें: स्थिरता क्या है ?

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख २ : मूल निसंग, मस्तिष्क मात्र अंग

लेख १ : जग को साफ़ जानने के लिए मन साफ़ करो

लेख ३ : मेरा असली स्वभाव क्या है?

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय सर्वेश जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      पसंद करें

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s