सत्य के तीन तल

वक्ता : सवाल है कि सोचने बैठते हैं तो बहुत सारी बातें दिमाग में आती हैं. परस्पर विरोधी ख़याल उठते हैं . दाएं से एक ख़याल आता है तो बाएं से भी एक ख़याल आता है. एक ऊपर का ख्याल आता है तो एक नीचे का भी आता है. जो ही बात मन में आती है, उसका बिलकुल विपरीत भी आता है. तो इस स्थिति में आदमी कोई भी फैसला करे कैसे ? बस फँस के रह जाते हैं. ना आगे चल पाते हैं ना पीछे. दो कदम आगे बढ़ाते हैं तो ख्याल आता है कि शायद पीछे जाना ठीक था. और पीछे भी बहुत दूर तक नहीं जा पाते . पीछे भी बहुत दूर तक जा नहीं पाते . उसका कारण है . कारण ये है कि हमें जितने भी ख्याल आते हैं वो वास्तव में हमारे अपने हैं नहीं . वास्तव में वो हमारे अपने हैं नहीं. इतनी ताकतें हैं, हम जिनके संपर्क में आते हैं. और हर ताकत हमारे मन पे एक नयी छाप छोड़ करके चली जाती है .

श्रोता : सर जो सवाल हमारे मन में आते हैं वो हमारे हैं या फिर छाप है बाहरी, ये पता कैसे चले ?

वक्ता : ये निर्णय नहीं करना है, बात आने दो, आने दो .

श्रोता : सिर्फ खड़े हो के अपने विचारों को देखना, मैं उस स्थिति की बात कर रहा हूँ .

वक्ता : जब ये दिखने लग जाए कि सही भी मेरा नहीं है और गलत भी मेरा नहीं है तो सही और गलत दोनों ही अपना वज़न खो देते हैं. फिर ना सही में कुछ बड़ी बात रहती ना गलत में कुछ बड़ी बात रहती. फिर तो तुम्हारे ऊपर दबाव रहेगा ही नहीं कि क्या सही है क्या गलत है. मैंने तुमसे काफी बातें कही हैं, घन्टे , डेढ़ घन्टे में. इनसे बिलकुल उलटी बातें भी कहीं ना कहीं तुम सुन ज़रूर  चुके होगे. उम्मीदें सारा खेल खराब कर देती हैं. उसकी बिलकुल उलटी बात भी तुम कहीं ना कहीं सुन जरूर चुके होगे. मैंने तुमसे कहा तुम पूरे हो. उस से बिलकुल विपरीत बात भी तुम सुन जरूर चुके होगे. मैंने तुमसे कहा आते ही कि इंसान को रिश्ते कि तरह नहीं, इन्सान की तरह देखो. उससे बिलकुल उल्टा सन्देश तुम्हें कई बार मिल चुका है, चारों तरफ से. अब अगर अभी तुम  ध्यान से सुन नहीं रहे हो तो जो मैंने अभी कहा वो तुम्हारे लिए मेरे शब्द बन कर ही रह जायेंगे, समझ नहीं बनेंगें. ये शब्द तुम्हारे मन में स्मृति की तरह बैठ जायेंगे. जैसे तुम्हारे मन में हज़ार और बातें बैठी हुई हैं. जो मैंने कहा वो पहले सुनी हुई किसी बात के विपरीत है. मैंने तुम्हें दाएं जाने को कहा हैं, पहले तुमने सुना है बाएं जाने के लिए. और ये दाएं और बाएं अब दिमाग में लड़ेंगे आपस में. लड़ तो दाएं और बाएं रहे हैं और युद्ध भूमि बन गया है तुम्हारा मन. नुक्सान हो रहा है तुम्हारे मन का. तुम्हारे मन का यानि तुम्हारा. ये तब होता है जब आदमी के पास अपनी कोई समझ, अपनी कोई नज़र नहीं होती. एक बात दाएं से सुनी, दूसरी बात बाएं से सुनी और दोनों ही ठीक लगेंगी  या दोनों ही गलत भी लग सकती हैं. कभी एक ठीक, एक गलत. कभी एक ठीक दूसरी गलत. अब जाएँ तो जाएँ कहाँ. और ये बात सिर्फ दो बातों की नहीं है. तुमने दो नहीं, बीस, दो सौ, दो हज़ार बातें सुनीं हैं. और ये हम सब के साथ होता है कि किसी एक क्षण पर कोई एक बात पूर्णतया सही लगती है. और दूसरे ही क्षण वही बात, बिलकुल बेकार. सुबह को एक ओर को चलना चाहते हो और शाम तक मन बिलकुल बदल जाता है, कहीं और को चल देते हो. कुछ भी जीवन में ऐसा नहीं रहता जो बदलाव से अछूता हो . सब कुछ बदलता रहता है. मन अभी कैसा है, थोड़ी देर में कैसा हो जाता है. अभी यहाँ बैठे हो, एक खबर आ जाए, मन बिलकुल बदल जाएगा. चुपचाप ध्यान से सुन रहे हो, पड़ोसी कान में बोल दे, बिलकुल उसी ओर को चल दोगे .

बात इतनी से ही है कि हमारी मालकियत नहीं है है अपने उपर. वही जो पूरा होने का भाव कहा था ना.  मजबूत होने का भाव . जब मजबूत होने का भाव होता है तो आदमी अपना मालिक खुद होता है. पर उनको परखता वो अपनी नज़र से,अपने विवेक से है. सुनता है दूसरों कि कही बातें पर परखता है अपने विवेक से . अपनी समझ से अपनी इंटेलिजेंस से. अब वो इधर-उधर से आये विचारों का, धारणाओं का, गोदाम मात्र नहीं है. किसी ने कुछ कहा और मैंने उसको इकठ्ठा करके रख दिया है. कहा जाए कि इसमें मेरा कितना है तो जितना ध्यान से देखूं उतना ही पता चले कि मेरा तो इसमें कुछ भी नहीं है. सब कुछ उधार का है. और ये जो उधार का है, ये भी आपस में लड़ता रहता है.

ना सही की बहुत परवाह करो, ना गलत की बहुत परवाह करो, जो कुछ है तुम्हारे सामने है. उसको ध्यान से देखो. पहली चीज़ है फैक्ट्स. फैक्ट्स को पूरी तरह से देखो. इससे पहले कोई ख्याल बनाओ, कोई ओपिनियन बनाओ फैक्ट्स की जांच पड़ताल पूरे तरीके से कर लो. हमने पहले एक सवाल में तीन तलों कि बात करी थी. यहाँ पर भी तीन तल हैं .

सबसे निचला तल है कल्पना का जिसमें दो काल्पनिक ख्याल आपस में लड़े जा रहे हैं. दो काल्पनिक ख्याल क्या हैं ? मैं ट्रैन से जाऊँ , मैं कार  से जाऊँ ? और बैठ कर के दो घन्टे से इसी उलझन में उलझे हुए हैं. कभी ट्रेन से जाना राईट लगता है, कभी कार से जाना राईट लगता है. तो मैं कहूंगा कि पहला काम तो है कि फैक्ट्स चेक करो कि आज कोई ट्रेन  जाती भी है ? तुम्हें कार अभी उपलब्ध भी है ? और ज्यादातर हमारा जीवन ऐसा ही है कि जहाँ ट्रेन जा ही नहीं रही, कार उपलब्ध ही नहीं है पर साहब के सामने बहुत बड़ी समस्या है कि मैं कार से जाऊँ कि मैं ट्रेन से जाऊँ. अरे कहाँ है कार और कहाँ है ट्रेन ? ना कार है ना ट्रेन  है.  तो पहला तल है कल्पना का, दूसरा तल  है फैक्ट्स का . तीसरा तल है कि ऐसा क्या है जो मुझे कार से जाने को विवश कर रहा है . कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुझे ये बता दिया गया है कि जो लोग कार से चलते हैं उनका सम्मान ज्यादा होता है, उनका ओहदा ज्यादा है . तो मैं कहीं पहुँचूँगा और वहाँ लोग मेरी कार देखेंगे तो उससे मुझे बड़ी इज्जत मिल जायेगी . कहीं मैं कार से इसलिए तो नहीं जाना नहीं चाह रहा . कार से जाने का विचार मेरे मन में डाला किसने? मैं पूछूँ अपने आप से . कहाँ से आ गया ? क्या ये मेरा है ?

ज्यादातर उलझनें जो हमारी हैं वो काल्पनिक ही हैं . जब तथ्यों को देखोगे, फैक्ट्स को तो ज्यादातर तो वहीँ पर साफ़ हो जाएंगी. और आगे जाना चाहते हो तो अपने आप से पूछना कि ये जो दो ताकतें लड़ रही हैं दिमाग में, ये जो दो विचार लड़ रहे हैं, वो आये कहाँ से ? इसमें मेरा क्या है ? इसमें मेरा कितना है ?उसके बाद उन दोनों को ही किनारे कर दोगे, उलझन ही ख़तम. जो होना है,  अपने आप होगा. फिर वो लड़ाई ख़त्म हो जानी है. फिर उस लड़ाई में कुछ बचना नहीं है. ये बड़ी उधार कि लड़ाई है. ये तुम्हारी लड़ाई है ही नहीं.  तुम इसे क्यों अपना माने बैठे हो ? प्रॉक्सी वॉर है ये. जैसे कि इस पड़ोस से एक आदमी आया हो और उस पड़ोस से एक आदमी आया हो और दोनों तुम्हारे घर में लड़ रहे हों. उन दोनों को निकाल दो, बोलो लड़ना है तो बाहर जाके लड़ो. अपने घर जाओ. एक इधर का है, एक उधर का है और लड़ने के लिए उन्होंने तुम्हारा घर चुन लिया है . बड़ी जबरदस्त हालत है. तोड़-फोड़ कहाँ मचा रहे हैं वो ? शीशे तोड़ दिए, बर्तन तोड़ दिए, टेबलें उठा-उठा के पटक रहे हैं. किसके घर की  ?

श्रोता : (एक स्वर में ) हमारे घर की .

वक्ता : तुम्हारे  घर की . कोई जीते, कोई हारे, नुक्सान किसका होना है ?

श्रोता : (एक स्वर में) हमारा .

वक्ता : उनमें से कोई जीत भी गया तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा. उनमें से कोई हार भी गया तो तुम्हारा कुछ नहीं जाएगा . पर नुक्सान खा जाओगे. इस नुक्सान से बचो. देखो, इसमें मेरा है ही क्या ?

http://www.youtube.com/watch?v=HxxRlC0dAco

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय अदिति जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      पसंद करें

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s