अकेले चलने में डरता क्यों हूँ ?

श्रोता:  इतना मुश्किल क्यों होता है अकेले चलना?

वक्ता: मुश्किल होता नहीं है, पर लगने लग जाता है! क्योंकि तुमने आदत बना ली है, बैशाखियों पर चलने की, सहारों पर चलने की। यह कोई तथ्य नहीं है कि मुश्किल होता है अकेले चलना। उसमें वस्तुतः कोई कठिनाई नहीं है। पर मन ने एक छवि बना रखी है जो की अकेले चलना बड़ा मुश्किल हो।

मैं एक चित्र देख रहा था, जिसमें एक बड़ा हाथी एक पतली सी रस्सी से, पतली सी टहनी से बंधा हुआ दिखाया गया था। मैं उसको देर तक देखता रहा फिर मैंने कहा, ये हम ही तो हैं! जानते हो होता क्या है? जब ये हाथी बच्चा था, तब उसको, उस रस्सी से, उस टहनी से बाँधा गया था। तब वो नहीं भाग पाया। तब उसने कोशिश करी थी, एक दिन, दो दिन, दो हफ्ते, चार हफ्ते, तब उसको ये भ्रम हो गया कि शायद यही जीवन है। शायद ऐसे ही जीया जाता है, शायद इससे कोई छुटकारा ही नहीं है। और आज वो हाथी पूरा बड़ा हो गया है। इतनी सी उसे कोशिश करनी है और वो मुक्त हो सकता है। पर वो कभी मुक्त नहीं हो पायेगा, क्योंकि उसका मन अब ग़ुलाम हो गया है। अब उसके लिए मुक्ति सम्भव ही नहीं है क्योंकि मन हो गया है ग़ुलाम। वही हाल हमारा हो गया है।

तुम्हें तुम्हारी टाँगे दी गयी हैं, तुम्हारी दृष्टि दी गयी है, तुम्हें तुम्हारी समझ दी गयी है और इन सबमें तुम किसी पर आश्रित नहीं हो। और अच्छी-खासी अब तुम्हारी उम्र हो गयी है। प्रकृति भी चाहती है कि तुम मुक्त जियो! पर आदत कुछ ऐसी बन गई है अतीत से कि अकेले चलते हुए ही डर लगता है। समझ रहे हो न बात को? पर भूलना नहीं कि उसमें कुछ सत्य नहीं है, बस आदत है।

आदत स्वभाव नहीं होती, स्वभाव होता है अपना और आदत आती है बाहर से। तुमने किसी बाहरी बात को पकड़ कर के उसको अपना समझ लिया है। तुम आदत और स्वभाव में भूल कर रहे हो। उनको अलग-अलग नहीं देख पा रहे। तुम्हारा स्वभाव है, तुम्हारा कैवल्य, तुम्हारा एकांत! तुम्हारा अपने आप में पूरा होना। तुम्हें किसी निर्भरता कि आवश्यकता है नहीं!

पर तुम्हारे मन में धारणायें हमेशा यही डाली गयी हैं— उदाहरण के लिए, तुम्हें बचपन से बता दिया गया, मनुष्य एक सामाजिक पशु है। अब दो तरफा तुम पर चोट की गयी है। पहले तो तुम्हें बोला गया कि तुम पशु हो। पशु शब्द आता है उसी धातु से जहाँ से पाश आता है: पाश माने बंधन। तो पहली बात तो ये कि तुम्हें बोल दिया गया कि बंधे रहना तुम्हारा स्वभाव है। शारीरिक रूप से तुम्हें पशु घोषित कर दिया गया। और दूसरी चोट ये की गयी कि कह दिया गया कि तुम सामाजिक हो। तुम सामाजिक हो ही नहीं। ना तुम सामाजिक हो, न तुम शारीरिक हो। पर तुम्हें बार-बार पट्टी यही पढ़ाई गयी है। तो मन इतनी बुरी तरह इन सब बातों से दब गया है, जैसे हीरा हो और उसके ऊपर टनों राख दाल दी जाए तो हीरा कहीं दिखायी ही ना पड़े, कहीं प्रकट ही ना हो। ऐसी तुम्हारी हालत हो गयी है। हीरे तो हम सभी हैं, इसमें कोई शक़ नहीं है, पर राख हमारे ऊपर टनों पड़ी है। वो राख ही हमारा बोझ है, उसी से मुक्त होना है। कुछ पाना नहीं है, बस मुक्त होना है उसी से। इसीलिए मैं लगातार बोलता हूँ कि पाने कि कोशिश छोड़ो, जो पहले ही इकट्ठाकर रखा है बस उसी को साफ़ करो। पाने की सारी कोशिश खराब है। लेकिन तुम पड़े रहते हो ‘कुछ पाने’ के फेर में! तुम कहते हो, अभी कुछ और पाना है !! अभी पा, पा कर तृप्त नहीं हुए? पा, पा कर ही तुम्हारी ये गत बन गयी है, अभी पूरी नहीं पड़ रही?! पाना छोड़ो। अब तुम्हारा समय है हल्का होने का। पाने का अर्थ है, और बोझ इकट्ठा करना। इतना बोझ तो पहले ही इकट्ठा कर चुके हो। अब हलके हो।

ये सारी बातें – कि दूसरे आवश्यक हैं, बैसाखियाँ चाहिए, रास्ता कोई दूसरा दिखायेगा, मार्गदर्शक हो कोई। “अरे अपना कोई नया रास्ता होता है!” कोई हो जो रोशनी डाले, कोई हो जो बताये जीवन क्या होता है, ये सारी बातें बस धारणायें हैं। समझ रहे हो बात को? तुम्हें अधूरा नहीं बनाया गया है। कोई भी अधूरा नहीं बनाया जाता! हम सब अपने आप में सम्पूर्ण है। सम्बन्ध होने चाहिए कोई शक़ नहीं है। रिश्ते होने चाहिए। पर वो रिश्ते अपूर्णता के नहीं होते। मैं अधूरा हूँ, तुम भी अधूरे हो, चलो दोनों मिल कर पूरे हो जाएँ। इससे कोई पूरापन नहीं आता। तुम भी पूरे हो, वो भी पूरा है और इस पूरेपन में रिश्ता बनता है, असली। इस पूरेपन में ही असली रिश्ता बनता है।

बिल्कुल इंकार कर दो उन सारी बातों को, जो ये बताती हैं कि तुम अपूर्ण हो। बिल्कुल ठुकरा उन सारी धारणाओं को, जो कहती हैं कि तुम शूद्र हो। बिल्कुल इंकार कर दो। जो भी आ कर के तुम्हें ये बताये कि तुम में कमी है और आगे चल के तुम्हें उसे पूरा करना है। कि जब तुम्हारी नौकरी लगेगी, तब तुम सम्माननीय कहलाओगे। कि जब तुम्हें कोई सर्टिफिकेट मिल जायेंगे, तब तुम्हारे जीवन में कुछ फूल खिलेंगे! जब भी तुम्हारे सामने ऐसी बातें आएं ‘ठोकर मारो। जो भी कोई तुमसे कहे, कि तुम्हारे अंदर कोई खोट है! समझ जाओ वो आदमी, खुद भी नासमझ है और तुम्हें भी फंसा रहा है। जब भी तुमसे कहा जाए कि तुम अपने पाँव पर नहीं चल सकते कि तुम्हें दूसरों के अनुभवों की जरूरत है। जब भी तुम्हें इस तरह की बातें कहीं जाएं तब बिल्कुल सावधान हो जाओ! ये फसाया जा रहा है। नासमझी में फसाया जा रहा है। एक उम्र तक, तुम कुछ मजबूर थे तुम कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि तुम्हारा मष्तिष्क परिपक्व् नहीं हुआ था। आज तुम मजबूर नहीं हो। एक उम्र तक तुम्हारे सामने कोई चारा नहीं था सिवाय इसके कि तुम वो सब स्वीकार कर लो, जो तुम्हें दिया गया। अब तुम्हारी वो उम्र बहुत पीछे छूट गयी। अब तुम्हारा समय आ गया है कि ‘तुम उठो, और हर प्रकार कि बकवास से इंकार कर दो। और बकवास घूम फिर के एक ही होती है, जो ये कहती है कि तुम अपूर्ण हो !! तुममें कोई कमी है। हर बकवास अंततः इसी मुद्दे पर पहूँ चती है।

जब भी कुछ देखो कि ऐसा ही है, ‘उठ खड़े हो जाओ! और हर तरफ से तुम्हें सन्देश यही दिया जा रहा है, देखना!! ध्यान से देखना!!! ये जो दिन-रात टीवी पर विज्ञापन देखते हो, हर विज्ञापन यही बताता है कि हमारे जीवन में अभी कोई छेद है और वो छेद तब भरेगा जब तुम हमारे उत्पाद का प्रयोग करना शुरू कर दोगे! तुम काले हो, चलो हमारी क्रीम लगाना शुरू करो, तुम गोरे हो जाओगे। अरे, तुम्हारे पास तो नया वाला मोबाइल नहीं? तुममें कोई कमी रह गई। तुम्हारे पास इस ख़ास-तरह का शरीर नहीं? अरे तुम्हारी कोई इज्जत नहीं! तुम्हारे पास फलाना डिग्री नहीं? अरे आओ हमारे कॉलेज में आओ। बस फीस जमा कराओ, जल्दी आओ। लगातार तुम्हें सन्देश यही दिया जा रहा है कि ”तुम छोटे हो!! ” कि तुम कुछ नहीं हो। इन सारे संदेशों को नकारो! हाँ ठीक है, हम जीवन में काम करेंगें, जीवन अपनी गति से बढ़ेगा पर इस कारण नहीं बढ़ेगा कि हम हीन भावना में जीएं! अपनी हीनता से हम इंकार करते हैं!! हम पढ़ेंगे, मगर इसलिए नहीं कि पढ़-लिख कर वो डिग्री हमे कुछ ख़ास दे देगी। हम बेशक़ पढ़ेंगे, मगर पढ़ने के लिए ही पढ़ेंगे इसलिए नहीं पढ़ेंगे कि जब पढ़-लिख के जब वो डिग्री हो जायेगी और हम दुनिया को दिखाएंगे तो उससे हमें कुछ मान मिल जायेगा। हाँ ठीक है, हम काम भी करेंगे, पर काम इसलिए करेंगे क्यूँकी उसमें मौज है हमारी। काम इसलिये नहीं करेंगे कि दुनिया वाह-वाही कर रही है! काम इसलिए नहीं करेंगे कि जा के फर्नीचर खरीद लायेंगे, काम इसलिए नहीं करेंगे कि नौकरी अच्छी होगी तो शादी अच्छी हो जायेगी! समझ में आ रही है बात? दिन-रात ये जो ज़हरीला मिश्रण तुम्हारे दिमाग में घोला जा रहा है, उसके विरुद्ध बिल्कुल उठ खड़े हो! वरना पाओगे कि जीवन भर वही हाल रहेगा कि अकेला चलने में डर लगता है! डर तो लगेगा ही ना। सुबह से शाम तक एक ही घुट्टी पिलायी जा रही है! सड़क पर, स्कूल में, कॉलेज में, अखबार में, घर में, मीडिया में, “तुम छोटे हो”, घूम-फिर कर हर बात, यहीं पर आ कर अटक जाती है कि तुम छोटे हो, तुम अधूरे हो, तुम मिट्टी हो। और मैं तूमसे यहाँ पर कह रहा हूँ कि ये जितनी मिट्टी है ये तुमने इकट्ठा कर ली है। तुम वास्तव में हीरे हो। तुम वास्तविकता हीरा होने की है और मिट्टी बाहरी है। तुम मिट्टी हो नहीं! — और अगर तुम पाते हो कि तुम्हारी जिंदगी में मिट्टी ही मिट्टी है, तो समझ जाओ कि तुम जिंदगी में बहुत प्रभावित रहे हो। और कोई बात नहीं है। अगर पाओ कि जीवन में मिट्टी ही मिट्टी है तो उसका अर्थ ये मत निकाल लेना कि मैं मिट्टी ही हूँ, ना!! उसका अर्थ इतना ही हुआ कि वो मिट्टी तुमने इकट्ठाकर ली है। हो तो तुम हीरे ही! बहक मत जाना। समझ रहे हो? देखो, आता हूँ तुम सबसे बोलता हूँ, पर इससे ज्यादा पीड़ादायक दृश्य नहीं होता, जब जवान लोग सामने बैठे होते हैं और उनकी आँखों में मज़बूरी का भाव होता है!  कातरता! कि आप हमसे कुछ बोल लो, हमें पक्का पता है कि हम हीं हैं! इससे ज्यादा अफ़सोसजनक दृश्य और कोई होता नहीं। काबिल लोग, स्वस्थ मष्तिष्क, स्वस्थ शरीर, सामने बैठे होंगे ‘लेकिन पता नहीं क्या होगा, एक ज़बरदस्त ताकत, जो उन्हें दबाये होगी। कि ना!! उठ के मत खड़े हो जाना, गुलाम ही रहना! और मेरी लगातार यही कोशिश है कि तुम समझो, उस ताकत में कोई बल नहीं है! लगती भर है ताकतवर, है कुछ नहीं! वो उतनी ही ताकतवर है, जैसे हाथी के गले में पड़ी हुई वो रस्सी! उस हाथी को भ्रम हो गया है कि उस रस्सी में कोई बल है। कोई बल नहीं हैं, अभी तोड़ो! समझ रहे हो?

दिनकर कि पक्तियां है:

पत्थर सी हो मासपरशियां, लोहे से भुजदंड अभय,

नस-नस में लहर आग की तभी जवानी पाती जय!

और मैं तरस जाता हूँ ऐसे जवान लोगों को देखने को, जिनकी नस-नस में आग कि लहर हो! दिखायी पड़ते हैं तो आधे मरे हुए जिन्होंने तय ही कर रखा है कि जीवन गुलामी है, जीवन मजबूरी है। अरे, जीवन क्यों गुलामी है? जीवन क्यों मजबूरी है? कंधे झुके हुए, जैसे पहाड़ों का बोझ हो तुम्हारे कंधो पर, चेहरा उदास! कोई कांति नहीं, कोई तेज़ नहीं। क्या उदासी है ? क्या खो दिया है तुमने? हाथ-पाँव रूखे-सूखे। ना दौड़ते हैं, ना खेलते हैं, ना नाचते हैं। अभी मैं तुमसे पूछूं, तुममें से कितने लोग हो, जो पिछले छह महीने में झूम के नाचे भी हों! तो बहुत कम होंगे! मैं शादी-व्याह में नाचने की बात नहीं कर रहा, उस हुल्लड़ की। मैं वास्तविक नाच कि बात कर रहा हूँ। अरे, ये कैसे जवान लोग हैं जो नाच नहीं सकते!! ? नाचने में भी जिनके क़दमों में पाबन्दी है। और तुमसे नहीं नाचा जाएगा, तुम्हारे चेहरों पर लिखा है, तुम नहीं नाच सकते खुल के! अरे क्यों नहीं नाच सकते?

प्रकृति में सब कुछ नाचता है, नाचते हैं, पेड़ -पौधे भी नाचते हैं। तुम्हीं नहीं नाच रहे! और तुम नाचते थे! जब तुम बच्चे थे तुम नाचते थे। अब क्या हो गया है, जो तुमने नाचना छोड़ दिया? किसने तुम्हारे मन में बोझ भर दिए हैं?

ऐसी गंभीरता … नहीं सर, आप समझ नहीं रहे हैं! पूरी दुनिया का बोझ, हमारे ऊपर ही तो है!! हँसते भी हो तो लगता है, जैसे अपनी मातम पर हंस रहे हो। वो जो हल्की हंसी होती है, और देखने को ही नहीं मिलती!!… ह्ह्म्म? हाथी हो तुम, पूरे, बड़े, ताकतवर… हाँ? क्या टहनी, क्या रस्सी? तोड़ो सब!

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: : http://youtu.be/VXBcgA_egYE

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय सर्वेश जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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