जवान हो, वाकई?

श्रोता: कई बार मुझे ऐसा लगता है कि ‘ज़िन्दगी का उद्देश्य क्या है? वही स्कूल जाना, कॉलेज आना, अच्छे मार्क्स लाना, फिर अच्छी नौकरी पाना, एक विलासी ज़िन्दगी बिताना। बस? क्या यही ज़िन्दगी का उद्देश्य है? और जब ये सोचता हूँ तो काफी खालीपन सा आ जाता है। उसके बाद कुछ करने का मन ही नहीं करता।’

वक्ता: तुम बड़े किस्मत वाले हो कि तुम्हें वह खालीपन महसूस होता है। ज़्यादातर लोगों को यह अहसास भी नहीं होता कि ज़िन्दगी कितनी खाली है। तुम्हें अधूरेपन का, खालीपन का अहसास होता है यही बड़ा सौभाग्य है। क्योंकि इस से शायद आगे का रास्ता निकल सकता है, कुछ बात बन सकती है। जिनको पता ही नहीं चल रहा हो उनका क्या होगा?

जिस बीमार को यह पता ही ना हो कि मैं बीमार हूँ, उसका मरना पक्का है, इलाज की कोई सम्भावना नहीं है। हम जैसे जीते हैं उन तरीकों में यह होना ही है कि सच हमें छू जाए और अहसास करा जाए कि मामला गड़बड़ है। यह ऐसी सी बात है कि जैसे एक अँधा आदमी हो जिसने अपने आप को यह यकीन दिला रखा हो कि मैं अँधा नहीं हूँ। मुझे सब दिखाई पड़ता है। और उसने पूछ-पूछ के रट भी लिया है सब कुछ। उसने रट लिया है कि कौन सी सड़क कहाँ जाती है और कितने कदम चल लें तो कहाँ पहूँच जायेंगे। उसने रट लिया है कि आसमान का रंग नीला होता है और  नीला जैसा कोई शब्द होता है। उसने सारे रास्ते, सारे मकान, सारी दुकान – सब रट लिए हैं। तो उस से तुम पूछो कि यहाँ से यह चौराहा कितनी दूर है, वह बता देगा जैसे उसे सब दिख रहा हो। लेकिन चलते-चलते अचानक रास्ते में एक पत्थर आ जाता है और इस पत्थर का उसे पहले से नहीं पता। उसने रट नहीं रखा कि रास्ते में एक छोटा सा पत्थर भी पड़ा है। पत्थर से चोट लगती है और वह लड़खड़ा के गिरता है। यह चोट उसे बताने के लिए काफी है कि तुम अंधे हो। तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता। जितनी रटने वाली चीज़ें थी वह तो सब रट ली पर सच रटा नहीं जा सकता। तुम्हें रास्ते का पत्थर ही नहीं दिखाई पड़ता। तुम अंधे हो। यह वास्तविकता की ठोकर है जो उसे लगती है। पर अँधा खड़ा होता है, कपड़े झाड़ता है और आगे बढ़ जाता है। वो अपने आप को बताना ही नहीं चाहता कि मैं अँधा हूँ। ये ठोकरें हम सबको लगती हैं।

ज़िन्दगी हम सबको यह अहसास कराती ही रहती है कि देखो तुम क्या कर रहे हो! यह बेवकूफी है! पर हम अंधे की तरह ही उठते हैं,कपड़े झाड़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही ना हो। और ज़िन्दगी हमें रोज़ देती है ठोकरें। हम उन ठोकरों से भी सीखने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि सीखने के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, हाँ हमारी आँखें बंद हैं। थोड़ा कष्ट होता है उसमें,अहंकार को चोट लगती है। रिश्ते नातों में खिचाव आता है। तो हम यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि आँखें बंद हैं हमारी। हम कहते हैं नहीं-नहीं, ठोकर थोड़े ही लगी है। मैं तो यूँ ही खुद ही फिसल गया था। यह कोई बड़ी बात नहीं। मुझे सब दिख रहा है। मुझे सब समझ में आता है, सब दिखता है। कोई शंकाएं नहीं हैं।

तो सबसे पहले तो शुक्रिया अदा करो कि तुम्हें बेचैनी अभी अनुभव होती है। एक समय ऐसा आ सकता है जब तुम्हें इसका अनुभव होना बंद हो जाए। यह एक तरह की पुकार है। इस पर ध्यान दोगे तो ज़िन्दगी बदल जाएगी और ध्यान नहीं दोगे तो यह पुकार धीरे-धीरे कम हो जाएगी और आखिर में गायब हो जाएगी।

मुक्ति-बोध नाम से एक कवि हुआ है उसकी एक पंक्ति है कि, ‘मुझे पुकारती हुई पुकार खो गयी कहीं’। तो तुम भी क्योंकि जवान हो और पक नहीं गए हो ज़िन्दगी से इसलिए वह पुकार आती है और अहसास कराती है कि कुछ गलत हो रहा है। कुछ बहुत गलत हो रहा है। यहीं तीस-चालीस साल के हो जाओगे तो पुकार आनी भी बंद हो जाएगी। वो पुकार भी कहेगी कि अब तो इसने ज़िन्दगी ख़राब कर ही ली अब क्या करूँ। अभी कुछ उम्मीद बाकी है इसलिए वह पुकार आती है। उसके बाद एक सहूलियत वाली नौकरी लेकर बैठ जाना,एक गोरी-चिट्टी बीवी लेकर बैठ जाना, एक-दो बच्चे पैदा कर लेना और कोई पुकार-वुकार नहीं आएगी। सुबह ऑफिस जाना और शाम को लौट आना, खाना-पीना, टीवी देखना, बिस्तर पर पड़ जाना और अगले दिन फिर यही और कोई पुकार नहीं। देखते नहीं हो घरों में कैसे चलता है? उन्हें कोई पुकार आती है? उन्हें कोई खालीपन लगता है। वो भरे-पूरे हैं, सब ठीक! मौज! ज़िन्दगी ऐसी ही होती है!

अभी तुमको लग रहा है कि ये मैं कर क्या रहा हूँ, एक कहानी लिख दी गयी है और मैं उसी पर चल रहा हूँ और वह कहानी सबके लिए लिख दी गयी है, जैसे मैं किसी कथा का चरित्र हूँ जिसके संवाद पहले से ही तैयार हैं। जैसे मैं कोई कठपुतली हूँ जिसको करना क्या है वह पहले से ही तय कर दिया गया है। पैदा हो, एक धर्म बनाओ, कुछ मानयताएं रखो, कुछ दिमाग में आदर्श भर लो, इस-इस तरह की पढ़ाई करो, फिर ऐसा-वैसा कोर्स कर लो, उसके बाद एम.बी.ए कर लो, या कोई नौकरी कर लो, या सॉफ्टवेयर कंपनी में काम कर लो,फिर शादी कर लो, घर बसा लो, सामान खऱीद लो, फर्नीचर खरीद लो, कार खरीद लो, फिर बच्चों का स्कूल में एडमिशन कराओ और फिर उनको भी वही सब कराओ और यह सब करके एक दिन.… मर जाओ!

तो पहले से ही तो सब कुछ पता है। तुम काहे के लिए इतनी महनत मेहनत कर रहे हो? यह तो होना ही होना है। जितने बैठे हैं उन सबके साथ होना है। तो जब यही होना है तो तुम परेशान किस लिए हो? यह पक्का है यही होगा। सबके साथ यही हो रहा है। सबके साथ यही होगा। जब तुम सब कुछ वही करते आये जो तुम्हारी स्क्रिप्ट में लिखा है तो तुम अब कैसे अलग हो जाओगे? तुम किन ख्वाबों में जी रहे हो? नहीं-नहीं, मेरी ज़िन्दगी बिल्कुल अलग होगी। नहीं-नहीं, मैं कुछ ख़ास करके दिखाऊंगा। कैसे ख़ास करके दिखा लोगे?आज तक तो तुम वही करते रहे जैसा समाज ने बताया, जैसा परिवार ने बताया, अब कैसे कुछ ख़ास हो जाएगा? पुराने रास्तों पर चलते हुए नयी मंज़िल पर कैसे पहुँच जाओगे?

पर एक ही है जो कह रहा है कि मुझे इसकी व्यर्थता दिखाई देती है, बाकियों को कुछ नहीं दिखाई देता? “इग्नोरेंस इज़ ब्लिस।”

आँख बंद करे रहो- कबूतर का तर्क़ यही होता है। बिल्ली कहाँ है? दिखाई नहीं दे रही। दिखाई नहीं दे रही तो है ही नहीं। हमारा भी वही तर्क़ है। और जिसको ज़रा भी दिखाई देगा, वह परेशान ही नहीं होगा, वह पागल हो जाएगा। वह रो उठेगा, कहेगा, “मैं कर क्या रहा हूँ? एक ज़िन्दगी है मेरी, उसके साथ मैं क्या होने दे रहा हूँ? मैं अनुमति कैसे दे सकता हूँ कि मेरे साथ वही सब कुछ होता रहे जो एक किसी मशीन के साथ होता है; उसका डिज़ाइन भी कोई और बना दे, प्रोग्राम भी कोई, उसके बटन भी कोई और, दबाए भी कोई और, और यह भी कोई और तय करे कि इसको डिस्पोस कब करना है।”

अगर तुम ज़रा भी जागोगे और अपने प्रति ज़रा भी ईमानदारी है, तो जो बेचैनी उसने कही, वह तुम सबको अनुभव होगी। और अगर नहीं अनुभव हो रही तो तुम सब मुर्दा हो। और तुम्हें पूछना होगा अपने आप से कि ऐसी कौन सी मजबूरी है जो मैं अपने साथ यह सब होने दे रहा हूँ। या होने दे रही हूँ! अगर तुम लड़की हो तो जो तुम्हारे लिए पटकथा लिखी गयी है वह और भी पक्की है, उससे तो ज़रा भी दायें-बाएं नहीं जा पाओगी। पर कहाँ तुम ये सवाल करते कि मैं यह क्यों…? और अगर जीना यही है तो जीना क्यों? फिर मर ही जाते हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो अस्तित्ववादी विचारक हुए वो घूम फिर कर के एक ही सवाल पर आते थे – जीना क्यों? अगर यही जीवन है तो जिए क्यों? या तो जीवन कुछ और होना चाहिए वरना हमें जीने में कोई रुचि नहीं।

या तो कोई और जीवन हो। अल्बर्ट कामु का नाम सुना होगा। ‘मिथ ऑफ़ सिसीफस’ में उसने एक कहानी कही। वह कहता है कि एक पहाड़ है, ऊंचा। और मेरा काम यही है कि रोज़ाना एक पत्थर नीचे से ले जाओ उस पहाड़ की चोटी तक और जैसे ही वह पत्थर उस पहाड़ की चोटी पर पहुँचता है, पत्थर वापस आ जाता है नीचे। और मेरा फिर काम है कि अगले दिन मैं सुबह पत्थर चढ़ाऊँ और वह नीचे आये। और यही मेरी ज़िन्दगी है और रोज़ मुझे यही करना है। मैं जीऊँ क्यों? रोज़ मुझे कुछ ऐसा करना है जिसका कोई अर्थ नहीं, कोई प्रयोजन नहीं। रोज़ एक सी ज़िन्दगी है जो अपने आप को दोहराती जा रही है, दोहराती जा रही है। और यह करते हुए मुझे अंततः मर ही जाना है। और अगर ऐसे मर ही जाना है तो आज ही क्यों नहीं?

या तो कुछ नया हो जीवन में। ऐसा जो इस दोहराव से आगे का है, जिसमें बोरियत नहीं है। ज़िन्दगी या तो मौज हो, आनंद हो,मस्ती हो, मुक्ति हो; नहीं तो कुछ नहीं होनी चाहिए। एक घिसा-पिटा जीवन। यह कोई जीवन है? और इसमें तुम्हें चंद, दो-चार खुशियां मिल जाती हैं जैसे किसी पालतू जानवर के सामने रोटी फ़ेंक दी जाए। कि जी, इसी बहाने तू जी लेगा। वैसे ही तुम्हें होली-दीवाली थोड़ी खुशियां फ़ेंक दी जाती हैं। जी ले ! तीन सौ पैसठ दिनों में दो-चार दिन तू भी जी ले। और मैं समझता हूँ कि एक जवान आदमी को सबसे पहले सवाल यही उठाना चाहिए। जवान इसलिए कह  रहा हूँ क्योंकि बच्चे को यह सवाल उठेगा नहीं। अभी वह नासमझ है, तुम नहीं हो नासमझ। और अभी तुम इतने बूढ़े भी नहीं हो गए कि कहो कि उम्र बीत गयी। न तुम बच्चे हो और न अभी बहुत बड़े हो गए। तुम जवान हो। और व्यर्थ है वह जवानी जिसे अपनी विवश्ता नहीं दिखाई देती।

ऑस्कर वाइल्ड का कथन था,  “युथ इज़ लॉस्ट ओवर द यंग”

 जवानी घटती ही नहीं, होती ही नहीं। हम या तो बच्चे ही रह जाते हैं, कि मैं तो अभी मम्मी की बच्ची ही हूँ। या हम बहुत बूढ़े हो जाते हैं कि देखो अब हम बहुत समझदार हो गए हैं ये क्रांति  वैगरह की बातें तो करो मत। चुप-चाप साधारण जीवन जी लो नहीं तो पीट दिए जाओगे। तो या तो हम बच्चे ही हैं, कि घर बाहर निकलना है तो ‘चला जाऊं?’ चार कदम भी बाहर जाना है तो ‘कैसे?’ तो या तो हम बच्चे ही हैं या हम बूढ़े हो गए हैं। जवानी बीच में आयी ही नहीं। बाईपास हो गयी। यह बड़ी विचित्र घटना घटी है हमारे साथ। बच्चा बूढ़ा हो गया। बिना जवान हुए और मैं खोजता हूँ, दुनिया भर में जाता हूँ, कॉलेज में जाता हूँ, यूनिवर्सिटी में जाता हूँ और खोजता हूँ कि मुझे जवान आदमी दिखाई दे, मुझे दिखता नहीं। मुझे अर्धविकसित लोग दिखाई देते हैं या मुर्दा। ऐसे दिखाई देते हैं जिनका अभी विकास ही नहीं हुआ। वो अभी ज़रा से ही हैं। हाँ, दाढ़ी मूंछ आ गयी है, कद बढ़ गया है पर हैं ज़रा से ही। या मुझे बूढ़े दिखाई देते हैं जिनमें अब कोई ऊर्जा शेष नहीं बची। जो अब कुछ कर ही नहीं सकते। जिनको अब बस मौत का इंतज़ार है। जवान आदमी दिखाई ही नहीं देता।

जवान हो वाक़ईथोड़ी देर पहले एक चुनौती दी थी, अब एक और दे रहा हूँ। सिर्फ शरीर से ही जवान रहोगे या वास्तव में होना है? शरीर की जवानी किसी काम की नहीं होती। एक युवा मन चाहिए। वो आएगा या ऐसे ही रहना है? मैं तो नन्हा-सा, छोटा-सा बच्चा हूँ।

जिस दिन जवान होगे उस दिन बड़ी बेचैनी उठेगी। उस दिन कहोगेमैं समर्थकाबिलजवानमुझे इतनी ज़ंजीरें पहना रखी हैंमैं बर्दाश्त करूँगा कभी इन्हे इन्हेंबिल्कुल आग उठेगी। और वह उस बेचैनी को जला देगी। गहराई से जला देगी। वो उस सबको जला देगी जो नकली है।

ये नकली तुम्हें मिल गया है, मिलना पक्का है। यह परवरिश है। असहाय होते हो न। एक छोटा बच्चा कर भी क्या सकता है? उस पर सौ मान्यताएं डाल दी जाती हैं। समाज जहाँ चाहता है उसे उस जगह भेज देता है। जो चाहता है वैसा धर्म थमा देता है। उसके मन में जिस तरीके की चाहता है बातें भर देता है। और यह सब चलता रहता है। चौदह की उम्र तक चलता रहता है। क्योंकि तुम असहाय होते हो। कर ही क्या सकते हो? पर उसके बाद ये सब जो कूड़ा-कचरा तुम्हें दे दिया होता है इसको जलाने का वक़्त आता है। और अगर उसे जला नहीं रहे हो तो जवान हो नहीं। यह बात मैं बारह साल के बच्चे से नहीं कहूंगा। क्योंकि उसका निर्भर होना पक्का है दूसरों पर। जब दूसरों पर निर्भर हो तो दूसरों के कहे अनुसार चलना भी पड़ेगा। तो इसलिए मैं उस से यह बात करूँगा ही नहीं।

यही है बेचैनी। जो सब भरा हुआ है न मन में। जो सब दे दिया है न दूसरों ने, वही खालीपन है। दूसरों का बहुत कुछ है, अपने का आभाव है।

यही वह रिक्तता है। और यह रिक्तता कुछ लाने से नहीं भरेगी। यह जलाने से भरेगी। जो गन्दगी है उसे जला दो। किसी चीज़  की  ज़रुरत नहीं है। जो पहले ही तुम्हारे मन में बैठा दिया गया है उसे जला दो। सारी बेचैनी हट जाएगी। सब तोड़ दो क्योंकि जो कुछ है वह ज़ंजीरें ही हैं। जो भी टूटेगा वही ज़ंजीर है। तोड़ दो उसे। बिल्कुल बेख़ौफ़ हो कर। मत सोचना कि यह चुनूँ या वह। कुछ बचाने के लिए नहीं है। जाने दो,सब जाने दो।

जवान होना बच्चों का खेल नहीं है।

‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

 संवाद देखें: जवान हो, वाकई?

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १ : मौत नहीं, अनजिया जीवन है पीड़ा

लेख २ : पीड़ा है सहज स्वाभाव से दूरी

लेख ३ : प्रेम – आत्मा की पुकार

4 टिप्पणियाँ

    • Dear Azhar,

      We are glad to share that now seekers from all over the world can get connected with the Master through various initiatives by the volunteers of PrashantAdvait Foundation.

      1. Advait Learning Camps:

      Advait Learning Camps, led by Acharya Prashant, are rare and blissful experiences, giving one the unique opportunity to come close to the forgotten saints and their scriptures, and live amid nature.

      To participate in the camp, write an e-mail to requests@prashantadvait.com
      For more details or queries, you may call: Sh. Anshu Sharma: +91-8376055661

      2. Courses in Realization:

      A Course in Realization, a classroom–based learning program led by Acharya Prashant, is a humanitarian initiative towards disseminating clarity and intelligence in the world.

      Relevant sections from scriptures like Srimad Bhagawad Gita, Upanishads, Brahm Sutras, Ashtavakra Gita, etc. are studied in these courses to unpack the ancient mysteries contained in them.

      Sessions are conducted by Acharya Prashant himself at Advait BodhSthal, Noida.

      To join in, send your application to requests@prashantadvait.com
      or contact: Sh. Apaar: +91-9818591240

      3. Shabda-Yoga Sessions:

      Clarity sessions with Acharya-Ji are like the runways from where one takes-off to the camps. These sessions are famously known as Clarity Sessions and have been attracting genuine seekers of Truth since last one decade.
      They happen twice a week in Delhi-NCR. On all Sundays at 11:00 am and on all Wednesdays at 06:30 pm.

      For those who cannot attend Shabda-Yoga sessions physically, the foundation does online streaming of these sessions via Skype or Webinar. Known as Blessings from Beyond (BFB), this facility helps seekers from across the globe listen to Acharya-Ji while being where they are.

      To receive the blessing, send your application to requests@prashantadvait.com
      or contact: Smt. Anoushka Jain: +91-9818585917

      4. Meet the Master:

      Meet the Master aka MTM is an opportunity to meet Acharya Prashant personally, either in person or online via Skype.

      To meet the Master, send your application to requests@prashantadvait.com
      Or contact: Smt. Anoushka Jain: +91-9818585917

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    • प्रिय अज़हर जी,

      यह वेबसाइट प्रशान्त अद्वैत फाउन्डेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है।

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रही हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से, लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है, आचार्य जी के सम्मुख होकर, उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
      इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर:
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर, आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। निःसंदेह यह शिविर खुद को जानने का सुनहरा अवसर है।

      ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित 31 बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगी।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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    • प्रिय अज़हर जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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