आदर्शों को अस्वीकार करो

श्रोता: कुछ  उपलब्धियां पाने के बाद एक महान व्यक्ति के लिए आसान होता है अपने रास्ते  को बताना और सुनकर ऐसा लगता है कि कितना आसान रास्ता है। क्या हमें भी उसी रास्ते को अपनाना चाहिए, जो उस महान व्यक्ति ने अपने बारे में बताया है? क्या उस रास्ते पर चलकर हम भी वहीं पहूँच जाएँगे?

वक्ता: नहीं बिल्कुल भी नहीं, बल्कि ये कभी कर मत लेना। जो कह रहा है, हो सकता है उसकी भी यही इच्छा हो। और जब तुम सुनोगे तो यही इच्छा उठेगी कि जो रास्ता इस व्यक्ति का था, मैं भी उसी पर चल पडूँ। तुमने कहा न उसको सफलता मिल गयी है, सफलता इसी रास्ते पर चलकर मुझे भी मिल जायेगी। तो मन में यह लालच निश्चित रूप से उठेगा, यहाँ पर बहक मत जाना।

जो  तुमको अपना रास्ता दे, वो तुम्हारे साथ कोई मित्रता नहीं निभा रहा। वो तुम्हें बेचारगी दे रहा है। वो तुम्हें निर्भरता ही दे रहा है। तुम किसी और के रास्ते पर चल कैसे सकते हो? क्या तुम वही व्यक्ति हो? क्या वही इतिहास है तुम्हारा? जब तुम अलग हो, जब तुम विशिष्ट हो, अद्वितीय हो, तो किसी और का रास्ता तुम्हारा कैसे हो सकता है? लेकिन मुश्किल कहाँ पर आती है मुझे वह भी पता है। हमें लगातार आदर्शों का पाठ पढ़ाया गया है। रोल-मॉडल्स! हमें बचपन से ही कहा गया है कि ये लोग ऐसे चले, तुम भी ऐसे ही चलो। और जिन लोगों को आदर्श बना कर प्रस्तुत किया जाता है, बड़ी मजेदार बात है कि वो किसी और के रास्ते पर नहीं चले थे। उन्होंने तो अपना रास्ता खुद बनाया। पर तुमसे कहा जाता है कि तुम उनके रास्ते पर चलो। बात तो बड़ी विपरीत हुई। दुनिया में जो भी व्यक्ति चमका है, ठीक-ठीक बताना, क्या दूसरों की नक़ल करके चमका है? या समझ से ज़िन्दगी बितायी है उसने ? दुनिया के किसी भी क्षेत्र में: विज्ञान, राजनीति, फिलॉस्फी धर्म, कला। तुम किसको महत्व देते हो, उसको जो बने बनाये रास्ते पर चलता गया या उसको जिसने अपने नए रास्ते का निर्माण किया? किनको याद रखते हो तुम?

सभी श्रोतागण: जिसने कुछ नया किया।

वक्ता: जिसने कुछ नया किया, तुम उनके पीछे क्यों चलना चाहते हो? उनसे एक ही चीज़ सीखी जा सकती है, वो क्या?

सभी श्रोतागण: कुछ नया करो।

वक्ता: वही एकमात्र चीज़ है जो किसी और से सीखी जा सकती है – कि जीवन अपनी दृष्टि से जीना सम्भव है। इसके अलावा तुम कुछ और नहीं सीख सकते। किसी से कुछ भी और सीखा तो अपने साथ अन्याय कर लिया। बुद्ध खुद कभी बौद्ध नहीं थे, जीसस खुद कभी ईसाई नहीं थे। ठीक है न? उन्होंने तो कुछ नया ही किया था। बुद्ध क्या थे? हिन्दू थे। जीसस क्या थे? जीसस यहूदी थे। उन्होंने मूलतः क्या किया? कि जो उनको इतिहास ने दिया था, जो उनको घर परिवार ने दिया था, उसको छोड़ कर उन्होंने कुछ और नया, ताज़ा, अद्भुत दिया। और तुमसे कहा जाता है कि तुम वही करो जो उन्होंने कर दिया है। कृष्ण ने गीता किसी और से सुनी थी और इम्तिहान में जाकर लिख दी थी? तो तुम क्यों ऐसे नहीं हो सकते कि तुमसे भी गीता फूटे? तुम किसी और की दी हुई गीता क्यों दोहराते रहते हो? तुम्हारी गीता कब फूटेगी? ‘नहीं सर,वो तो हमारे बूते की बात नहीं है। अब इतने बड़े- बड़े लोग है, जो इतनी बातें कर गए हैं, अरे कोई उनको मानने वाला भी तो होना चाहिए। हम उसके लिए हैं। वो आगे-आगे चल रहे हैं, तो कोई पीछे चलना वाला भी तो होना चाहिए  न, हम उसके लिए हैं । हम भीड़ हैं, जो पीछे-पीछे चलती है। हम कहाँ गीता के गीतकार हो पाएंगे, हमसे थोड़े ही बहेगी गीता? हमें तो बस मिल गयी है। रास्ते दिखा दिए गए हैं, हमारा काम है बस उन पर चलना। समाज में इतने ऊँचे -ऊँचे आदर्श हैं, हमारा काम है,  उनको मानना’।

आदर्शों को अस्वीकार करो 1अब तुम, तुम हो। तुम अपनी पूरी कोशिशों के बाद भी उन आदर्शों को मान पाओगे नहीं। नतीजा क्या होगा? एक बंटा हुआ जीवन। तुम इतनी कोशिश कर लेते हो, ईमानदारी से बताओ, आज तक चल पाये हो उन आदर्शों पर? तुम्हारे सामने बड़े-बड़े रोल मॉडल रख दिए जाते हैं। जैसा जीवन उन्होंने जिया, तुम जी सकते हो क्या? क्योंकि तुम, तुम हो, तुम्हें अपना जीवन जीना है। उन्होंने जो किया, वो उनकी समझ,उनके समय, उनकी अपनी पूरी व्यवस्था से निकला । वो तुम्हारे लिए अनुकूल कैसे हो सकता है? पर तुम लगातार कोशिश यही करते हो कि वैसा बन जाएँ और तुम हर तरीके से नक़ल करने की कोशिश भी कर लेते हो। हमारा सब कुछ नक़ल का ही तो है।

नक़ल मतलब वो जो एक अतीत से आ रहा है, पहले ही हो चुका है अतीत में, और अब हम उसको दोहरा रहे है। जो कुछ भी अतीत में हो चुका है और तुम उसको दोहरा रहे हो, वो नक़ल ही तो है। तुम्हारे विचार तुम्हारे अतीत में पहले किसी और ने दिये, फिर तुमने पकड़ लिए। तुम्हारा धर्म किसी और का दिया हुआ है, फिर तुमने पकड़ लिया। तुम्हारी जितनी उम्मीदें हैं, जितने सपने हैं, वो कोई नए और ताज़े तो नहीं हैं। वो सब इतिहास से ही आ रहे हैं। तुम्हारा जो पूरा जीवन है, वो आदर्शों पर ही चल रहा है। बड़ा आदर्श जीवन है हमारा, बस दोहराना, बस दोहराना और इसी दोहराने के कारण हम हमेशा एक बोरियत के  शिकार रहते हैं, क्योंकि जो कुछ भी पहले से तय है, जो नया नहीं है,  वो मन को सुला देगा, बेहोश कर देगा। उसमें कुछ ऐसा है ही नहीं जो आकर्षित कर सके, जिसमें ज़रा गर्मी हो। तुम्हें पहले ही पता है कि  यहीसब होना है।

तुम आज भी जो कुछ भी करने के लिए तैयार बैठे हो, ईमानदारी से देखो, क्या वो वही सब नहीं है जो हर कोई अतीत में करता आ रहा है। और तुम उसको दोहराओगे ही तो। और क्या करोगे? कोई नयी कहानी लिखने वाले हो क्या? आदर्शों पर ही तो चल रहे हो।

अतीत में अगर किसी ने शादी न की होती और तुम्हें ‘शादी’ शब्द का पता ही न होता, कि विवाह नाम की संस्था जैसा कुछ होता है, ये तुम जानते ही नहीं होते, तो क्या तुम अपनी समझ से विवाह करते? कि मैं पहला हूँ जो करूँगा। तुम ऐसा नहीं करते। तो आदर्शों के कारण तुम विवाह करोगे, आदर्शों के कारण तुम्हारे बच्चे पैदा होंगे। आदर्श ना होते तो बच्चे भी न होते। पुरुष और स्त्री की शादी थोड़े ही न हो रही होती है। एक आदर्श घटना घट रही होती है। ‘अरे  सबने करी है, हम भी कर रहे हैं। तुम समझते भी हो तुम क्या कर रहे हो? नहीं। सब करते हैं। उन्होंने समझा था? उन्होंने समझा होता तो हम कैसे पैदा होते। नासमझी-नासमझी में हम आ गए, तो नासमझी-नासमझी में इस घटना को भी हो जाने दो। जीवन समझने के लिए थोड़े ही है। जीवन तो भूत है। भूत क्या? जो डरावना हो। तो उसी भूत पर हम चले जा रहे हैं। ये सब आदर्श हैं।

ये मत समझना की व्यक्ति ही आदर्श होता है। तुमने कहा सफल व्यक्ति। सफल व्यक्ति आदर्श नहीं होता। सबसे बड़ा आदर्श तो अतीत है। और वो तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा बोझ है, कि मुझे उसको दोहराना है। अतीत ने  तुम्हारे मन में भर दिया गया है कि किस तरह का करियर होना चाहिए। अब वो तुम्हें चाहिए ही चाहिए। बहुत मन को तोड़ने वाली बात है। पर जितना मन को तोड़ेगी, उतना ही तुमको मुक्ति देगी कि हमारा पाना कुछ नहीं है। हमारा प्रशिक्षण सिर्फ दोहराने का है। उसको खोजो जो अपना है और वो बहुत दूर नहीं है। बहुत कठिन नहीं है। मैं तुमसे कोई असम्भव बात नहीं कर रहा हूँ।

उसको खोजो जो अपना है। और वो बहुत दूर नहीं है, बहुत कठिन नहीं है , मैं तुमसे कोई असंभव बात नहीं कर रहा हूं। उसको खोजो जो अपना है। आसानी से  मिलेगा वह, कोई आदर्श काम नहीं आएगा। इसलिए थोड़ा सा डर लग सकता है। तुम्हें कोई प्रमाण नहीं मिलेगा। तुम ये नहीं कह पाओगे कि ये बात ठीक है क्योंकि ये तीन और लोगों ने की हुई है। लेकिन हाँ, उसमें मज़ा बहुत आएगा। और यही प्रमाण है और वो आखिरी प्रमाण है, कि तुम ठीक हो। तुम पहली बार जानोगे कि ज़िन्दगी को प्यार करना किसे कहते हैं, वही प्रमाण है। परन्तु तुम तब प्रमाण मांगोगे नहीं, क्योंकि असली प्रमाण तब मिल चुका होगा। फिर तुम्हारे सामने मंच पर कोई बैठा हो, ऊँची से ऊँची हस्ती, तुम कहोगे, ‘दुनिया के बारे में तुम ज्यादा जानते होगे, अपनी ज़िन्दगी के बारे में मैं ही जनता हूँ, मैं ही जान सकता हूँ’। ठीक है दुनिया की जानकारी मैं तुमसे ले लूंगा, तुम मुझे बता दो अर्थव्यवस्था कैसी है, तुम मुझे बता दो राजनीति कैसी है, तुम मुझे विज्ञान के बारे में कुछ बता दो, टेक्नोलॉजी समझा  दो- ये  सब मैं तुम से ले लूंगा। पर जहाँ तक ज़िन्दगी की बात है, मेरी ज़िन्दगी की बात है, उसका मालिक तो मैं ही हूँ और उसके बारे में तुम कुछ बोल मत देना’।

अगर कोई तुम्हें आचरणबद्ध बातें समझाए, कभी भी स्वीकार मत करना।  कभी भी स्वीकार न कर लेना अगर कोई तुमसे कहे, ‘इस रास्ते पर चला हूँ, बढ़िया है, आ जाओ, चलो पीछे -पीछे’। बिल्कुल मना कर देना। जैसा मैंने कहा कि एक ही मदद है जो ली जा सकती है। क्या? कि अब मैं अपनी दृष्टि से देख पाऊँ। तुम अंधे हो, डॉक्टर के पास गए। जितनी बार तुम उसके पास जाते हो, वो तुमको बता देता है कि देखो इस इस तरीके के रास्ते हैं। शहर में ५० मीटर चलोगे, तो ये चौराहा आ जायेगा। आसमान जैसा कुछ होता है और उसका रंग नीला होता है। तो ये शब्द याद कर  लो- नीला। और वो तुमको सुविधापूर्वक जीने के लिए नक्शे रटा दे। कैसा लगेगा तुम्हें वो डॉक्टर? यह तो कोई डॉक्टर नहीं हुआ, यह तो कोई इलाज नहीं हुआ। असली चिकित्सक तो वो है जो आँखों की रोशनी  वापस  ला दे। उसमें वक्त लग सकता है। पर ध्येय हमेशा यही होना चाहिए। कि आँखें है तो देखें। हाँ आँखें अगर जन्मों से बंद पड़ी हैं, तो देखने में शायद थोड़ा वक़्त लग जाए। पर आँखें हैं तो देखें, मन है तो समझे, और ये श्रद्धा कभी भी अपने भीतर से मत खोना कि मेरी आँखें देखने के काबिल हैं।आदर्शों को अस्वीकार करो 2

हम टूट जाते हैं। हमारे भीतर ये भाव बड़ी गहराई से बैठ जाता है कि मैं नाकाबिल हूँ। इसको मत आने देना। हमारे भीतर ये धारणा सच की तरह बैठ जाती है कि मुझे लगातार मदद पर आश्रित रहना ही होगा। जब भी ये भावना सर उठाये इसको ठुकरा देना । तुम कहना, ‘हो सकता है अभी मुझे बात समझ न आ रही हो, पर इसका ये अर्थ नहीं है कि मैं समझ ही नहीं सकता हूँ। बीमारी पुरानी है, इस कारण हो सकता है कि मैं अभी कमज़ोर हूँ, पर इसका ये अर्थ नहीं है कि मुझे सदा कमज़ोर रहना ही है। चिकित्सा शुरू इसीलिए की जाती है ताकि एक दिन चिकित्सा बंद की जा सके। वो चिकित्सा किस काम की वो अनवरत चलती रहे। अपने भीतर से ये श्रद्धा कभी मत जाने देना कि मूलतः मैं स्वस्थ हूँ, चिकित्सा कुछ दिनों की है। हम स्वस्थ हैं। मेरे पास सब कुछ है, बस छुप गया है। आयेगा सामने, बिल्कुल आयेगा। वह स्वास्थ्य जो किसी और को उपलब्ध हो सकता है, वही मुझे भी उपलब्ध है। तुम्हारे ऊंचे से ऊंचे आदर्श को जो स्वास्थय उपलब्ध हुआ है- कृष्ण को, बुद्ध को- ठीक वही  स्वास्थ्य, ज़रा भी कम नहीं और उससे ज़रा भी अलग नहीं, ठीक वही  स्वास्थ्य तुम्हें भी उपलब्ध है। हाँ वो थोड़ा जागे हुए थे। वो जान गए कि स्वास्थ्य क्या है। तुम अभी थोड़ा नींद में हो, आँखों में नींद भरी है, पर नींद ही भरी है और कुछ नहीं हो गया। कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं हो गया है, तुम पूरे हो, तुम काबिल हो। पकड़ लो इस बात को, और कभी इसको डगमगाने मत देना। कितनी भी हालत ख़राब हो, कितनी भी चोटें लग रहीं हों, समय कितना भी विपरीत पता चल रहा हो, पर फिर भी ये श्रद्धा न हिले। हीनता का भाव मत आने देना अपने कि मुझ में मूलभूत रूप से कोई कमी है। तुममे कोई कमी नही है, मूलभूत रूप से कोई कमी नहीं है। सोचने का ढंग बेशक उल्टा- पुल्टा है, मैं उसको मान्यता नहीं दे रहा हूँ। तुमने अभी अपनी जो हालत कर ली है, वो ज़रूर बीमार की हालत है। पर मूलतः तुम स्वस्थ हो और बीमारी की हालत बस कुछ दिनों की है- ये बात पक्की समझो। कोई तुमसे ऊँचा नहीं है। कोई आदर्श नहीं है, तुम अपने आदर्श खुद हो।

तुममें से आधों के चेहरे पर तो यह लिखा है, ‘सर हम और आदर्श हमारी शक्लें देखिये’। तुम्हें यकीन ही नहीं आता है न? मैं तुमसे कहूँ कि तुममें ये कमी है, तुममें ये खोट है, तो तुम बड़ी आसानी से स्वीकार कर लोगे। पर मैं तुमसे कह रहा हूँ कि मूलभूत रूप से पूरे हो और पक्के हो! ये बात स्वीकार नहीं होती, ये बात अजीब लगती है। क्यों?खतरनाक लगती है। सर क्या मैं वाकई बुद्ध हूँ? हाँ!

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें : आदर्शों को अस्वीकार करो

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १ : सफलता क्या है?

लेख २ : चरित्र, आचरण क्या हैं?

लेख ३ : प्रतियोगी मन – हिंसक मन

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय हिमांशु जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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