मुक्ति कैसे पाऊँ ?

प्रश्न: सर, मुक्ति कैसे पाऊँ?

वक्ता: जो चीज नहीं है, उसे पाया जाता है। एक मोबाइल फोन नहीं है तुम्हारे पास, एक शर्ट नहीं है तुम्हारे पास, तुम बाज़ार जाओगे और उसे पाने की कोशिश करोगे। फोन ख़रीदना है, शर्ट ख़रीदनी है।

सत्य, मुक्ति, समझ, प्रेम और आनंद कहीं से पाए नहीं जाते। यह सब तुम्हें कोई बाहर वाला नहीं दे सकता। इसको ध्यान से समझना। ये तुम्हारा मूल स्वभाव है। इन्हें तुम बाहर कहाँ पाने जाओगे?

किस दुकान से सत्य खरीदोगे, किस किताब से तुम्हें सत्य मिल जाना है, किस गली में जाओगे कि आज यहाँ प्रेम मिल कर रहेगा? कहाँ जाओगे? किस लाइब्रेरी में बैठ कर समझ मिल जाएगी? ये बातें पाई नहीं जाती, ये हमारे पास होती ही हैं। ये हमारे पास होती ही हैं, ये कहना भी ठीक नहीं है। ये हम ही हैं ।

तुम मुक्त हो, बस तुमने मानना छोड़ दिया है।

श्रोता: सर, कैसे माना जाये ?

वक्ता: तुमने बस मान लिया था कि तुम गुलाम हो। वो मानना छोड़ दो ।

श्रोता: सर, कैसे?

वक्ता: अपने आप से पूछो। जिन भी मौकों पर तुम गुलामी की वकालत करते हो। अपने आप से पूछो उन मौकों पर। जैसे कि आज सुबह के सत्र में एक श्रोता ने कहा था कि सर इंजीनियरिंग तो करनी ही करनी है ना, मैं चाहूँ तो भी नहीं छोड़ सकता। मैं ये नहीं कह रहा कि छोड़ दो। मैंने कहा कि ऐसा क्यों है कि मान बैठे हो कि करनी ही करनी है। तब अचानक उसे समझ में आया कि और कुछ नहीं है कोई डर है। पहले वो इस बात को ऐसे माने बैठे था कि जैसे पेड़ पर फूल निकलते ही निकलते हैं, हवा है तो चलनी ही चलनी है, सूरज है तो उगना ही उगना है, ठीक उसी तरीके से मुझे इंजीनियरिंग करनी ही करनी है। मैंने जैसे ही उससे पूछा कि ध्यान से बताओ कि क्यों, तब उसकी समझ में आया कि इसका कोई वास्तविक कारण नहीं है। कोई प्रभाव है मेरे ऊपर, कोई डर है मेरे ऊपर। फिर शांत हो गया, भीतर देखने लगा कि बात क्या है। जिन भी मौकों पर दिखाई दे कि मैं तो गुलाम ही हूँ, पूछो अपने आप से कि ‘क्या सच में गुलाम हूँ या फिर ये गुलामी मैंने पकड़ रखी है? जैसे की मैं कहूँ कि ये माइक छूट नहीं रहा, कोई छुड़ाओ इस माइक को, ये माइक चिपक गया है मेरे हाथ से। और मैंने क्या किया हुआ है?

श्रोता: माइक पकड़ रखा है।

वक्ता: और पूरी दुनिया में ये दुहाई दे रहा हूँ की देखो! कितना अत्याचारी माइक है ये। मुझे पकड़ कर बैठ गया है और मेरा बड़ा शोषण कर रहा है। माइक मुझे पकड़ कर बैठ गया है या फिर मैं माइक को पकड़े बैठा हूँ? गुलामी तुम्हारे ऊपर हावी हो रही है या तुम गुलामी से चिपके हो? अब्दुल, छोड़ना चाहो तो आज छोड़ सकते हो। उसके लिए पहले तुम्हें अपने मन से बातचीत करनी होगी कि ये तूने जो इतनी कल्पनाएँ सजा रखी हैं ये क्या हैं? उसके लिए बड़ी ईमानदारी चाहिए। जो भी बड़ी ईमानदारी से अपने आप से पूछेगा कि मैं ये दिन रात एक ढर्रे पर चला जा रहा हूँ, चला जा रहा हूँ, ये मैं कर क्या रहा हूँ और क्या वास्तव में मैं इतना मजबूर हूँ कि ये करता रहूँ, उसको जवाब मिल जायेगा, अपने आप ही मिल जाएगा।

सच तुम्हारे भीतर ही बैठा है, जवाब दे देगा तुमको। पर अगर तुमने तय ही कर लिया कि ज़िन्दगी ढोंग में बितानी है, तुमने तय ही कर लिया है कि ज़िन्दगी झूठ में ही बितानी है, तो मैं ये ही दिखाऊँगा कि मैं कितना बेचारा हूँ। ‘अरे! ये अत्याचारी माइक छोड़ ही नहीं रहा, मुझसे चिपक गया है’। और पूरी दुनिया में मैं सहानुभूति लूँगा कि बाहर से मुझ पर गुलामी थोपी गयी है। अगर किसी ने यह ठान ही लिया है तो वो कभी मुक्त नहीं हो पाएगा। मुक्ति की कोई तकनीक नहीं है ।

मुक्ति का मतलब है ये जानना कि जितनी भी गुलामी है वो नकली है, मेरी ही बनाई हुई है ।

मेरी मर्ज़ी के बिना कोई मुझे गुलाम नहीं बना सकता। मेरी सहमति के बिना कोई मुझे गुलाम बना नहीं सकता क्योंकि असली गुलामी है मन की। कोई मेरे हाथ-पाँव बांध सकता है पर मैं गुलाम तभी हुआ जब मेरा मन कोई बांध ले। और मेरा मन सिर्फ मैंने बांधा है, कोई और नही बांध सकता। जो मन से मुक्त है, तुम उसे जेल में भी डाल दो तब भी वो मुक्त रहेगा। तुम उसके हाथ-पाँव ही तो बाँध रहे हो ना, उसका मन नहीं बांध पाओगे।

हमारी जितनी गुलामी है, वो मानसिक है। और ये मानसिक गुलामी हमने खुद पकड़ रखी है, इसमें कोई वास्तविकता नहीं है। तुम में से बहुत कम लोग होंगे जो इस बात को मान पा रहे होंगे। सर, वास्तविकता है, मेरी ऐसी परिस्तिथियाँ हैं जिनमें मुझे गुलाम रहना ही पड़ता है। और मैं तुमसे कहूँगा कि ठीक है, फिर से देखो, ध्यान से देखो कि क्या आवश्यक है कि तुम गुलाम रहो। अगर इमानदारी से देखोगे तो दिख जायेगा।

मुक्ति असली है और किसी भी प्रकार की गुलामी मात्र कल्पना। अगली बार जब भी मन बैठने लगे, डरने लगे, उस पर चारों तरफ से जकड़न आ जाए तो एक बात बोलना अपने आप से, “मन है, असली नहीं है, नकली है”।

जब भी डरो तो मन के सामने घुटने मत टेक देना। मन ही तो है। असलियत क्या है इसमें? बस मन ही तो है। इससे ये याद रखने में सहायता मिलेगी कि मुक्ति तुम्हारा स्वाभाव है, गुलामी तुम्हारी कल्पना।

 -‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch?v=i-7A5w1W-LM

3 टिप्पणियाँ

  1. […] लेख १                                    लेख २                                  लेख ३                                लेख ४ […]

    पसंद करें

    • प्रिय इन्द्रपाल जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      पसंद करें

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s