मन नए से डरता है

वक्ता: जब वास्तव में कुछ नया सामने आता है तो हम डर जाते हैं। मस्तिष्क बस एक चीज़ चाहता है; सुरक्षा। बना रहूँ, समय में बना रहूँ, मर ना जाऊँ। और ख़त्म ना होने का उसका जो तर्क है वो ये है कि जो पहले किया हुआ है वही दोबारा करो। जब पहले नहीं मरे तो आगे भी नहीं मरेंगे। ये उसने मरने से बचने का तरीका खोजा है इसलिए तुम नए से हमेशा डरते हो। लेकिन मस्तिष्क का जो बचने का जो तारीका है वो मूर्खता का है क्योंकि मस्तिष्क की दुनिया में नये का अर्थ है पुराने का दुहराना लेकिन अस्तित्व में नया, नया है।

अस्तित्व में नए का पुराने से कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारे सामने जो कुछ भी आता है, हर क्षण, वो पूर्णतया नया ही होता है और पहली बार ही आया हुआ है और वैसा कोई क्षण दोबारा आएगा भी नहीं। अब यहाँ पर बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाती है। एक तरफ तुम्हारा ये मस्तिष्क है जो नए को समझता ही नहीं, पुराने ढर्रों पर चलता है और दूसरी तरफ अस्तित्व है जिसमें पुराना कुछ होता नहीं, सब कुछ नया नया है। चेतना में existence 1पुराना कुछ होता नहीं है और दूसरा छोर है स्मृति का जिसमें सब पुराना ही पुराना है। इन्हीं दो पाटों के बीच में आदमी धंस कर रह जाता है। इसी को कबीर ने कहा था, “दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए”। और वो हम हैं जो पिस्ते रहते हैं। साबुत बचा ना कोई। यही दो पाट हैं। समझ रहे हो ना बात को। कौन से पाट? अतीत और वर्तमान। स्मृति और चेतना। मन अतीत में जीना चाहता है या एक भविष्य ख़ड़ा करता है, और अतीत और भविष्य दोनों ही वर्तमान नहीं हैँ। जीवन हमेशा वर्तमान में होता है। बात समझ में आ गयी है न? जीवन हमेशा वर्तमान में है। मन हमेशा कहाँ है ?

श्रोता: अतीत में।

वक्ता: अतीत में, पीछे या आगे। तुम कहाँ हो ? यहाँ। और मन कहाँ है ? या तो पीछे या तो आगे। पीछे और आगे एक ही बात है। अब आदमी फँस जाता है। क्या  करे? अजीब मुसीबत है। हो वर्तमान में, साँस वर्तमान में ले रहे हो, समझ वर्तमान में रहे हो और मन बैठा हुआ है स्मृतियों में। मन उन्हीं ढर्रों को चलाना चाहता है जो पहले से हैं।

जीवन नया है। आदमी गया फँस। अब क्या करेँ ?

-‘संवाद ‘ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें:Prashant Tripathi: मन नए से डरता है (Mind is afraid of the New)

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १ :नए का आकर्षण, नये की आशंका
लेख २ :अकेलेपन से डर क्यों लगता है?
लेख ३ :डर की शुरुआत