टाल-मटोल की आदत

प्रश्न: सर टाल-मटोल की आदत से कैसे बचें?

वक्ता: क्या तुम इस सवाल को टाल रहे हो अभी? अभी ये सवाल पूछ रहे हो। तुम चाहते तो इसे टाल सकते थे कि ‘कौन पूछे? यहाँ इतने लोग बैठे हैं सभी थोड़े ही सवाल पूछ रहे हैं’, तुमने पूछा उठ कर। तुम चाहते तो इस प्रश्न को टाल सकते थे। पूरी तरह से टाल सकते थे। मैं ज़बरदस्ती तो नहीं कहता कि उठो और पूछो। पर तुमने नहीं टाला। क्यों नहीं टाला अभी? क्योंकि उसे इसमें महत्व दिखाई दिया। जिसमें तुम्हें महत्व नहीं समझ आता, जो तुम दूसरों के इशारे पर बस ज़ोर-ज़बरदस्ती में कर रहे हो, कि किसी ने धक्का दे दिया, तुम धकेले जा रहे हो और कर रहे हो उसमें टालमटोल होती है। तुम्हारे जीवन में इतनी ऊब इसलिए है क्योंकि कुछ भी तुम्हारा अपना नहीं है जीवन में। जब कुछ अपना होता है तो आदमी उसे कभी नहीं टालता। टाल सकता ही नहीं है। कूद-कूद कर करेगा। पूरी ऊर्जा और उमंग के साथ करेगा; जो अपना होता है उसे। और जो कुछ भी दूसरों के निर्देशों पर हो रहा हो, बस एक परंपरा है तो हम भी कर रहे हैं, जो कुछ भी इस तरह होता है, वहाँ ऊब का आना स्वाभाविक है।

अभी नहीं टाला ना इस सवाल को? बस इस बात को याद रखना। अभी नहीं टाला तो मज़ा आ गया। चमक रही हैं आँखें।

श्रोता : सर मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना है और मुझे उसके लिए कितनी महनत करनी है और इसके लिए मैं अपना रवैया बदलने की कोशिश करता हूँ, पर पुराना वाला दोबारा वापिस आ जाता है।

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वक्ता: क्योंकि कोई भी रवैया तुम्हारा है ही नहीं। तुम जो कुछ भी करते हो वह किसी न किसी से प्रभावित होकर करते हो। प्रभाव बदलते रहते हैं तो तुम्हारी दिशा भी बदलती रहती है। ये जो पूल का खेल होता है वह देखा है? उस पर बहुत सी गेंदें पड़ी होती हैं। एक को मारो, दूसरी इधर चलती है, तीसरी उधर चलती है। जीवन हमारा वैसा ही है। हम पड़े रहते हैं, एक गेंद आयी, कट लगा और इधर को चल दिए, हमसे किसी और को कट लगा वो भी चल दिया, और हम किसी से टकराए तो हमारी दिशाएँ बदल गईं। उन गेंदों का अपना कुछ नहीं है। उनमें जितनी गति है वह बाहर से आ रही है। उन गेंदों में अपनी कोई गति नहीं है। वो तो बस पड़ी हुई हैं। कोई बाहर वाला आता है उनको जहाँ धक्का देता है चल देती हैं और बहुत सारी गेंदें हैं तो बहुत सारे प्रभाव हैं। एक गेंद सिर्फ एक गेंद से नहीं टकरा रही, एक गेंद कई गेंदों से टकरा रही है। और हर टकराहट उसकी दिशा को बदल देती है।

तो तुम दो सेकंड के लिए एक तरफ चलते हो और कोई मिला और उसने कहा कि नहीं नहीं, यह करना चाहिए, तो तुम वही करने लगते हो। जैसे वो पुरानी पिक्चर में रामू काका होता था। संयुक्त परिवार है जिसमें चालीस जने हैं। विशाल परिवार और एक रामू काका। रामू काका सुबह-सुबह उठे हैं तो पहला आया। ‘चलो चलो टिफिन साफ़ करो, चलो चलो जूते साफ़ करो’। टिफिन छोड़कर जूते की तरफ भागे, टिफिन रह ही गया। और जूते साफ़ कर रहे हैं तो, ‘चलो चलो गाड़ी साफ़ करो’। गाड़ी साफ़ कर रहे हैं तो एक कहता है, ‘अरे रामू काका, मेरी शर्ट कहाँ है? धोई नहीं?’ रामू काका उधर की तरफ भाग लिए।हम वैसे रामू काका हैं। हमारे सौ मालिक हैं। एक भी तरफ हम पूरी तरह चल ही नहीं पाते। एक तरफ को चलते हैं, दूसरा मालिक आवाज़ दे देता है। पिता की मानने चलते हैं, माँ की आवाज़ आ जाती है। माँ की मानने चलते हैं, भाई की आवाज़ आ जाती है, दोस्त की आवाज़ आ जाती है, शिक्षक की आ जाती है, फिर टीवी पर कुछ दिख जाता है और वह हमारा मालिक बन जाता है, फिर अखबार में कुछ पढ़ लेते हैं तो उधर को चल देते हैं। हमारा अपना कुछ नहीं है। वो है ना कि,

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

हमारा अपना कुछ है ही नहीं। पड़े हुए हैं। जिधर को हवा चली उधर को बह गए। ऐसा तो जीवन है हमारा। अब यहाँ बैठे हैं और एक फ़ोन कॉल आ जाए, ‘चलो उठो घर चलो’ और चल दोगे उठ कर। तब भूल जाओगे कि कुछ मिल रहा है, ध्यान में हो। और चल दोगे घर की तरफ और रास्ते में दिख जाए दो लड़के तुम्हारे जैसे और कहें, ‘चल उधर, बड़ा सही है’ तो उधर को चल दोगे। हर कोई तो तुम्हारा मालिक बना बैठा है। सामने से कोई आ जाए डीन या डायरेक्टर तो क्लास की तरफ चल दोगे। और क्लास की तरफ चलते हुए वहाँ से कोई लड़की निकल जाए, तो उसके पीछे चल दोगे। जिधर जाते हो उधर एक मालिक पैदा कर लेते हो अपना। तुम्हारी अपनी कुछ है समझ? कुछ भी तुम्हारे अपने जीवन में अपने विवेक से होता है? सौ तो तुम्हारे मालिक हैं। इसलिए ये HIDP है ताकि बन सको अपने मालिक आप। खुद!

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: टाल-मटोल की आदत

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १ : सही-गलत के पार

लेख २ : कैसे जानूँ कि मैं सही हूँ? 

लेख ३ : कैसे जियें? 

3 टिप्पणियाँ

    • प्रिय निलेश जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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