दूसरों के सोचने से प्रभावित क्यों हूँ?

वक्ता: सवाल है, ‘कुछ भी करने में एक डर क्यों बना रहता है कि कोई और मेरे विषय में क्या सोचेगा?’ ये डर सिर्फ कुछ स्थितियों में नहीं होता हमारे जीवन में। सच तो ये है कि हमारा जीवन ही डर बनकर रह गया है। एक-एक कदम जो लिया जा रहा है, एक-एक निर्णय, वो दूसरों के प्रभाव में लिया जा रहा है, दूसरों के डर में ही लिया जा रहा है। क्यों डर रहे हैं? इसकी वजह को जानना होगा। ध्यान देंगे तो स्पष्ट हो जायेगी बात।

जो कुछ भी तुम अपना समझते हो वो तुम्हें दूसरों ने दिया है, वो बाहर से आया है। जो कुछ भी है तुम्हारे जीवन में, जिसे तुमने अपना मान रखा है, आया वो दूसरों से है। और दूसरों से मेरा आशय सिर्फ व्यक्तियों से नहीं है , दूसरों से मेरा अर्थ है वो सब कुछ जो तुम नहीं हो। ‘दूसरा’ जब मैं कहता हूँ तो ‘दूसरा’ से मेरा अभिप्राय है वो सब कुछ जो तुम नहीं हो। वो कोई समय हो सकता है, कोई स्थिति हो सकती है, कोई व्यक्ति हो सकता है या कुछ और। जब मेरा सब कुछ दूसरे से आया है तो दूसरा उसे वापिस भी ले जा सकता है। नतीजा- डर। मन में कभी आश्वस्ति नहीं आती कि मैं सुरक्षित हूँ। मन में एक खटका बना रहता है कि कहीं जो मेरा है, जिसे मैं अपना समझता हूँ, कहीं वो चला ना जाए। इसी विचार का नाम कि मेरा कुछ है जो खो जाएगा, इसी विचार का नाम डर है।

‘डर क्या है?’, ठीक-ठीक समझ में आया? डर है ये विचार कि मेरे पास कुछ है जो खो सकता है, मुझसे दूर हो सकता है। दिक्कत उसमें ये है कि जो भी कुछ तुम्हारे पास है, मैं दोहरा रहा हूँ, वो बाहर से आया है। जो कुछ भी तुमने अपना जाना है वो सब बाहर से आया है। नतीजतन मन हमेशा डरा हुआ रहेगा क्योंकि जो बाहर से आया है, जो समय से आया है, जो स्थिति से आया है, जो दूसरे व्यक्ति से आया है उसे निश्चित रूप से समय, स्थिति या दूसरा व्यक्ति ही वापिस भी ले जा सकते हैं।

एक उदहारण लेते हैं। कोई आता है और तुमसे कहता है कि तुम बहुत बुद्धिमान हो। कोई आया और उसने तुमसे कहा कि तुम बहुत बुद्धिमान हो। और ये वाक्य तुम्हारे मन में इन शब्दों में बैठा कि ‘मैं बुद्धिमान हूँ’। उसने कहा, ‘तुम बुद्धिमान हो’ और तुमने कहा, ‘मैं बुद्धिमान हूँ’। तुमने कैसे कहा, ‘मैं बुद्धिमान हूँ’ ? क्योंकि उसने बताया कि तुम बुद्धिमान हो। अब जब उसने तुमको बोला कि तुम बुद्धिमान हो और तुम मान गए तो तुम अब उस पर निर्भर हो गए। अब तुम्हारे मनमें ये आशंका भी आएगी कि कहीं वो ये ना कह दे कल को कि तुम मूर्ख हो। क्योंकि जब तुमने अपने आप को बुद्धिमान माना उसके कहने पर तो तुम्हें अपने आप को मूर्ख भी मानना पड़ेगा उसके कहने से। दरवाज़े खुल गए, अब कुछ भी अंदर आ सकता है। तुम्हारी अपने बारे में भी जो अवधारणा है, वो तुमने किसी और से पायी है। नतीजा- डर। दूसरों ने तुमको सरंक्षण दिया तो मन में डर रहेगा कि संरक्षण कहीं छिन ना जाए क्योंकि दूसरों का दिया हुआ है। तुम्हारा सब कुछ बाहर से आया हुआ है। तुम्हारी अपनी समझ से नहीं। और जो कुछ भी बाहर सेआया है उसको लेकर मन में आशंका बनी ही रहेगी। समय ने दिया है, समय छीन भी सकता है। तुम्हें सारा नाम दूसरों ने दिया है तो इसलिए तुम्हें आशंका रहती है कि कहीं मेरा नाम ना छिन जाए। दूसरों ने दिया है, दूसरे छीन भी सकते हैं।

जो तुम्हारा अपना हो उसको लेकर क्या डर हो सकता है? जो तुम हो ही वो तुम से छीन कौन सकता है? उसको लेकर तुम डरोगे नहीं कभी। कभी नहीं डरोगे। तुम डरते हो चार लोगों के सामने कुछ बोलने में। क्या कभी एकांत में बोलने में भी डरे हो? नहीं। तुम चार लोगों के सामने बोलने में डरते इसलिए हो क्योंकि तुम्हारी सारी प्रसिद्धि, तुम्हारा सारा नाम, उन पर निर्भर करता है, उन्होंने तुम्हें दिया है। तो तुम डरे हुए हो कि कहीं वो उसे वापिस ना खींच ले। आज जिन्होंने तुम्हें नाम दिया है कल कहीं वो ही तुम्हें बदनाम ना कर दें, इसलिए डर। देखो तुम कि तुमने अपने आप को भी दूसरों कि नज़रों में जाना है, अपनी नज़रों में नहीं। तुम्हारा अपना जो सेल्फ- कांसेप्ट है, ये जो पूरी छवि है तुम्हारी, वो तुम्हारी छवि है ही नहीं। वो तो तुम देखते हो कि दूसरे ने क्या सोचा है मेरे बारे में और उसी को आत्मसात कर लेते हो। तुम स्वयं को खुद नहीं जानते। समझ रहे हो बात को ? दूसरों ने कह दिया कि तुम भले, और पांच लोग बोल दें एक के बाद एक कि तुम बड़े अच्छे हो, तो तुमको लगता है कि अच्छा ही होऊँगा इसलिए कह रहे हैं। और किसी दिन अगर दस लोग आकर एक के बाद एक बोल दें कि बड़े बेहूदे हो तो तुम्हें शक पैदा हो जाता है कि कहीं मैं बेहूदा तो नहीं। नहीं तो इतने सारे लोग कैसे कहते?

जो कुछ भी दूसरे से मिलेगा उसके विषय में तुम सदा आशंकित रहोगे। जो कुछ भी तुम्हें किसी और से मिलेगा उसे लेकर हमेशा एकचिंता बनी रहेगी। समझ रहे हो? बस यही कारण है डर का। तो डर कैसे जाएगा? जब जान लोगे कि जो छिन सकता है वो तो वैसे भी तुम्हारा था ही नहीं। और जो तुम्हारा है वो छिन नहीं सकता। जब भी डर उठे तो उस डर को ध्यान से देखो कि इस डर के मूल में कोई न कोई दूसरा बैठा हुआ है। जैसे ही इस डर को ध्यान से देख लोगे, इस डर को समझ लोगे तो पाओगे कि समझते ही ये डर गायब हो गया। डर से लड़ना नहीं है, डर को दबाना नहीं है। डर को समझ लेना है। समझते ही तुम पाओगे कि फ़िज़ूल था और फिर चला जाएगा। फिर कोई दिक्कत नहीं है।

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch?v=O_EpAhKgPf4

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय ऋषभ जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      पसंद करें

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s