काल और कालातीत

नाहं कालस्य, अहमेव कालम|

वक्ता: जगह और समय सिर्फ दिमाग की उपज हैं| हमको ये लगता है कि समय बह रहा है, एक नदी की तरह और हम उसमें हैं| तुम कहते हो कि ४ बजे मैं वहाँ पहुँच जाऊँगा, जैसे कि तुम समय में हो| यहाँ पहली पंक्ति में लिखा है कि मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमें है| मैं जगह में नहीं बैठा हूँ, जगह मुझमें है| तुम कहते हो कि मैं इस कमरे में बैठा हुआ हूँ| नहीं…तुम इस कमरे में नहीं बैठे हो; ये कमरा तुम में बैठा है| पर तुम अगर इस बात को सोचना चाहोगे तो ये दिमाग घूम जायेगा| तुम कहोगे, ‘ये कमरा मुझमें बैठा है तो मैं कहाँ बैठा हूँ? मुझे भी तो कहीं न कहीं होना चाहिए’| और जब तुम कहते हो कि मुझे कहीं होना चाहिए तो तुम फिर कह रहे हो कि मुझे जगह में होना चाहिए| तो घूम-फिर कर ये ख्याल पीछा ही नहीं छोड़ रहा है कि मैं जगह में ही हूँ| ये ख्याल हमारे मन में गहराई से डाल देने में विज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है; हमारी इन्द्रियों का बहुत बड़ा योगदान है और शरीर का बहुत बड़ा योगदान है| तुम शरीर से पैदा होते हो| तुम हर चीज़ शरीर से ही पहचानते हो|

ये जो पहली पंक्ति है नारायण उपनिषद् से है| इस देश में बहुत पहले ये देखा गया कि समय को और मृत्यु को एक ही शब्द देना बहुत ज़रूरी है| इसलिए समय और मृत्यु के लिए ‘काल’ शब्द का उपयोग किया गया| इस ‘काल’ शब्द को तुम दो तरीकों से पढ़ सकते हो|

मैं समय का नहीं हूँ, मैं मृत्यु का नहीं हूँ| मैं ही मृत्यु हूँ, मैं ही जन्म हूँ|

जहाँ काल की बात हो रही हो, वहाँ जन्म की ही बात है| तुम देखो, जन्म को हम क्या मानते हैं| समय चल रहा है और एक समय पर हम पैदा हुये| फिर जीवन शुरु और फिर एक दूसरे समय पर हम मर गए और फिर उसके बाद हम नहीं रहे| इसमें तुमने ऐसा माना कि समय तुमसे बाहर है| तुम नहीं आते-जाते, समय आता-जाता है| तुम अपनी जगह पर हो|तुम समय के बाप हो|

जिसको तुम जन्म बोलते हो, वो तुम्हारा जन्म नहीं है; वो समय का जन्म है| स्मृति सिर्फ समय में रहती है| तो जैसे समय शुरु होता है, स्मृति भी शुरु हो जाती है और हम स्मृतियों से बहुत जुड़े हुए हैं; तो हम सोचते हैं कि हम शुरु हुये हैं| नहीं,तुम्हारी कोई शुरुआत नहीं है| तुम हमेशा यहीं हो| बस समय आता हैऔर जाता है| तुम हमेशा यहीं रहते हो| और उस समय के आने और जाने को तुम जीवन और मृत्यु बोल देते हो| एक बिंदु लो और मान लो कि तुम ये बिंदु हो| अब इस बिंदु से समय बढ़ा और वापस बिंदु पर आ गया| तुम बिंदु हो, पर तुम अपने आप को क्या समझते हो? तुम अपनेआप को समय समझते हो– जो बढ़ा और वापस आ गया| क्यों कितुम अपने आप को समय समझते हो, तो तुम कहते हो कि इस बिंदु से मेरा जन्म हुआ और इस समय में मैं जिया और फिर मेरी मृत्यु हो गयी| हमें ये सब बड़े अच्छे से सिखा दिया गया है और हम इस शरीर से बहुत ज़्यादा जुड़े हुये हैं| इसलिए हमारा मौत पर बड़ा गहरा विश्वास हो गया है| यही कारण है कि हम बड़े डरे-डरे रहते हैं| हमारे मन के जितने डर हैं, मृत्यु के डर हैं| ‘काल’ माने समय, ‘काल’ माने मृत्यु, तो मृत्यु माने समय| अगर हम गहराई से देखें तो सिर्फ एक चीज़ है जो हमें डराती है- समय| हमारे सारे डर, समय के डर हैं| पर मैं समय के बाहर हूँ, मैं मर नहीं सकता| इसका मतलब ये नहीं है कि मैं हमेशा जिंदा रहूँगा, इसका मतलब ये है कि मैं कभी पैदा ही नहीं हुआ था| मैं मर नहीं सकता क्योंकि मैं कभी पैदा ही नहीं हुआ था| अगर तुमको अपने पैदा होने से २ साल पहले की घटना याद हो– तुम किस सन् मैं पैदा हुई हो?

श्रोता: सन् १९९२|

वक्ता: अगर तुम्हें १९८८ का कुछ याद आने लग जाये, तो क्या तुम ये कहोगी कि मैं १९९२ में पैदा हुई? अब १९८८ में तुम घूम रही हो इधर-उधर, इसी शरीर में, तो क्या तुम कहोगी कि मैं १९९२ में पैदा हुई? तुम्हें १९८८ की भी स्मृति आ गयी| किसी को अपने पैदा होने से पहले की स्मृति है? नहीं है ना?अगर तुममें पैदा होने से पहले की भी स्मृति आ जाये, तो क्या तुम कहोगी कि मैं १९९२ में पैदा हुई?

श्रोता: नहीं|

वक्ता: मतलब तुम जिसको पैदा होना कहते हो, जिसको तुम कहते हो जीवन की शुरुआत, वो वास्तव में किसकी शुरुआत है?

श्रोता: स्मृति की|

वक्ता: तुमने धोखे से स्मृति को जीवन समझ लिया है| तुम्हें एक तारीख से पहले का कुछ याद नहीं है| इसलिए तुम बोलते हो, ‘मैं उस तारीख से पहले था ही नहीं‘|

श्रोता: सर, मेरी चेतना कहीं न कहीं मेरे शरीर से जुड़ी हुई है|

वक्ता: इसके लिए एक अच्छा उदाहरण है, पेड़ का| एक पेड़ जिसकी एक छोटी सी बिंदु बराबर जड़ है और उस जड़ से एक बहुत बड़ा पेड़ निकल आया है या फ़िर यह कह लो कि एक छोटा सा बीज है जो मिट्टी में पड़ा हुआ है और उससे बहुत बड़ा पेड़ निकल आया है| वो जो पेड़ है वो समय और जगह है, और जो बीज है वो न समय है और न जगह है| वो जो बिंदु है वो कालातीत है और उसमें से ही समय और जगह निकलती है|

श्रोता २: सर, जो पेड़ है वो समय और जगह इसलिए है क्योंकि वो थोड़े समय के लिए है|

वक्ता: हाँ, वो थोड़े समय के लिए है, वो दिखाई पड़ता है, वो बदलता है|

श्रोता २: जो बीज है वो समय और जगह क्यों नहीं है?

वक्ता: क्योंकि वो अगर समय हो गया तो उसका बीज क्या होगा फिर? वो, वो है जो पहला है, जो अकारण है| समय पूरे तरीके से मानसिक होता है| जब तुम किसी का इंतज़ार कर रहे होते हो तो समय धीरे हो जाता है, जब तुम बहुत खुश होते हो तो समय तेज़ चलने लगता है| तुम्हारा मन अगर रुक जाये तो तुम समय के बारे में कुछ नहीं कह पाओगे| चलो एक सवाल पूछता हूँ| दुनिया में जितने लोग हैं, सब सो जायें, और कोई घड़ी न हो, फिर सब उठें और ये पता नहीं हो कि कब उठे, क्या कोई तरीका है पता करने का कि कितनी देर तक सोते रहे?

श्रोता ३: सूर्योदय और सूर्यास्त देखकर कि रात को सो गये और सुबह उठे|

वक्ता: कोई तरीका है पता करने का कि ३० साल सोये या २० साल या २ दिन? कोई तरीका नहीं है ना? समय मानसिक है| मन सो जाये तो समय ख़त्म हो जाता है क्योंकि मन की दुनिया में सब बदलता रहता है | इसलिए तुम्हें लगता है कि समय चल रहा है| समय नहीं चल रहा, मन चल रहा है|

श्रोता ४: हम डरे हुये भी इसलिए रहते हैं क्योंकि हमें समय पता रहता है कि अब हम ३० साल के हो गये, अब ४० साल के हो गये|

वक्ता: तुम कोमा में चले जाओ और ३ साल बाद उठो, क्या तुम्हें पता होगा कि तुम ३ साल बाद उठे हो? तुम तो उठोगे और कहोगे कि ‘चाय देना| फिर तुम्हें अगर कोई बतायेगा कि तुम ३ साल से बेहोश थे, तब तुम पागल हो जाओगे| समझ में आ रही है बात?

समय तुमसे अलग नहीं है| ये बहुत बड़ी गलतफहमी है कि समय चलता ही रहेगा; हम होंगे या नहीं होंगे| इसलिए लोग ऐसे सवाल भी कर लेते हैं ‘मरने के बाद क्या होता है?’ अगर समय तुम्हारे भीतर है, समय इस दिमाग में चल रहा है तो जब ये दिमाग ही नहीं होगा तो समय कहाँ से होगा? मरने के बाद कुछ नहीं होता क्योंकि समय नहीं होता|

श्रोता ४: तो सर, जब हम कहते हैं कि चेतना हमेशा रहती है, कभी मरती नहीं है, इसका मतलब क्या है?

वक्ता: चेतना कभी पैदा ही नहीं हुई है| चेतना समय के ऊपर निर्भर नहीं है| समय चेतना से निकलता है और उसमें मिल जाता है|

श्रोता ४: समय स्मृति से नहीं आता?

वक्ता: क्या बिना समय के स्मृति हो सकती है? जब तुम कहते हो कि मैं याद कर रहा हूँ, तो तुम किसी समय को याद कर रहे होते हो? समय पहले आता है| ये बात कुछ समझ में आ रही है? ये बहुत क्रांतिकारी बात है| इसलिए ध्यान की इतनी कीमत है| क्योंकि जब तुम ध्यान में होते हो, तो उस समय तुम समय से बाहर हो जाते हो|

श्रोता ४: जब कोई किताब पढ़ते हैं तब भी|

वक्ता: हर समय तुम क्या हो? हर समय, तुम समय हो| जब मन में कुछ चल रहा है, जब भी कुछ बदल रहा है| और बदलना माने समय|काल और कालातीत 1 इस दुनिया में अगर कुछ भी न बदले, तो तुम समय नहीं बता सकते| समय तब तक है जब तक बदलाव है| जैसे अभी है, वैसा ही रहे, तुम भी न बदलो, तुम्हारी कोशिकायें न बदलें, तो समय भी नहीं बदलेगा, समय रुक जायेगा| समय बदलाव है|

श्रोता ४: फिर तो जो घड़ी है वो तो कुछ नहीं है|

वक्ता: घड़ी तो कुछ नहीं है| अगर कुछ न बदले तो समय रुक जाता है| पर हम हमेशा बदलाव में जीते हैं| हमारे मन में विचार बदल रहे होते हैं, दृश्य बदल रहे होते हैं, हम क्या सुन रहे हैं वो बदल रहे होते हैं| इसलिए हम हमेशा एक ऐसी दुनिया में जी रहे होते हैं, जो किसकी दुनिया है?

श्रोता: समय की|

वक्ता: और जो समय की दुनिया है, वो मृत्यु की दुनिया है| इसलिए हम हमेशा डरे-डरे जीते हैं| क्योंकि सब कुछ बदल रहा है| ध्यान में तुम वहाँ पर होते हो, जहाँ कुछ बदल नहीं रहा है, जो सारे बदलाव को जान रहा है| उस समय तुम जीवन और मृत्यु के पार हो जाते हो| ये भी कह सकते हो कि तब हम अमर हो जाते हैं| ध्यान ही अमरता है क्योंकि तब तुम समय के बाहर होते हो| और जब तुम समय के बाहर हो तो कैसे मर सकते हो? तब तुम मृत्यु को भी जान जाओगे| वहाँ समय का कोई सवाल ही नहीं रह जाता|

श्रोता ५: अगर कोई तारीख़ न हो, कोई समय न हो, तो मुझे ये नहीं रहेगा कि मुझे परसों पेपर देना है, उसके अगले दिन ये करना है| मैं सिर्फ आज का देखूँगी कि आज मेरे पास है| आज भी नहीं, बस अभी, बस ‘अभी’ मेरे पास है|

वक्ता: तुम ध्यान में डूब कर कुछ भी करो, ध्यान देना कि तुम्हें समय का पता भी नहीं चलेगा| और तुम ध्यान में जितना डूबोगे, समय से उतने बेखबर हो जाओगे| जब तुम ध्यान में होते हो उस समय तुम समय से बाहर हो जाते हो, तुम काल से कालातीत में आ जाते हो और इसलिए तुम अमर हो| बल्कि तुम एक इंसान भी नहीं रहते क्योंकि इंसान नश्वर होते हैं, तुम भगवान बन जाते हो| ध्यान में तुम भगवान होते हो|

श्रोता ५: ध्यान कहाँ पर होता है? बुद्धि में?

वक्ता: ध्यान बुद्धि में नहीं है| वो बिंदु जहाँ से समय निकलता है, जहाँ से मन निकलता है, अब ये मन उस बिंदु से बाहर रह सकता है या वो उस बिंदु में रह सकता है| वो बिंदु है जहाँ से सब कुछ निकलता है, उसको समुद्र भी कहा जाता है| मन उस समुद्र से बाहर रह सकता है, जैसा हमारा मन आमतौर पर रहता है, या मन उस समुद्र में डूब कर भी रह सकता है| जब मन उस समुद्र में डूबा होता है, उसको ध्यान कहते हैं| तब मन भटका-सा नहीं रहता| जो भी वो कर रहा होता है, अपने स्रोत से जुड़े होकर करता है| सारी मानवता एक भ्रम में जीती है, जिसे समय कहते हैं| हमारी पूरी जिंदगी समय के इर्द-गिर्द बनी होती है| तुम जो कुछ भी करते हो, वो समय पर निर्भर करता है|

श्रोता ५: सोना, उठना, खाना|

वक्ता: सब कुछ|

श्रोता: जब रात को पढ़ना होता है तो हम घड़ी छुपा देते हैं कि हमें समय पता ना चले क्योंकि समय देखूँगा तो नींद आ जायेगी|

वक्ता: हम जो भी करते हैं वो समय पर निर्भर करता है और मज़े की बात है कि समय असली है नहीं, तो हम जो कुछ कर रहे हैं, पूरी दुनिया जो कुछ कर रही है, बड़े से बड़े ज्ञानी लोग जो कुछ कर रहे हैं वो क्या हो गया?

श्रोता: नकली|

वक्ता: जब समय है ही नहीं और पूरी दुनिया समय पर चल रही है तो पूरी दुनिया कैसी है ये? पागल! इसीलिए जिनको भी समझ में आया है, उन्होंनें यही कहा है कि दुनिया बड़ी पागल है|

श्रोता: तो ये जो घड़ी बनायी है, ये भी हमारी सीमा के अंदर है?

वक्ता: घड़ी तो सिर्फ समय को मान्यता देने का एक तरीका है| तुम चाहो तो ये भी बोल सकते हो आज, कि १ मिनट में ४० सेकंड होंगे या १००० सेकंड होंगे| कुछ भी कर सकते हो| वो तो हमने सिर्फ एक मापकरण कर दिया है ना| जब तुमने मान ही लिया है कि समय है तो तुम उसको मापोगे भी| तो मांपने के लिए एक उपकरण रख दिया है और उसको तुम घड़ी बोलते हो| तुमने घड़ी बनायी, ये बहुत बाद की बात है;ज्यादा ज़रूरी बात है कि हमने समय को बहुत महत्व दे रखा है| हम इसे असली मान कर चलते हैं| इसीलिए अगर समय असली है तो बदलाव भी असली हैं| इसलिए हम हमेशा बदलाव चाहते हैं| इसीलिए हम मह्त्वाकांक्षी हैं कि कुछ बदल जाये, कुछ मिल जाये, इसीलिए हमारे इतने सपने होते हैं| ये सब समय से निकल रहा है और कालातीत जो है उस अवस्था में हम होते नहीं|

श्रोता:पर सर बदलाव तो होते हैं, चाहे वस्तुनिष्ठ हों|

वक्ता:हाँ, बदलाव होते हैं| जैसे ये पेड़ है; इसकी पत्तियाँ गिरेंगी| पर ये समझना ज़रूरी है कि सारे बदलाव निरंतर से आ रहे हैं| तो आँखें तो बदलाव दिखायेंगी पर ये पता हो कि ये सारे बदलाव निरंतर से निकल रहे हैं| ये बदलाव इतने असली नहीं हैं जितना वो निरंतर असली है| जैसे कालातीत से काल निकल रहा है तो काल की भी अपनी एक कीमत है क्योंकि निकल तो वो असली से ही रहा है ना! काल का जो पापा है, वो तो असली ही है| पर दिक्कत तब हो जाती है जब हम काल को ही पापा मान लेते हैं| हम समय के पापा को भूल जाते हैं और समय को ही पापा मान लेते हैं|

श्रोता:तो सर हम अपना सारा काम समय के अनुसार करते हैं?

वक्ता: हम अपना सारा काम समय के अनुसार करते हैं और असली को भूल जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि समय ही सबसे महत्वपूर्ण है| हम भूल जाते हैं कि समय से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और है|

श्रोता: – जैसे बूढ़े लोग होते हैं वो कहते हैं कि हम तुमसे बड़े हैं क्योंकि हमें ज्यादा अनुभव है, हमनें ज्यादा समय बिताया है| कोई बूढ़ा है या बच्चा है, चेतना तो कालातीत है वो किसी से भी निकल सकती है|

वक्ता:१००प्रतिशत तुमने सही बात पकड़ ली है| उम्र और अनुभव से कुछ नहीं होता, ये फालतू की बातें हैं| पर हमारी दुनिया ऐसी है जिसमें सब कुछ समय पर निर्भर करता है| जो बूढ़े लोग अपने आप को बड़ी कीमत देते हैं, वो सिर्फ इसीलिए है क्योंकि वो फंसे हुये हैं, समय में|

श्रोता: तो उन्हें लगता है कि हम इतना कर चुके हैं, तो अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए ऐसा कहते हैं|

वक्ता: इसी तरीके से जो जवान लोग अपने आप को जवान बोलते हैं, वो भी समय में फंसे हैं| वो सोचते हैं कि हमारी एक उम्र हो गयी है इसीलिए हम जवान हैं| उम्र से जवान नहीं होते| उम्र तो समय है और समय थोड़े ही तुम्हें जवान कर देगा|

श्रोता १: पर हम इतने ज्यादा फंसे हुये हैं समय में कि अपने आप ही जब जवान होते हैं तो दुसरे विचार हो जाते हैं| जब थोड़ा समय होता है तो दुसरे विचार हो जाते हैं|

श्रोता २:तो सर ये दूसरे विचार जो आते हैं इसे कैसे हटायें?

वक्ता: हटाना है, ये भी तो एक विचार है| यहाँ हटाने की बात नहीं हो रही| हटाने का मतलब ही यही है कि तुमने एक और विचार खड़ा कर दिया| हटाना नहीं है, बस समझना है कि ये सब क्या है|

श्रोता: जानना ज़रूरी है|

वक्ता: एक्शन बहुत बाद की बात है| एक्शन छोड़ो, वो अपने आप हो जायेगा; जानना जरुरी है|

श्रोता: दिमाग कभी बुड्ढा नहीं होगा, चेतना कभी बूढ़ी नहीं होगी?

वक्ता: वो न बूढ़ी है, न बच्ची, वो बस ‘है’|

श्रोता १: सर, उसकी उम्र एक जैसी रहती है?

श्रोता २: उसकी कोई उम्र ही नहीं है|

श्रोता ३: वो कालातीत है|

वक्ता: तुम एक जैसे भी तभी कहते हो, जब वो एक जैसे हैं, समय t=0 और समय t=10 पर| तो एक जैसे कहना भी कोई अक्ल की बात नहीं है| वो बस समय के बाहर है| उसके लिए लोगों ने शब्द बोले हैं – अनंत, कालातीत|

श्रोता: ये जो शरीर है, वो बूढ़ा होकर मर जायेगा| वो समय के अंदर है, पर जो कृष्ण ने भागवत में बातें कहीं, जिद्दु कृष्णमूर्ति ने कहीं, ओशो ने कहीं, वो कालातीत है| वो आज भी है, तब भी थी|

वक्ता: जो कुछ भी असली है, वो कालातीत ही होगा और जो कुछ भी टाइम ख़त्म कर देता है, उसकी वैसे भी कोई कीमत नहीं है| जो कुछ भी कीमती है, समय उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता और जो कुछ भी समय के साथ ख़त्म होता है, उसे ख़त्म होने दो| कोई समय के साथ आया है तो समय के साथ जायेगा| सिर्फ वही कीमती है, जो असली है, कालातीत है| जो भी तुम्हें समय ने दिया है वो ठीक है, पर उसकी कोई बहुत ज्यादा कीमत नहीं है|

हम जिसको पता होना कहते है ना कि मुझे कुछ पता है, तब तुम कह रहे हो कि मैं किसी चीज़ के बारे में सोच रहा हूँ| तुम्हें उस चीज़ के बारे में कुछ भी पता नहीं है, बस तुम उसके बारे में सोच रहे हो और सोचना जानना नहीं है| जबमैं तुम से कहूँ कि तुम्हें जयपुर के बारे में कुछ पता है? तुम कहोगे कि पता है| जिसका बस ये मतलब है कि तुम बस जयपुर के बारे में सोच सकते हो| तो तुम जिसको बोलते हो कि तुम्हें पता है या मैं समझ गया, उसका अर्थ केवल ये है कि मैंने उसके बारे में सोचना शुरू कर दिया और ये इस बात की गारंटी है कि तुम्हें कुछ पता ही नहीं है|

श्रोता: सर, इसका मतलब समझ नहीं आया कि पता भी है फिर भी पता नहीं है|

वक्ता:किसी चीज़ का विचार आपको भ्रम देता है कि आपको पता है|

श्रोता: तो जो आज तक पढ़ा या पता है वो सारा बेकार है?

वक्ता: वो बेकार नहीं है, वो वही है जो वो है| उसे कुछ और मत समझो| तुम विडियो गेम खेल रहे हो, उसे बस विडियो गेम समझो; तुम उसको असली नहीं समझ सकते| जो तुमने आज तक अनुभव किया है, वो बस एक प्रोजेक्शन है| न उसको असली बोलने की ज़रूरत है, न नकली और न कुछ और| बस समझो कि ये क्या है| तो कुछ भी मत बोला करो कि तुम्हें पता है क्योंकि तुम्हें जो वास्तव में पता होगा उसके बारे में बोल नहीं पाओगे| जब तुम्हें वास्तव में कुछ पता चलेगा न तो तुम्हें कुछ पता ही नहीं चलेगा|

श्रोता: शब्दों में नहीं बता पायेंगे|

वक्ता: ऐसा समझ लो कि एक CD है| उसमें कोई जानकारी है, पर वो पढ़ी नहीं जा सकती| वो ऐसे पता चलेगा कि तुममें है वो, पर उसे पढ़ा नहीं जा सकता| जो तुम्हें वाकई पता है, उसका तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा और जो कुछ तुम्हें पता है वो वही है जो CD में बाहर से लोड कर दिया गया है तो उसके पता होने की कोई कीमत नहीं है| जो तुम कहते हो न कि मुझे पता है, वो सब बकवास है, तुम्हें बस वो पता है, जो तुम्हारे दिमाग में ज़बरदस्ती डाल दिया गया है|

श्रोता: तो वो कब हमारे अंदर से आयेगा?

वक्ता: वो तुम्हारे अंदर से कब आयेगा? जब तुम उसके सामने आत्मसमर्पण कर दोगे| जब तुम आत्मसमर्पण कर दोगे तो तुम्हें पता चल जायेगा कि तुम्हें पता है|

श्रोता: सर हम जो भी करते हैं या सोचते हैं वो बाहर से आ रहा है तो इसका ये मतलब है कि ये समय की बर्बादी है?

वक्ता: – इसका मतलब है कि वो सिर्फ समय है, समय की बर्बादी नहीं|

श्रोता: सर, जब किताब पढ़ते हुये ध्यान में होते हैं, वो कालातीत है?

काल और कालातीत 2 (1)वक्ता: हाँ, पर जब तुम किताब पढ़ रहे हो और ध्यान से पढ़ रहे हो तो तब तुम्हें किताब के शब्दों से कोई लेना-देना थोड़े ही ना है| अभी अगर तुम मुझे ध्यान से सुन रहे हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कह रहा हूँ| अगर तुममुझे वाकई ध्यान से सुनोगे और मैं अचानक फ्रेंच में बोलना शुरू कर दूँ तो भी तुम्हें कोई अंतर नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम्हें शब्दों से कोई लेना देना ही नहीं होगा| मैं जो कह रहा हूँ वो शब्द ही है ना? ये बहुत काम के नहीं है| असली चीज़ ये है कि तुम सुन रहे हो और तुम मेरे शब्दों को नहीं सुन रहे हो;तुम बस सुन रहे हो| सुनने का कभी कोई सेंटर नहीं होता कि मैं तुम्हें सुन रहा हूँ, नहीं| तुम सुनने की स्थिति में हो| अगर तुम सही में सुन रहे हो तो फर्क नहीं पड़ता अगर में रशियन बोलने लग जाऊँ, तुम सुनते रहोगे और सब कुछ समझोगे भी|

श्रोता: – तो सर हम कैसे समझेंगे कि आप क्या कह रहे हो?

वक्ता: सिर्फ शब्द समझे जाते हैं और शब्द वैसे भी तुम्हें कुछ देंगे नहीं| शब्द तुम्हें बस वो चीजें देंगे जो समय और जगह में सीमित है| जो यहाँ हो रहा है, वो शब्दों में नहीं हो सकता|

श्रोता: सर समझ नहीं आ रहा|

वक्ता: तुम अगर ध्यान से सुनो तो मैं बोल रहा हूँ या ये कुर्सी खाली हो फर्क नहीं पड़ता और अगर तुम ध्यान से सुनो तो यहाँ मैं बोल रहा हूँ या एक बच्चा बैठा दिया जाये और वो हाथ-पैर इधर-उधर मार रहा हो, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता|

श्रोता: कोई अगर बोलेगा नहीं तो हम कैसे सुनेंगे?

वक्ताशब्द नहीं सुने जाते, शांति सुनी जाती है|

श्रोता: जैसे आप बोल रहे हो तो हम एक भाषा के द्वारा समझ रहे हैं|

वक्ता: तुम शब्द इस्तमाल कर रहे हो| कान शब्दों को दिमाग तक ला रहे हैं पर वो बस सुनना है, समझना नहीं है| अगर शांति ना हो सुनने के पीछे तो वो सुनना बेकार है और अगर शांति है ही तो सुनने की वैसे भी कोई ज़रूरत नहीं है| तो सुनना बस इतना ही अच्छा है कि वो तुम्हें शांति के करीब ला सके| सबसे अच्छे शब्द वो हैं जो तुम्हें शांति के करीब ले आयें|

श्रोता: शायद हमने सुनने को बस ये देखा है कि कोई बोलता है और हम सुनते हैं|

वक्ता: वो सुनना नहीं है| वो काम तो कोई मशीन भी कर सकती है|

श्रोता: तो सर फिर सुनना क्या होता है?

वक्ता: तुम ध्यान दो तभी समझ आयेगा| समझना सुनने के पीछे की शांति है|

श्रोता: सर, मुझे किताब वाला समझ नहीं आया| जैसे कोई किताब पढ़ रहा है तो उस समय में….

वक्ता: जिसको तुम कहते हो पढ़ना वो सिर्फ जानकारी इकट्ठा करना है|

श्रोता: नहीं, जैसे फाउंटेनहेड (आयन रैंड का उपन्यास) पढ़ रहे हैं और ध्यान आ गया, तो तब ऐसा लगता है कि हम ही होवर्ड रॉर्क हैं, तो कालातीत हो गयी? पर उसको पढ़ के हमने कुछ पाया नहीं|

वक्ता: कौन पायेगा?

श्रोता: मन|

वक्ता: इकट्ठा करोगे कुछ| सारा इकट्ठा करना बदलाव है| जब तुम कहते हो कि पाना या कुछ करना तो ये सब बदलाव है| जो भी कुछ बदल रहा है, वो समय के अंदर है और वो ज्यादा कीमत का है नहीं| कुछ भी पढ़कर एकमात्र फायदा ये हो सकता है कि तुम चुप हो जाओ| जो पढ़कर तुमने कुछ पा लिया, लगे कि ये मिल गया, वो मिल गया, तब तो फिर तुमने अपने आप को और धोखा दे दिया| तुमने जानकारी इकट्ठी कर ली है, तुम विश्वकोश बनते जा रहे हो|

श्रोता: – तो सारी जानकारी इकट्ठा करना बंद कर दें?

वक्ता: तुम्हारे बस की है बंद करना? आँखें खुलेंगी, जानकारी आ जायेगी;कान खुलेंगे, जानकारी आ जायेगी| जानकारी इकट्ठा होना तो चलता रहेगा| तो जानकारी तुम्हारे अंदर भरी जाती है, पूरे समय|

श्रोता १: सर, हम असलियत में देख क्या रहे हैं?

श्रोता २: कालातीत को देख रहे हैं|

वक्ता: हम कह रहे हैं कि तुम भगवान हो|

श्रोता १: हर चीज़ भगवान है| तुम्हें उसके बारे में पता है और तुम्हें पता भी नहीं है| तुम उसके बारे में जान भी नहीं सकते|

श्रोता २: तुम उसका वर्णन नहीं कर सकते|

वक्ता: तुम वो ही हो और तुम उसे जानते भी नहीं हो और कोई साधन भी नहीं है उसे जानने का| जो भी तुम जानते हो वो बकवास है| जितना तुम जानते हो कि तुम उसे जानते हो, उतना ही तुम सिर्फ जानकारियों में भटक रहे हो|

श्रोता: सबका बाप|

वक्तातुम अपने बाप हो| तुम अपने बाप से दूर भाग रहे हो| भगवान की नयी परिभाषा: वो जो अपना बाप हो, वो जो अपने आप को जन्म देता हो|

श्रोता १: मौत भी?

श्रोता २: भगवान सब कुछ है|

वक्ता: और कुछ भी नहीं है|

श्रोता: सर, हम भगवान कैसे हैं?

वक्ता: – ये थोड़े ही भगवान है जो लाल शर्ट पहन कर बैठा है| तुम्हारा एसेंस भगवान है|

श्रोता: सब कुछ भगवान है, ये पेड़ भगवान है, सब कुछ|

वक्ता: आमतौर पर तुमसे कोई कहे कि तुम भगवान हो तो कितना मज़ा आयेगा| ये दुनियासमय है| ऐसा कोई रास्ता नहीं है कि ये दुनिया बदलाव से भाग सके| ये बात इस दोहे में कही गयी है:-

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद|

जगत चबेना काल का, कुछ मुख मह कुछ गोद||

समय बैठा हुआ है और उसके गोद में पॉपकॉर्न की तरह दुनिया रखी हुई है| जैसे आप मूवी देख रहे हों और एक पॉपकॉर्न का डब्बा आपकी गोद में रखा हुआ है| कुछ आपने खा लिया है और कुछ आपकी गोद में रखा है और आप खाये जाओगे| तो कबीर कह रहे हैं कि ये जो दुनिया तुमने बसा रखी है, ये समय की गोद में पॉपकॉर्न की तरह है| कुछ उसने चबा दी है और कुछ वो चबाने को तैयार है, पर फिर भी तुम फालतू की ख़ुशी मानते रहते हो कि झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद | मोद माने आनंद और मन में बड़ी प्रसन्नता मनाते रहते हो|

श्रोता: – जैसे मैंने ये चीज़ पा ली है|

वक्ता: तुम समझ भी नहीं रहे हो कि तुम मौत की गोद में पॉपकॉर्न की तरह बैठे हुये हो और थोड़ी देर में वो तुमको चबा जायेगा|

श्रोता: वो दुसरा वाला भी तो दोहा है, कली और माली वाला|

वक्ता:

मालिन आवत देख के, कलियन करे पुकार|

फूले फूले चुन लिए, काल हमारी बार ||

जो कुछ भी तुम कोशिश कर रहे हो पाने की, जानने की, ये तो सब ख़त्म होना है और ये पक्का है कि इससे तुम्हें कुछ मिल नहीं सकता| बिल्कुल भिखारी मरने वाले काम हैं ये सब और इस बात को समझ लो कि इस दुनिया में सब भिखारी मरते हैं| एक-से-एक खुद्दार आदमी, अमीर आदमी, सब भिखारी मरते हैं क्योंकि जो चीज़ सबसे कीमती है, ‘उनका होना’, वो तो बचता ही नहीं| मरते-मरते सब में लालच रह जाता है , इसीलिए सब डरते-डरते मरते हैं| सिर्फ वही वास्तव में जीता है, जो कालातीत को जान ले| समय में जो भी करोगे वो काम चलाऊ है| समय की इतनी कीमत है कि अभी कोई आ जाये कि निकलो समय हो गया है| पर इससे ज्यादा नहीं होना चाहिये|

एक दिन खड़े हो जाओ और देखो नीचे से गाड़ियाँ निकल रही हैं और कहो कि ये सब कहाँ जा रहे हैं?

ज़वाब आयेगा, मरने|

किसी को रोको और कहो कि तुझे पता है, ‘तू कहाँ जा रहा है’? वो बोले तो कहो कि ‘मरने जा रहा है’|

देख लो, शरीर का मरना तो पक्का है| कालातीत को उससे पहले जान सकते हो तो जान लो| समय तो आ रहा है, खाने के लिए| कई बार संवाद में प्रश्न आता है कि जिंदगी का मकसद क्या है? अब तुम समझ गये हो कि जिंदगी का सिर्फ एक ही मकसद है, मौत|

श्रोता: पर मौत तो सिर्फ इस शरीर की होती है|

वक्ता: तो वो जो सवाल पूछ रहा है, उसके लिए जिंदगी भी तो ये शरीर ही है|

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: काल और कालातीत

इस विषय सम्बंधित लेख

लेख १ : समय, साधना और सुरती

लेख २ : समय का मन और समय के पार

लेख ३ : वर्तमान समय का क्षण नहीं

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय प्रभाकर जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s