डर (भाग-१): डर की शुरुआत

ज्ञानेन्द्र: सर, जब बचपन से ही डर ठूंस ठूस कर भर दिया गया है तो अब क्यों ‘फियरलेसनेस’ करवा रहे हैं?

वक्ता: “फटे दूध को मथै न माखन होए”| गाड़ी छूट गयी है, ज़िन्दगी खत्म हो गयी है, अब कुछ बचा नहीं, अब तो घर जाओ, खेल खत्म, अगले खेल में देखा जायेगा| होता है कई लोगों की मान्यता, पुनः जनम वगैरा| अब कुछ नहीं हो सकता ज़िन्दगी खत्म हो गयी है|

ज्ञानेन्द्र, बात तुमने मूल रूप में ठीक बोली है, तथ्य तुमने ठीक पकड़े कि बचपन से ही मन में डर बैठाया जाता है| तुम छः महीने के थे तब भी डर का प्रयोग किया गया, तुम दो साल के थे, तब भी तुम पर डर आज़माया गया| कुछ खा लो, आँख दिखा कर कहा गया| तुम पांच साल के थे, और ठीक से लिख नहीं पा रहे थे तब भी डर का प्रयोग हुआ| तुम्हें परीक्षाएं देनी थी तब भी मन में डर ही था कि अगर इतने नहीं आये तो मैं किसी काबिल नहीं रह जाऊंगा; पढाई में भी डर| नौकरी में भी डर| तो बात तुम्हारी, सुनने में ठीक लगती है| लेकिन एक बात बताओ, छः महीने का बच्चा, दो साल का बच्चा, दस साल, पंद्रह साल; हाँ ठीक है अभी नासमझ है| बाहर से उसे जो कुछ भी दिया जाता है उसे स्वीकार करना ही पड़ता है| तुम हो अभी क्या छः महीने के, या दो साल के, या दस साल के? आज क्या मजबूरी है? हाँ तुम्हारे अतीत में ऐसा बहुत कुछ है जो ज़बरदस्ती का है, जो नासमझी है, जहाँ तुम्हारा कोई बस नहीं चला| यहाँ से चालीस-चालीस कोस दूर तक जब रात में बच्चा रोता है तो माँ कहती है बेटा सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा| आज भी गब्बर आ रहा है क्या? आज भी सोने के लिए गब्बर की लोरी सुनते हो? अब, आज तो न वो बच्चा है, न वो डराने वाली आवाज़ है, न गब्बर का खौफ़ है| आज क्यों डरे हुए हो, बच्चे के सामने कोई विकल्प नहीं था| वो आश्रित था और नासमझ था| तुम क्यों आश्रित और नासमझ, दोनों बने हुए हो? आज परिपक्व हो| खूब उम्र हो गयी है तुम्हारी, पढ़े लिखे हो| आज डर का क्या कारण हो सकता है? क्यों उसको पाल के बैठे हो?

याद रखना ये बात ज्ञानेन्द्र, हम आठ-दस साल के बच्चे से तो बोलने भी नहीं जाते, कि डर को पीछे छोड़ और ये कर और वो कर, क्योंकि उसकी ज़िन्दगी में डर का आना पक्का है| एक तरह की अनिवार्यता है| और उसकी ज़िन्दगी में डर का उपयोग भी है क्योंकि बहुत सारी बातें वो समझेगा भी नहीं, वहाँ पर कई बार आवश्यक हो जायेगा कि सिर्फ़ डर का ही इस्तेमाल कर के उसकी भलाई के लिए ही उसको रोका जाये| आप उसे नहीं समझा पाओगे| बच्चा अगर बहुत छोटा है और नहीं समझता कि इलेक्ट्रिक करंट क्या होता है, और वो बिलकुल तैयार है कि सॉकेट में ऊँगली डाल ही देनी है|तो आप को यही कहना होगा कि अगर ऊँगली डाली तो बिल्ली उठा ले जाएगी तुमको या बाबा आएगा और झोली में डाल कर कहीं… तुम उसे कैसे समझोगे कि इलेक्ट्रिक करंट क्या होता है और जो तुम्हारी बॉडी है ये कंडक्टर है, और क्या प्रभाव होगा तुम्हारे नर्वस सिस्टम पर विद्युतीय  प्रवाह का; कैसे समझोगे? तो वहाँ पर डर की थोड़ी उपयोगिता हो जाती है, पर आज ऐसा कुछ नहीं है जो तुम जान नहीं सकते, समझ नहीं सकते| तुम अगर आज भी डरे हुए हो तो फिर डर में तुमने कोई स्वार्थ खोज लिया है|

 बच्चे का डरना मैं एक बार समझ सकता हूँ, तुम्हारा डरना नहीं समझ सकता| हमें ढूँढना पड़ेगा कि हमने डर को क्यों पाल लिया? हमारे पास अपनी आखें हैं, समझ है, दुनिया को देख सकते हैं, पढ़ते हैं, टेक्नोलॉजी भी जानते हैं, हमें कैसा डर, किस बात का? डर में एक गहरा स्वार्थ छिपा हुआ है| जानते हो स्वार्थ क्या है? डर दीवार की तरह होता है, डर कहता है मेरे भीतर रहो बाहर खतरा है, जैसे दीवारें होती हैं ना, इनके भीतर रहो बाहर खतरा है, बड़ा खतरा है, हत्यारे घूम रहे हैं, बेरोज़गारी घूम रही है, भीतर रहो सुरक्षित रहोगे| और इस भीतर रहने में हमने अपनी सुविधा ढूँढ ली हैं, डर के भीतर बने रहने में| डर तुम्हें सुविधा देता है, अपने अतीत को ही आगे बढ़ाते रहने की| ये कमरा है, इसमें मैं बचपन से रहा हूँ, मैं इसको जानता हूँ, और इन दीवारों के बहार खौफ़ फ़ैला हुआ है, मैं नहीं जाता बाहर, मुझे इसी में रहने दो ना| मुझे बाहर जाना ही नहीं है| हमारा जो आलस है उसको सहारा देता है डर, हमारे ढर्रों को चलते रहने की सुविधा देता है डर| जो आदमी निडर हो गया उसके लिए दीवारें शेष रहेंगी नहीं| दीवारें हैं तो बंधन, लेकिन हमने उनसे जोड़ लियें हैं अपने स्वार्थ, क्या स्वार्थ हैं दीवारों से, सुरक्षा की अनुभूति होती है| डर के भीतर बने रहो सुरक्षित महसूस करते हो|

जैसे भी हैं ठीक हैं यहाँ पर, वो बात बच्चे के लिए समझ में आती है कि अभी उसमें काबिलियत ही नहीं है कि वो बाहर निकले और दुनिया को देखे, अपने दायरों को तोड़ पाएँ | तुम्हारे लिए वो बात वाजिब बिलकुल भी नहीं है| दीवारों से तुम्हें और भी कुछ मिलता है, दीवारें बांटती हैं, दीवारें कहती हैं, कुछ लोग हैं, जो हमारे भीतर हैं इस कैद के, इस कमरे के, और कुछ है जो इसके बाहर है| अंदर कौन है? जिनको मैं लगातार जानता ही आया हूँ, बाहर कौन है? जो अनजाने हैं| भीतर कौन है, मेरे घर परिवार वाले वो सब लोग जिनसे अतीत में मेरा संपर्क रहा है| ये मेरे जाने पहचाने लोग हैं इनके साथ सुविधा है| और बाहर कौन है, वो लोग जो नये हैं जिनको कभी जाना नहीं, जिनसे दूर ही रहा|

हिन्दू हूँ अगर मैं, तो इस कमरे के भीतर, इन दीवारों के भीतर सिर्फ हिन्दू भरे हुए हैं| बाकी सब बाहर और मैंने अपने आप को विश्वास दिला दिया है कि वो बहुत खतरनाक लोग हैं| खौफ़ है, जो भी कुछ मेरी पहचानें है, वो तो सब इन दीवारों के भीतर ही हैं| और जिनसे मेरी पहचान नहीं, जो मेरी पहचान से बाहर के हैं, वो सब इन दीवारों के बाहर हैं| मेरे अहंकार को पोषण देता है डर| आज तुम्हारे लिए डर का यही महत्व है| और इसी कारण तुम डर को छोड़ना नहीं चाहते| वरना कोई वजह नहीं कि तुम डर को न छोड़ दो| तुम सब काबिल लोग हो और डर लेकर तुम पैदा नहीं हुए थे, कि तुम कहो कि नहीं सर डर को कौन छोड़ पाया|सब काबिल लोग हो, सब छोड़ सकते हो| निर्भयता स्वाभाव ही है तुम्हारा| पर छोड़ोगे कैसे? क्योंकि उसी डर से तो तुम्हारे अहंकार को खुराक मिल रही है| मैं क्या हूँ, ये तुम्हारे डरों द्वारा ही निर्धारित हो रहा है| बड़ा मुश्किल हो जायेगा तुम्हारे लिए ये कह पाना कि मैं किसी एक देश का हूँ, अगर दूसरे देशों का डर ही मिट जाये| बड़ा मुश्किल हो जायेगा तुम्हारे लिए ये कहना कि मैं कुछ भी हूँ अगर उससे बहार जो कुछ है उसका डर खत्म हो जाये| डर का अर्थ है परायापन| जहाँ परायापन है वहीँ डर है| परायेपन का एक बड़ा लाभ ये है कि उससे अपनापन पुष्ट होता है|डर का अर्थ है परायापन l

अपने तभी तो हैं न जब कुछ पराये बने, और यही पराये डराते हैं| बात देख पा रहे हो? किसी को अपना कह पाने के लिए अति आवश्यक है कि दूसरों को पराया कहो, वरना अपना कैसे कह पाओगे| किसी को भी अपना तभी कह सकते हो जब साथ में परायों का निर्माण करो| और जहाँ पराये हैं, वहीं डर है| वही पराये इन दीवारों के बाहर खड़े हैं, और जहाँ तुमने अपने बनाये नहीं, मेरे, मैं, यही सब अहंकार है| और इसी पर हम जी रहे हैं| यही वो स्वार्थ है जिसके कारण हम डर को पकड़ कर बैठे हुए हैं| नहीं तो कब का छोड़ देते| ध्यान देना ज्ञानेन्द्र, मैं कह रहा हूँ, बच्चे के लिए ये उत्तर वैध्य नहीं है| पर हमारे लिए है, क्योंकि हम में से कोई बच्चा नहीं है| हमने जानते बूझते पकड़ रखा है डर को| आज चाहोगे, आज छोड़ सकते हो| आज चाहोगे, अभी छोड़ सकते हो| अभी इसी समय, कोई दिक्कत नहीं है| एक विचार भर है डर, कि दुनिया में कुछ ऐसा है जो खतरनाक है| इसी विचार का नाम डर है| मुझे खतरा है| इसी विचार का नाम डर है| मैं जो हूँ, इन दीवारों के भीतर हूँ| यहीं मेरा सब कुछ केन्द्रित है, सीमित है| और बाहर जो खौफनाक दुनिया है वो मुझसे कुछ छीनने पर अमादा है, इसी का नाम डर है| जिस दुनिया को तुम जानते नहीं, उसको तुम कैसे कह सकते हो कि तुमसे कुछ छीन लेना चाहती है| भविष्य को लेकर डरे रहते हो पूरी दुनिया भविष्य को लेकर आशंकित रहती है| और भविष्य किसी ने देखा क्या? पर डर सबको उसका है जिसको तुम जानते नहीं|

जिन लोगों को, जिन समुदायों को तुम बिलकुल नहीं जानते, बड़ी मज़ेदार बात है, कि तुम सबसे ज्यादा उन्ही से डरते हो| जिसको तुम जान गये, जिसके संपर्क में आ गये, पूरे कांटेक्ट में, उससे डरने का कोई कारण ही नहीं रह जाता| डर हमेशा, दोहरा रहा हूँ, पराये का होता है| डर हमेशा अनजाने का होता है, डर हमेशा अजनबी का होता है| और अजनबी कोई है नहीं, तुमने बना रखा है, ये दीवारें खड़ी करके| इस अजनबी को पैदा करने वाले हम ही हैं, ज्ञानेन्द्र| पहले तो हम दीवारें खड़ी करते हैं फिर कहते हैं दीवारों के बाहर राक्षस घूम रहें हैं| ऐसी दीवारें खड़ी करी हैं हमने जिसमें न दरवाजे हैं न खिड़कियाँ हैं| बाहर झाँक पाने का कोई ज़रिया ही नहीं छोड़ा| दुनिया है क्या? ये आँख खोल पाने का कोई साधन हमने छोड़ा नहीं है| और अगर कभी धोखे से ही हमें कोई मिल जाये छोटा सा झरोखा, जिससे हम बाहर झांकने लग जाएँ, तो कमरे के भीतर जो हैं, कैद के भीतर जो हैं, वो पकड़ कर वापस खीचतें हैं| बाहर झांकना मत, झांकने भर से ही नुकसान हो जायेगा| तुम्हें झांकने भी नहीं दिया जाता, देखने भी नहीं दिया जाता| बस डरे रहो, सहमें रहो और इस दुनिया के भीतर बैठे रहो| मिल जाने में आनंद है, उत्सव है, दीवार को ढहा देने का ही नाम प्रेम है| और जहाँ प्रेम है वहाँ डर नहीं होता| वो हमारी ज़िन्दगी में मौजूद नहीं, तो ताज्जुब क्या है, कि ज़िन्दगी डर से ही भरी हुई है|

बात समझ रहे हो ना? डर को हमने पाला है, डर से हमने अपनी पहचान बना ली है| मैं क्या हूँ, मैं ये हूँ| ये कौन है, जो इनसे जुड़ा हुआ है| और इनसे अलग है| जिनसे जुड़ा हुआ हूँ उनसे क्या है आकर्षण, पहचान| और जिनसे अलग हूँ उनसे क्या है अजनबीपन, खौफ़, डर| ये दीवार ये पहचानें क्यों खड़ी कर रखीं हैं? इनको गिरा दो| डर का कोई कारण नहीं बचेगा| जो कुछ तुम्हें सीमित करे, एक छोटा सा सूत्र दे रहा हूँ, “जो कुछ तुम्हें सीमित करे वही तुम्हारे डर का कारण है”| जो भी तुम्हें सीमित करता है, जो भी तुम्हें बंधन में डालता है वही तुम्हारे डर का कारण है| बंधन बड़ा मीठा लग सकता है, रिश्तों के नाम पर आ सकता है, सुरक्षा के नाम पर आ सकता है, सुविधा के नाम पर आ सकता है| किसी भी नाम पर आ सकता है| मोह हो सकता है| पर उसी से डर पैदा होगा, समझ रहे हो बात को| तुम्हारे गहरे से गहरे डर में भी कोई असलियत नहीं है| वो सिर्फ खुद पाला हुआ एक विचार भर है| कोई असलियत नहीं है उसमें | जिन दीवारों की मैं बात कर रहा हूँ, ये ईंट पत्थर की नहीं हैं| ये मानसिक हैं| तुमने पाल भर रखी हैं| अभी छोड़ो|

दोहरा रहा हूँ – अभी छोड़ो| अभी छूटेंगी| और प्रमाण दूं उसका, आज का ये पहला सवाल है| कितने ही लोग उत्सुक होंगे ये बात करने के लिए| पर उन्होंने अपने चारों ओर दीवार बनी रहने दी|और ऐसा नहीं है कि ज्ञानेन्द्र मांस, हड्डी का नहीं बना हुआ हैं, ऐसा नहीं है कि डर इसको नहीं उठा होगा, पर इसने कहा ठीक है, जो करना है सो करना है, हम नहीं देते अहमियत दीवारों को, और बात कर ली| कर ली न ज्ञानेन्द्र और बोल दिया बड़ी सहजता से| क्या हुआ था जब बोल रहे थे हाथ पाँव कापें थे, कुछ विशेष हुआ था? कुछ नहीं ना? बहुत आसान, सधारण सी घटना थी| पर हम में से बहुत सारे लोग सिर्फ इस विचार में रह जाते हैं कि कभी और करेंगे| दीवारें अभी खड़ी रहने दो किसी और दिन गिराएंगे| जिसे गिरानी है वो अभी गिराएगा| यही है मौका| और यहाँ भी एक बात ध्यान रखना, डर तुम परायों से ही रहे हो| जो तुमने बहुत सारे पराये खड़े कर रखे हैं ना, दीवारों के बाहर, डर तुम्हें उनका ही है| इस ख़ास मौके पर जानते हो पराये कौन हैं? वो तुम्ही लोगों में से हैं| तुम यहाँ अकेले बैठे हो| तुमको मुझसे कोई बात करते हुए बिल्कुल कोई झिझक होगी नहीं| मैं हूँ और तुम यहाँ बैठे हो| तुम खुल कर के जो कहना है कहोगे| पर अभी यहाँ एक बड़ी भीड़ है और इस बड़ी भीड़ में तुम्हारे लिए हर कोई पराया है| तुम्हारी सीमित दीवार के बाहर का है और तुम उससे डरे हुए हो|

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: डर (भाग-१): डर की शुरुआत

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १ : डर (भाग-३): डर से मुक्ति

लेख २ : डर-डर के मर जाना है?

लेख ३ : डर आता है क्योकि तुम उसे बुलाते हो

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3 टिप्पणियाँ

    • प्रिय अक्षित जी,

      यह वेबसाइट प्रशान्त अद्वैत फाउन्डेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित है एवं यह उत्तर भी उन्हीं से आ रहा है।

      बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से, लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
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      इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

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      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर, आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। निःसंदेह यह शिविर खुद को जानने का सुनहरा अवसर है।

      ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित 31 बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
      सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें:
      श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।

      सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें:
      सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।

      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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