डर (भाग-३): डर से मुक्ति

राहुल: सर, डर नहीं तो प्रतियोगिता नहीं, कम्पटीशन नहीं, और कम्पटीशन नहीं तो प्रगति नहीं| जहाँ हैं वहीँ रह जाएंगे|

वक्ता:  अब मुझे ये बताओ राहुल, किस से प्रतियोगिता कर रहे हो ये सवाल पूछ के? अभी जब ये सवाल पूछा तो किस से प्रतियोगिता करते हुए पूछा गया? अब उसने पूछ लिया तो मैं भी पूछ ही लूँ, या कोई और पूछे उस से पहले मेरा नंबर लगना चाहिए|

राहुल: नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है|

वक्ता: पर तुमने कहा कि अगर प्रतियोगिता नहीं तो जीवन में जहाँ खड़े हैं खड़े रह जाएंगे, कुछ होगा ही नहीं, हो रहा है ना अभी बिना प्रतियोगिता के? तुम जो करने आये हो वो हो रहा है ना बिना प्रतियोगिता के ही| ठीक अभी सवाल पूछ रहे हो, तुम्हारे पूछने के कारण ही ये सत्र आगे बढ़ रहा है, क्या तुम किसी से तुलना कर के सवाल पूछ रहे हो? प्रतियोगिता का मतलब होता है तुलना, यही मतलब होता है ना उसकी तुलना में मैं आगे हूँ या पीछे? क्या तुम अभी किसी से तुलना कर के सवाल पूछ रहे हो? क्या तुम इस कारण सवाल पूछ रहे हो के अभी जल्दी ही दो-चार लोग और सवाल पूछेंगे उनसे पहले मैं ही पूछ लूँ? सब हो रहा है बिना प्रतियोगिता के| बल्कि, जो लोग प्रतियोगिता कर रहे होंगे वो कभी भी नहीं पूछ पाएंगे, क्योंकि उनके मन में हमेशा ये खटका बंधा रहेगा कि उसकी तुलना में मेरा सवाल कहीं हल्का तो नहीं| पूछ बस वही पाएगा जो निडर होगा| तुम अभी डरे हुए नहीं हो इसीलिए पूछ पा रहे हो| जो डरा है वो तो छुप के बैठा है, वो कहाँ पूछ पाएगा| तो तुम, डर का समर्थन तो कर रहे हो अपने शब्दों से, पर अपने आचरण से यही दिखा रहे हो के तुम बड़े निडर हो| निडर न होते तो कैसे खड़े होते ऐसे? यहाँ बैठे हैं दो सौ लोग| प्रतियोगिता कर रहे होते तो कैसे खड़े होते ऐसे? बहुत सारे प्रतियोगी यहाँ बैठे हैं, वो नहीं खड़े हो पा रहे|

तुम्हारी बात मैं समझ रहा हूँ| आज तक तुमने जो करा, वो डर की वजह से ही करा, वो दूसरों की तुलना में ही करा| तो तुम्हें लगता है कि अगर तुलना हट गयी, अगर डर हट गया तो करना भी हट जाएगा| ज़िन्दगी बिलकुल ठहर जाएगी, शिथिल हो जाएगी| यही लग रहा है ना? ऐसा होगा नहीं! सच तो ये है कि डर तुम्हारे पाँव जकड़ लेता है, तुम्हारी आवाज़ पर ताला लगा देता है| जब डर हटेगा, तब वास्तविक गति आएगी जीवन में| डरा हुआ आदमी तो सुन्न पड़ जाता है, वो हिल ही नहीं पाता, और हिलता भी है तो पागलों की तरह| फिर वो अंधी दौड़ लगाता है, या तो वो बिलकुल सकपका के पत्थर बन जाता है, गति कर पाने की उसकी क्षमता ही खत्म हो जाती है, या फिर वो अंधों की तरह भागना शुरू कर देता है बिना देखे समझे, और जाके कहीं गिर पड़ता है| एक सहज बहाव, एक मीठी गति, जैसे संगीत हो, वो निडरता में होती है| तुम्हें कैसा लगेगा अगर अभी मैं तुमसे डर-डर के बोलूं? दो-चार बातें बोलूं ओर यहाँ नीचे छुप जाऊं के डर गया| कोई आए फिर ग्लुकोंन-डी लेके आये इतना बड़ा, और मैं पूरा पी जाऊं, कि हाँ, सब दुश्मन बैठे हुए हैं उनका सामना कर रहा हूँ भाई, युद्ध का माहौल है, कुरुक्षेत्र है ये, इतने सारे खड़े हुए हैं कौरव| कैसा लगेगा अगर मैं डर में तुमसे बात करूँ, सब जवान लोग हो, तुम्हें कैसा लगेगा, तुम किसी से मिलने जाते हो और वो बिलकुल डरा हुआ या डरी हुई है और तुम कह रहे हो कि ज़रा सामने तो आके बैठ जाओ, वो वहां उधर छुप कर के कोने में ऐसे डरा बैठा है| भाई जहाँ डर है वही प्रगति है| यही तो तुमने अभी-अभी गणित दिया है, कि डर के बिना प्रगति ही नहीं है| तो डरो, और डरो| अब घर जाना आज तो बिलकुल, भयभीत रहना, और पूछेंगे लोग कि क्या हो गया तो कहना, प्रगति कर रहे हैं | अरे, तरक्की इसी में है| डर के बिना तरक्की कैसी

डर से सिर्फ पागलपन निकलता है, कोई तरक्की नहीं निकलती| आदमी ने इतिहास में जो भी कुछ करा है, जो बात करने लायक है, जिसकी चर्चा की जा सकती है, वो डर में नहीं करा है, वो मौज में करा है| ध्यान रखो किसमें, डर में नहीं करा है वो मौज में करा है|वैज्ञानिक डर कर के प्रयोग करेगा तो क्या निकलेगा उसमे से, कुछ नहीं| लेखक डर-डर के लिखेगा तो क्या सच्चाई बयान कर पाएगा? पेंटर डर-डर के ब्रश चलाएगा तो कैसी पेंटिंग बनेगी? और सोचो, कि तुम नाच रहे हो, कैसे डर-डर के, वो कैसा नाच होगा? काफी खौफनाक नाच होगा| पर तुम्हारा पूरा विश्वास है कि उसी से प्रगति है| सोचो, सहमे हुए नाच से प्रगति हो रही है| हो सकती है? मत करो वकालत ऐसी चीज़ की जो तुम्हारे लिए ज़हर के सामान है| डर ज़हरीला है! उसको पोषण मत दो| हवाएं तो वैसे ही तुम तक डर ले करके आ रही हैं, तुम और क्यों उसको बल देते हो? डर के हज़ार कारक तुम्हारे आस-पास वैसे ही बैठे हुए हैं, तुम और क्यों उनके पक्ष में खड़े होते हो? एक डरी हुई चुप्पी, एक खौफनाक स्पीकर, और सहमे हुए नन्हें-नन्हें मुन्ने-मुन्ने बच्चे, जो कोई दो साल का है कोई पांच साल का है| अरे ये जवानों का इंजीनियरिंग कॉलेज थोड़ी है ये तो छोटे-छोटे, नन्हें-नन्हें बच्चे हैं, जिन्हें डरा हुआ ही होना चाहिए|

हंसो मत, डरना चाहिए| इतना हंसोगे तो कोई खतरा आ जाएगा|

डर ज़हरीला हैविभोर: सर, एक आम आदमी का जीवन डर की एक अटूट कहानी है|

वक्ता: सही कहा तुमने, सांस-सांस में डर बैठा हुआ है| मैं तुमसे सवाल कर रहा हूँ, तुम्हें वही कहानी दोहरानी है, या एक नयी कहानी लिखनी है| बात तुमने बिलकुल ठीक कही कि दुनिया बीमार है| मैं तुमसे कह रहा हूँ क्या तुम्हें भी बीमार होना है, या स्वास्थ में जीना है?

विभोर: पर उसके बिना तो जीवन नहीं|

वक्ता: तुमसे किसने कह दिया कि डर के बिना जीवन नहीं है? मैं तुमसे दूसरा सवाल कर रहा हूँ की क्या डर के साथ जीवन है?

विभोर: सर, साथ भी नहीं है तो बिना भी नहीं है|

वक्ता: बिना डर के जीवन को तो तुम जानते ही नहीं| अभी तक डर में ही जिए हो, डर की ही वकालत कर रहे हो, दीवारों के बाहर क्या है वो तो तुम जानते ही नहीं| तो उसकी बात मत करो कि डर के बिना जीवन नहीं है, अभी इसकी बात करो कि क्या डर के साथ है जीवन? डर के साथ जीवन है या मात्र घुटन है? डर के बिना क्या है उसकी बात करने के तो अभी हम अधिकारी ही नहीं हैं, क्योंकि उसको हमने जाना नहीं है| डर किसे अच्छा लगा है? डर किसको भाता है? कौन है जो डर में बड़ा आनंद अनुभव करता है? हमें अपने आप से दुश्मनी है क्या जो हम कहें कि नहीं, डर चाहिए| सर, जब तक मैं डरा हुआ न हूँ, खाना पचता नहीं, सर कब्ज रहती है, खुलती ही तभी है जब डरा दो| डर की सार्थकता, कोई उपयोगिता? बड़ा अच्छा अनुभव करते हो? चेहरा बिलकुल उर्ज्मय हो जाता है, खिल जाता है फूल की तरह जब डरे हुए होते हो| वो सड़क किनारे गन्ने का रस देने वाले बैठे होते हैं| तो वो गन्ना लेते हैं ओर मशीन में डालते हैं, और फिर वो बाहर निकलता है, और फिर उसको लेते हैं और दोहरा करके डालते हैं, और कतई चुस जाता है| वैसी ही तो हमारी शकल हो गयी है डर-डर के| हाँ, अब थोड़ी खिली, अछे लग रहे हो| ऐसे ही रहो| चुसा हुआ गन्ना, जूस दूसरे पी रहे हैं, ये कई लोगों ने हँसना-वँसना शुरू कर दिया| ये खतरनाक है| बता रहा हूँ डर के रहो, हँसना मना है| कोई भोर-विभोर नहीं है यहाँ पर, सब काली रात है| डरो, जीवन एक हॉरर मूवी है| राज़-3, 4, 5, 10, 15, 20! जीवन एक दहशत है, जीवन कब्रिस्तान है| डरो! तुम मुस्कुरा रहे हो ये गलत कर रहे हो, अपने ही सवाल से तुम बेवफाई कर रहे हो| अगर तुम्हारा सवाल सच्चा है तो मुस्कुराओ मत|

विक्रम: सर, हमारी ज़िन्दगी में हम कुछ बनना चाहते हैं, तो डर उस वक़्त ये नहीं होता कि अगर हम ऐसा न बन पाए तो, हम इंटरव्यू के लिए जा रहे हैं, हम सोचते हैं कि हमें सेलेक्ट हो जाना चाहिए, पर डर यह रहता है कि अगर सेलेक्ट न हो पाए तो… यह तो हमें किसी ने बताया नहीं था, ये तो अपने आप आ रहा है|

वक्ता: विक्रम, हर डर सिखाया हुआ है, हर डर पढ़ाया हुआ है| जब विक्रम चार महीने का था उस समय फर्क नहीं पड़ता था कि उसको दुनिया के सबसे बड़े देश का राष्ट्रपति अपनी गोद में उठा लेगा, अगर विक्रम को उसकी शकल नहीं सुहा रही, और अगर उसने तब भी ज्यादा विक्रम को परेशान किआ, उठाए ही रहा, छोटे-छोटे बच्चों के साथ लोग खेलना शुरू कर देते हैं, तो विक्रम कहेगा, अच्छा, $5000 का कोट है ये, लो अब बताते हैं, हम क्या कर सकते हैं इस कोट के साथ| कहाँ था डर? डर लेके नहीं पैदा हुए थे| तुम में से कौन ऐसा है जो पैदा होते से ही ऐसा बोला था, बड़ी भयानक जगह है, कहाँ आ गया? डर तुम में डाला जाता है, धीरे-धीरे उसकी खुराक दी जाती है| तुमने बेरोज़गारी के डर की बात करी अभी, नहीं होता है, बहुत लम्बे समय तक नहीं होता है| उसके बाद तुम अखबार पढ़ते हो, बेरोजगार युवक ने फांसी लगा के आत्महत्या की, और उसमे नीचे पूरा विस्तारपूर्वक बताया जाता है कि कैसे लाश लटक रही थी, कितने-कितने दिनों से वो बेरोजगार था, और तुम मूवी देखते हो, एक हीरो है जो अपनी फाइल ले करके दफ्तरों की ठोकरें खा रहा है, और तुम कहते हो, हैं? तुम्हारे कानों में आवाजें पड़ती हैं, फलाने की बड़ी अच्छी नौकरी लग गयी है, अब उसको खाने पर बुलाओ घर पे, तो तुम्हारे मन में एक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है कि जहाँ नौकरी है वहीँ इज्ज़त है, और तुम जो ये पढाई करते हो, चार साल, दस साल, तुम्हें लगातार ये बताया जाता है कि पूरी पढाई  का प्रयोजन ही यही है कि नौकरी लग जाए, अब ताज्जुब क्या है? कि, उस इंटरव्यू के समय तुम्हारे पाँव कांपते हैं और पाँव ही नहीं कांपते, पूरी व्यवस्था कांपती है| इंटरव्यू जो है, बड़ी मजेदार चीज़ होती है| जिसका मूड खराब हो उसे इंटरव्यू लेना शुरू कर देना चाहिए, एक से एक धुरन्धर घुसते हैं, और पूरा कांप ही रहे होते हैं वो| बैठेंगे, और ए.सी चल रहा होगा ओर अट्ठारह डिग्री उसमे तापमान सेट होगा और, ये पसीना पट, पट, पट, पट, पट! सर माई नेम इज़ वीर बहादुर सिंह एंड आई एम वैरी करेजियस| ये वीर बहादुर सिंह हैं, कहाँ वीर, कहाँ बहादुर, कहाँ सिंह? सियार की तरह कांप रहे हैं, नाम है सिंह| ये सब इसलिए है क्योंकि पट्टी पढ़ ली है कि जीवन नौकरी के बिना कुछ नहीं| एक मूवी आएगी जिसमें एक डायलाग होगा जिसको तुम दस बार फेसबुक पर डालोगे, अभी-अभी आई थी, कि गली की छोकरियों का प्यार तो डॉक्टर, इंजिनियर लेके चले जाते हैं, नाम तुम्हें भी पता है, मुझे भी पता है, और तुमने तुरंत क्या सन्देश पकड़ लिया, कि छोकरी भी तभी मिलेगी जब…..| अब तुम कांपोगे नहीं तो करोगे क्या? सब कुछ काँपेगा, एक-एक अंग|

ये सारे सन्देश तुम्हारे दिमाग में बाहार से भरे जा रहे हैं, और तुमने एक फिल्म देखी जिसमे हीरो की जो बूढी माँ है वो मर रही है, क्यों मर रही है, क्योंकि दवाई नहीं है, दवाई क्यों नहीं है, क्योंकि हीरो बेरोजगार है, और तुम कहोगे हैं, ऐसा? और तुम पत्रिकाएँ पढ़ोगे, और उसमे जो कवर पेज होगा, उसमें किसकी फोटो छपी होगी, जिसने सिविल सर्विसेज टॉप करा है, और बाकी जो दो लाख, चार लाख लोग हैं उनकी कोई कीमत नहीं है| तुम कहोगे ठीक, प्रसिद्धि उसको ही मिलती है जिसको बड़ी नौकरी मिलती है, और तुम देखोगे कि घर में बड़े भैया की शादी हुई, और छोटे भैया की भी शादी हुई, बड़े भैया की बड़ी नौकरी और बड़ा दहेज़, और छोटे भैया की छोटी सी नौकरी और छोटा सा दहेज़, तुम कहोगे अच्छा, ये भी है, ऐसा भी होता है| अब कांपोगे नहीं तो करोगे क्या, जब ये सारे सन्देश सोखते जा रहे हो|

मौजसब बाहर से आया है, बेटा| जिस इंटरव्यू की तुम बात कर रहे हो कि वहाँ हमें बहुत डर लगता है, वो बड़ी छोटी सी घटना है, दो लोगों की एक साधारण सी बातचीत है| उस साधारण बातचीत को डर बना देते हैं, तुम्हारे दिमाग में घुसे हुए ये सांप-बिच्छू, नहीं तो है क्या? और तुम्हें अन्दर की बात बताता हूँ, जो एच.आर मेनेजर इंटरव्यू लेते हैं उनके लिए आमतौर पर इंटरव्यू लेना भी, खासतौर पर नए लड़कों का, बड़ा बोरिंग अनुभव हो जाता है, क्योंकि सब ऐसे ही आते हैं| भगवान के नाम पर थोड़ा सा ऑफर लैटर दे दो, छोटा वाला|उन्हें कोई ऐसा मिलता ही नहीं जो स्वस्थ हो, निडर हो, सहज हो कर के बस बात करे कि आओ दस-पंद्रह मिनट बात करनी है ऐसे ही कर लेते हैं, बात ही तो है, न तुम मुझे खाने जा रहे हो ना मैं तुम्हें खाने जा रहा हूँ| काहे का डर है, और मुझे ये बताओ डर-डर के नौकरी पा जाते हो क्या? इंटरव्यू में कौन सफल भी रहेगा? जो डरा हुआ है या जो सहज है? पर तुम तो वकालत कर रहे हो बेटा डर की, कि होता है, हाँ होता है, पर क्यों रखे हो उसको ऐसा? ज़रुरत क्या है? चेहरा ऐसा बता रहा है कि ये तो कोई नयी बात है मानने का ही मन नहीं कर रहा, दुनिया धोखा है, दुनिया दहशत है, ये आदमी कुछ फ़साने की कोशिश कर रहा है हमको| कह रहा है खुले आसमान में उड़ो, ये कुछ शिकारी किस्म का आदमी है, पहले उड़ाएगा, फिर पकड़ ले जाएगा, ये हमें हमारे बिलों से बाहर निकालना चाह रहा है ताकि हमें फिर पकड़ ले| कुछ स्वार्थ होगा इसका| मामला क्या है ज़रा खोजबीन करो| ये अद्वैत वाले वैसे भी हमेशा कुछ उल्टी-पुल्टी बातें करते हैं, ये वो आते हैं रोहित सर, पता नहीं क्या? और ये आज आ गये हैं, कह रहे हैं डर गड़बड़ है| डर कैसे गड़बड़ हो सकता है? डर तो ज़िन्दगी है|

गाना है – ‘तेरे दर पर सनम चले आये‘ गलत गाना है| ‘तेरे डर से सनम चले आये‘ होना चाहिए| कोई तो गड़बड़ है|

श्रोता ३: सर, पर डर से कई काम भी तो हो जाते हैं|

वक्ता: डर, ज़रूरी है उन लोगों के लिए जो सिर्फ डर पर चलना जानते हैं| थोड़ी देर पहले भी कुछ हुआ था तो मैंने कहा था, डर की उपयोगिता निश्चित रूप से है, क्योंकि हम ऐसे हो गये हैं जो मात्र डर पर ही चलना जानते हैं, ये त्रासदी है, ये दुर्घटना है जो घट गयी है हमारे साथ| ट्रैफिक लाइट तुम्हें ये संकेत देने के लिए है कि अभी दूसरे पक्ष को निकल जाने दो| वो डराने के लिए नहीं है, वो एक व्यवस्था है कि देखो, रुको, अभी वो निकल जाए फिर तुम निकल जाना| उसमे डर कहाँ है? डर है| डर ऐसे है कि हम वो लाइट तोड़ देंगे अगर पुलिस वाला मौजूद न हो| अब डर आ गया, लाइट में डर नहीं है| हम उसे तोड़ देंगे अगर पुलिसवाला मौजूद न हो| हम उसे क्यों तोड़ देंगे? हम उसे तोड़ इसलिए देंगे क्योंकि हम कुछ समझते ही नहीं, दबे हुए हैं हम भीतर से | जब एक आदमी सदा दबाया जाता है ना तो उसमे बड़ी इच्छा आ जाती है हिंसा की, विध्वंस की, नियम कानून तोड़ने की| तुम अक्सर पढ़ते होगे कि जवान लोगों ने कहीं स्ट्राइक कर दी, कहीं किसी दफ्तर में गये तो वहाँ पर शीशे दरवाज़े तोड़ दिए, कॉलेज में भी कई बार होता है| ये सब क्यों होता है? कुर्सियां जला रहे हैं, हडतालें कर रहे हैं, ये सब क्या है, क्यों है? ये सब इसी कारण है कि मन किसी का भी हो, डर में, दबाव में जीना चाहता नहीं है| जब उसको बहुत लम्बे समय तक दबाव में रखा जाता है तो एक दिन वो विस्फोट करता है| ये जो हम ट्रैफिक लाइट्स तोड़ते हैं ये हमारा छोटा सा विस्फोट है| हम कहते हैं देखो हमने तोड़ दिया, तुम हमें डरा नहीं पाए| जो डरा होता है उसी को इस तरह का विद्रोह करने की ज़रुरत पड़ती है| जो आदमी सहज है, स्वस्थ है वो कहेगा, रुक ही जाता हूँ चालीस सेकंड्स तक मेरा नंबर आ जाएगा, निकल जाऊँगा| पर जो एक अस्वस्थ मन है जो लगातार डर में जिया है, बात को समझना, जो डरा हुआ है, वही व्यवस्था को तोड़ने की भी कोशिश करता है| जो डरा नहीं है उसकी व्यवस्था उसके भीतर से ही निकलती है, उसे बाहरी व्यवस्था चाहिए ही नहीं| अभी यहाँ पर दो तरह के लोग होंगे, एक वो जो स्वयं शांत हैं, जिन्हें कोई नहीं चाहिए शांत करने के लिए, बिलकुल ध्यान में सुन रहे हैं, और दूसरे वो जिनको चाहिए एक हवलदार, चुप कराने के लिए| अंतर देख रहे हो? डर की ज़रुरत उसी को है, डर काम भी सिर्फ उस पर करेगा जिसके पास अपनी समझ की आंतरिक व्यवस्था नहीं है| जिसके पास अपनी समझ है, अपनी रौशनी है, उसको न डर की ज़रुरत है और उसको डराओगे भी तो डर उसके ऊपर काम करेगा नहीं| डर हमारे ऊपर काम कर जाता है, क्योंकि हमारा अपना कुछ है ही नही| समझ रहे हो ना बात को, डर उपयोगी हो गया है, क्योंकि हम ऐसे हैं| हम ऐसे न रहे तो डर की उपयोगिता भी न रहे, और याद रखो, जिस दिन तुम बदल जाओगे, जिस दिन तुम्हारा मन मुक्त रहेगा, उस दिन दुनिया का कोई डर तुम पर प्रभावी हो ही नहीं पाएगा| लोग डराते रहेंगे, तुम हँसते रहोगे, डरोगे नहीं|

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: डर (भाग-३): डर से मुक्ति

इस विषय पर सम्बंधित लेख पढ़े

लेख १ : डर का मूल कारण

लेख २ : डर-डर के मर जाना है?

लेख ३ : डर आता है क्योंकि तुम उसे बुलाते हो

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय विक्रांत जी,

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      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

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