कैसे जियें?

सोमवीर: सर, कैसे जीना चाहिये?

वक्ता: सोमवीर का सवाल है कैसे जिएं? तो हम पिछले एक घंटे से कर क्या रहे हैं? कितने लोगों को शक है कि वो यहाँ मुर्दा हैं? कितने लोगों को शक है कि उनके अगल-बगल एक-दो लाशें पड़ी हुई हैं?

अरे! जीना, सोमवीर कोई खास अवसर थोड़ी है कि ऐसा कुछ होगा तो हम मानेंगे कि हम जी रहे हैं। जी तो तुम लगातार रहे ही हो। ये बोलना, ये सुनना, ये बैठना, ये मुस्कुराना, यही सब तो जीवन है और क्या है जीना? जीना इससे अलग थोड़ी कुछ है। इसी को जब तुम ध्यान से करते हो तो इसमें मज़ा आता है, उसे जीना कहते हैं।

जो लोग अभी ध्यान से कुछ सुन रहे हैं, उन्हें कुछ मिल रहा है, उनके चेहरे ही अलग हैं और कुछ लोग हैं जो इधर-उधर पड़ोसी के साथ लगे हुए हैं, चुटकी काट रहे हैं, खुजला रहे हैं, हिल-डुल रहे हैं, उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है, उन्हें सिर्फ बेचैनी मिल रही है, वो जिंदा ही नहीं हैं। जो भी कुछ कर रहे हो, खेल रहे हो तो पूरी तरह खेलो, सुन रहे हो तो सिफ सुनो, खा रहे हो तो सिर्फ खाओ, पढ़ रहे हो तो सिर्फ पढ़ो, बोल रहे हो तो पूरा ध्यान सिर्फ बोलने में, तब भूल जाओ कुछ भी और, यही ज़िन्दगी है, यही जीवन है। प्रतिपल जो हो रहा है, यही तो जीवन है, इससे अलग थोड़ी कुछ होता है जीवनasfasfa

पर हम ऐसे जीते नहीं, हम जब खा रहे होते हैं तो हमें याद आता है कि असाइनमेंट  बाकि   है, हम जब यहाँ बैठे होते हैं तो हमे याद आता है कि मेस कितने बजे खुलेगी, हम जब खेल रहे होते हैं तो हमे याद आता है कि वहाँ ग्राउंड  के बगल से कौन जा रही है, ऐसे ही होता है न? कोई नहीं होगा यहाँ पर जो जब से यहाँ बैठा है, तब से सिर्फ सुन रहा है, मन कितनी ही जगहों पर हो आया होगा।

इसको कहते हैं ‘न ‘ जीना, इसको कहते हैं ‘मुर्दा होना’ क्योंकि जिंदगी कहाँ है? यहाँ है। तुम साँस कब ले रहे हो? अभी ले रहे हो, तुम बैठे कहाँ हो? यहाँ हो। तो इसलिए तुम जी भी यहीं सकते हो, मन अगर कहीं और घूम रहा है तो तुम मुर्दा हो।

जो लोग पूर्णतः यहीं हैं और अभी हैं, वो जिंदा हैं और जो कहीं और घूम रहे हैं वो मुर्दा हैं।

तो अभी तुम पूरी तरह जिंदा हो पर अगले पल की कोई गारंटी भी नहीं है, जल्दी मर भी सकते हो। हमारा ऐसे ही है, जीते हैं, मरते हैं और फिर…

श्रोता: जीते हैं

वक्ता: …और कुल मिला कर बहुत थोड़ा जीते हैंजो लोग सत्तर-अस्सी साल के हो जाते हैं, तो अगर वास्तव में देखो तो, कि उन्होंने कितना जिया है तो बहुत कम जिया है इसलिए तो ये हालत रहती है कि बुढ़ापे में हो और, ज्यादा बेचैनी है, ऊब है, थकान है क्योंकि उन्हें पता है कि उन्होंने जिया नहीं कुछ भी, मिला था जीवन जीने के लिए पर जी पाये नहीं, इसलिए और गहरी निराशा आ जाती है उनमें, बात-बात पर खिसियाते हैं|

तुम क्या कहते हो, सठियाना, वो सठियाना नहीं है, बस वो समझ रहा है कि अब मौत आ गयी है और ज़िन्दगी बेकार गयी। तुमसे भी दूर नहीं है, भारत में जो औसत उम्र है वो सत्तर साल है, तो एक तिहाई तो तुम्हारी भी बीत गयी। मतलब तीन दिन अगर मिले थे तो एक दिन तो बिता दिया तुमने, तो बहुत समय तो तुम्हारे पास भी नहीं बचा है, ये मत सोचना कि अभी तो हम पैदा भी नहीं हुए हैं। बस अभी-अभी पैदा होकर यहाँ आ रहे हैं, हमारे पास तो पूरा जीवन बचा हुआ है। मेरे जो बैच मेटस हैं, अभी री-यूनियन हुआ था, तीन-सौ अठारह लोग थे, आई.आई.टी के बैच में मेरे, सिर्फ तीन-सौ बारह को निमंत्रण गया आने का, छह गए!

तुम्हारे पास भी कोई ज्यादा समय नहीं है। कोई गारंटी नहीं है इस बात की, कि डिग्री लेके ही निकलोगे यहाँ से।

इतने कॉलेज में अद्वैत का प्रोग्राम चलता है। पिछले पांच साल में ऐसा दो-चार बार हो चूका है कि यहाँ से लोग पहुंचे सेशन लेने के लिए और वहां बताया गया कि छुट्टी है। क्यों?

श्रोता: चले गए।

वक्ता: कोई बाइक चला रहा था, ट्रक के नीचे आ गयाकिसी का रिजल्ट खराब आया तो नदी में कूद गया, किसी की गर्लफ्रेंड ने धोखा दे दिया तो फिनाइल पी गया, किसी को कोई बीमारी हो गयी। तो जीने के लिए कोई बहुत समय है नहीं, सोमवीर। यही है जो हाथ में है, इसी को जियो और इसको गवांते जा रहे हो तो जिंदगी ही गवांते जा रहे हो। अगर तुमने पीछले एक-डेढ़ घंटे में कुछ हिस्सा गंवाया है इस सैशन का तो, वो तुम्हारी अपनी जिंदगी का हिस्सा है जो तुमने गंवा दिया और ये वापस नहीं मिलेगा।

ये मत सोचना कि असीमित समय है तुम्हारे पास, न, थोड़ा ही है। उस ही को जियो और भरपूर जियो, पूरी तरह जियो।

–‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।
संवाद देखें: कैसे जियें?

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

1: दमित जीवन उत्तेजना मागता है

2: जीवन में कोई गारंटी नहीं

3: जी को गम्भीरता से कैसे ले सकते हो

 

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय हिरल जी,

      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

      1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

      2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

      इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

      3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s