जीवन में कोई गारंटी नहीं

श्रोता १: सर बात दांए-बांए इसलिए हो गई क्योंकि आपने हमें एक दर्जे से ऊपर बात कही, पर कुछ समझ नहीं आता। मेरा स्टैंर्ड इतना नहीं कि उतना तक सोच पाएं । हम सोचने की कोशिश कर रहे थे लेकिन समझ नहीं आ रहा ।

वक्ता: तुमको इसलिए समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि तुम कोशिश में लगीं हुईं थीं सोचने की। चुपचाप सुनो तो सब समझ में आ जाएगा ।

श्रोता १: हम सोचते हैं सच बोलना चाहियें, सच बोलने से अच्छा होते है, पर हम बोलते नहीं है। कैसे पता चलें आपना जो निर्णय है, वो सही है भी या नहीं?

वक्ता(दूसरे श्रोता से): आप लोग यहाँ बैठे हैं, क्यूँ बैठे हैं? जा सकते थे, कोई बद्धता तो थी नहीं रुकने की  कैसे जानें जो आपना निर्णय है, वो आपना है भी या नहीं? सब कर लिया उसके बाद भी गारंटी क्या है? ‘जागो ग्राहक जागो’, एकदम सतर्क ग्राहक हो तुम, गारंटी दीजिये तब मानेंगे आपको । कितना? ६ महीने, साल भर?

(ज़ोर देकर) गारंटी क्या है?

(सब हंसते हैं)

श्रोता २: हम लोग सोच कर करने के बाद भी ये सोचते हैं कि क्या ये सही है?

वक्ता: बेटा, गीता सही नहीं होती, तुम्हारी दृष्टि सही होती है। एक आतंकवादी अगर गीता को पढ़ेगा तो उसे बहुत पसंद आएगी, कि ‘अरे! यही तो लिखा है कि मारो! उठा अर्जुन वाण और ठोक। यही तो लिखा है। जो तुम्हारी दृष्टि होगी, वो तुम्हें दिखाई दे जाएगा, ‘ आत्मा न हन्यते न हंय मने शरीरे, न शोषयति मरुतः। उसको हानन हो ही नहीं सकता, शरीर का हानन हो रहा है। उसका हानन हो नहीं सकता, तो फिर में अपराधी भी कहाँ हूँ? मारो, बम पर बम फोड़ो।

तुमको वही दिखाई देगा, जो तुम्हारी दृष्टि है। गीता में सत्य नहीं होता, वो तुम्हारे अपने आँख में होता है। अपनी आँख को निर्मल करो। और रही गारंटी की बात, जीवन में किसी चीज़ कि कोई गारंटी नहीं है, सिर्फ जीवन है। फिर पूछता हूँ तुमसे, जब संगीत सुनते हो और डूबे रहते हो, तो क्या गारंटी मांगते हो कि हमें इसमें आनंद मिल रहा है? मांगते हो क्या गारंटी?

श्रोता १: सर अच्छा लगता है तो सुनते हैं, नहीं अच्छा लगता बन्द कर देते हैं।

वक्ता: बस गारंटी तो नहीं माँगी ना। गारंटी माँगते हो जब भयभीत होते हो, डरे होते हो कि कुछ उल्टा-पुलटा ना हो जाए। गारंटी भय की निशानी है, किसी चीज़ की कोई गारंटी नहीं है सिवाय तुम्हारे अपने होश के, जैसे दुकानें नहीं होतीं छोटी-मोटी जिन पर लिखा रहता है , “बिके माल की कोई गारंटी नहीं है”, जीवन ऐसा ही है। लिखा रहता है ना कि जो बिक गया वो वापिस नहीं लिया जाएगा? वैसे ही जीवन भी ऐसा है, बीता हुआ पल वापिस नहीं लिया जाएगा और किसी चीज़ की कोई गारंटी नहीं है। कुछ भी, कोई गारंटी नहीं है। गारंटी मत माँगो, ये समझो कि तुम गारंटी माँग क्यों रहे हो। तुम गारंटी इसलिए माँग रहे हो क्योंकि तुम?

श्रोता १ : डरे हुए हो।

वक्ता: डरे हुए हो कि कुछ गलत ना हो जाए। और तुम क्यों डरे हुए हो? तुम अपने लिए नहीं डरे हो । एक बच्चा होता है, वो ब्रश लेकर पेंटिंग बना रहा है , निश्चित रूप से उस पेंटिंग में बहुत कुछ उल्टा- सीधा है और वो खुश है, एक बड़ा पेंटिंग बनाता है (श्रोता की ओर इशारा करते हुए), तुम बनाओगी और बनाओगी, तो तुम्हारे मन में विचार आएंगे कि गारंटी क्या है जो बना रही हूँ वो ठीक बना रही हूँ, कहीं गड़बड़ ना हो जाए। तुममें और बच्चे में मूल अंतर क्या है, जानती हो?

सभी श्रोता(एक स्वर में): समझ।

hxdxवक्ता: (इशारे से ‘ना ‘ करते हुए) बच्चा अपने लिए बना रहा है,  तुम दूसरों के लिए बना रही हो इसलिए गारंटी माँग रही हो । जब कुछ भी पूर्णतया अपने लिए किया जाता है तो कैसी गारंटी, मुझे इसमें आनंद मिल गया इतना काफी था, मैं इसमें थप थप करके रंगों से खेल ली और वही हाथ जाकर मैंने ऐसे लगा दिया कैनवास पर, यही काफी था। और जब तुम दूसरों के लिए करोगे तो गारंटी चाहिए, दूसरा इसको पसंद करेगा कि नहीं करेगा, नंबर देगा कि नहीं देगा, तब गारंटी चाहिए। डर है ना, कहा था ना गारंटी डर से है। और वो डर किसका है? वो डर दूसरे का डर है, किसी और का डर। कोई और क्या कहेगा? गारंटी तुम्हें कभी अपने लिए नहीं चाहिए, गारंटी सदा किसी और के लिए चाहिए ।

तुम पूछ रही हो कि कैसे पता चले राइट है कि गलत है, या सही है। एक ही सही है, और वो है अपनी समझ के अनुसार जीवन जीना। और एक ही गलत है, गुलामी का जीवन जीना। और कोई ना सही है, ना कोई ग़लत है। हाँ अपने हिसाब से चलोगे, फिर उसमें तुमको हो सकता है समाज से प्रतिरोध का सामना करना पड़े, लोग आंए कहें कि तुमने बड़ा गलत किया पर जो कहें उन्हें कहने दो, तुमने जो किया, तुम्हें वही करना था, तुम उसके अतिरिक्त कुछ कर नहीं सकते थे, वही उचित है, वही ठीक है और अगर वैसा नहीं करोगे, तो दुनिया चाहे तुम्हें लाख प्रमाणपत्र दे दे कि तुमने बड़ा अच्छा काम किया है, ये बड़े लेकिन तुम जानते रहोगे कि ठीक हुआ ही नहीं, जीवन बेकार गया, किसी और के कहने पर चल दिया , बेकार ही गया ।

आ रही है बात समझ में?

कोई गारंटी नहीं है । तुमने उस वक्त भी कहा था कि फिल्में देखेंगे तो गलत ही होगा। किसने कहा कि गलत है? ये भी किसी और ने ही कहा ना? सही और ग़लत के सारे ख्याल ही बाहर से आते हैं। क्या तुमने देखा नहीं है कि एक समाज में जो सही माना जाता है, दूसरे में वहीं ग़लत माना जाता है। एक देश में जिसको सही माना जाता है, दूसरे में ग़लत माना जाता है। एक घर में जो सही है, दूसरे में ग़लत है। एक ही धर्म में जो आज सही है, वो कल ग़लत हो जाएगा। तुम्हारा सही और ग़लत तो समाज से आया है। किसी ने सिखा दिया कि ये सही, ये ग़लत। और जिसने सिखाया उसका भी अपना नहीं है, ये तो सब देश, काल के अनुसार बदलने वाली चीजें हैं, इनमें क्या सत्य है, इनको क्यों इतनी गंभीरता से लें हम? कभी दो सौ साल पहले बहुत ‘सही’ माना जाता था कि सती हो जाओ, मंदिर बनते थे ।

(उक्त श्रोता को देखते हुए) क्या होना चाहोगी? कि मर गया पति, तो तुम भी साथ में जल जाओ।

(सब हंसते हैं)

ये सब सही और ग़लत तो सामाजिक मानसिकताएँ हैं। ना कुछ सही है, ना कुछ ग़लत है। सिर्फ एक ही सही है, समझ। और एक ही ग़लत है, समझ का अभाव, बाकि सब सामाजिक नैतिकता है, इनके फेरे में मत पड़ जाना ।

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें:जीवन में कोई गारंटी नहीं

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढें :-
लेख १ : जीवन – अवसर स्वयं को पाने का

लेख २ : इक्को रंग कपाई दा- बुल्ले शाह

2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय अभिलाषा जी,

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      पसंद करें

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