आँखें फिर से खोलना

वक्ता: यह प्रसंग गीता के दूसरे अध्याय के अंतर्गत दिया है| अर्जुन ने योगभ्रष्ट के बारे में पूछा है| योगभ्रष्ट कौन है, उसके विषय में अर्जुन ने खुद ही स्पष्ट कर दिया है कि जो योग में श्रद्धा रखता है, पर उसमें संयम नहीं है| ऐसे को कहते हैं…|

श्रोता १: योगभ्रष्ट|

वक्ता: तो अर्जुन कृष्ण से पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों है? इनकी योग में श्रद्धा है पर संयम नहीं है| ऐसे लोगों का क्या? निश्चित सी बात है, आपके मन में बात उठेगी कि ऐसा हो कैसे सकता है कि योगी है, श्रद्धा है, पर संयम नहीं है| संयम को समझते हैं| संयम क्या है? गीता में ही कृष्ण ने संयम के बारे में कई बार कहा है| उसमें से एक उठाऊँगा, जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि संयम क्या है|

कृष्ण का वक्तव्य है कि-

या निशा सर्वभूतानाम् तस्यां जागर्ति संयमी |

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ||६९||

इसी को उदाहरण की तरह लेते हैं| इससे सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा| कृष्ण कहते हैं कि जब सबके लिए रात हो तब जो जगे सो संयमी| संयमी तब जगता है, जब सबके लिए रात होती है| यहीं से समझ लेते हैं बात को| दिन का समय था, दिन था, कुछ था जो अपने देखा| कुछ था जो अपने देखा| क्यों? क्योंकि दिन में प्रकाश था| स्थितियां अनुकूल थीं, आप देख पाए| आंखें आपकी ही थीं| निश्चित सी बात है, आंखें आपकी ही थीं| अपनी आँखों से देखा परन्तु परिस्थितियां भी अनुकूल थीं| फिर रात आई, दिन में जो देखा था, जो समझा था, जो जाना था, वो अचानक हट गया| आप जाग नहीं पाए, आप सो गए| आप संयमी नहीं हैं|

(मौन)

आप संयमी नहीं हैं| संयमी वो जो तब तक भी जागृत रह सके जब स्थितियां प्रतिकूल हों| या निशा सर्वभूतानाम् तस्यां जागर्ति संयमी | संयमी वो, जो रात में भी जगा रह सके|

ठीक है?

तो अर्जुन पूछ रहे हैं, ऐसों का क्या जो दिन के प्रकाश में जब परिस्थितियों का सहारा है तब तो जान लेते हैं, समझ लेते हैं, पर रात ढले उनकी पुरानी आदतें, उनके पुराने संस्कार उन पर दोबारा हावी हो जाते हैं| तो उनका क्या होगा?

(मौन)

इसी को योगभ्रष्ट कहा जाता है| इसी स्थिति को कहा जाता है योगभ्रष्ट होना| जब बात समझ में तो आई है, पर समय उसको भुला दे रहा है| दिन में तो साफ-साफ दिखाई दिया, रात में फिर बहक गये| वो नहीं कर पाए जो कृष्ण ने कहा| ‘या निशा सर्वभूतानाम्…’ कि सब सो गए हैं, सबके लिए रात है, तुम जगे रहो| वो नहीं कर पाए| ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है योगभ्रष्ट, इसी के बारे में अर्जुन का कौतुहल है कि योगभ्रष्ट का क्या होगा? कृष्ण कहते हैं कि योगभ्रष्ट ने जो जाना है, वो व्यर्थ नहीं जायेगा| वो हारा है पर वो दोबारा कोशिश करेगा, पूरे प्रयत्न से करेगा| पिछली हार उसका सबक बनेगी| वो सो तो जायेगा पर फिर जब दोबारा दिन आएगा और चेष्टा उठेगी उसके भीतर से, उसका आत्मबल और जगेगा| और ऐसे करते-करते वो अंततः पूर्ण योग में स्थापित हो जायेगा| समझ में आई ये बात? तो योगभ्रष्ट भी प्रशंसनीय ही है| चलो शुरू तो किया है न| रात आई, फिसल गए कोई बात नही|

श्रोता १: यहाँ पर रात शाब्दिक अर्थ है या फिर..?

वक्ता: समझो ना! शाब्दिक अर्थ की बात नहीं हो रही है यहाँ पर| रात का अर्थ समझो, स्थितियां जब प्रतिकूल हैं| तुम्हें समझ में आया था, सहारा मिला था, सूरज कि शनी मिली थी, सूरज चला गया तुम फिर बहक गए| कोई बात नही लेकिन, सूरज फिर आएगा और इस बार जब सूरज आएगा तो तुम और ध्यान के साथ सूरज में स्थापित होओगे| क्योकि पिछली भूल सबक देगी तुमको और यहीं कृष्ण का संदेशा आ गया अर्जुन को| क्यों दोबारा आएगा? उसको वो इन शब्दों में कहते हैं कि दूसरा जन्म होगा| दूसरे जन्म से तात्पर्य है कि सुबह फिर होगी| हर सुबह एक नया जन्म होता है| इसको इसी तरह पढ़िए| बात समझ में आ रही है?

(मौन)

सवेरा फिर होगा, दोबारा मौका मिलेगा और जब दोबारा मौका मिलेगा तो अब बहकने की संभावना कम, कम और कम होती जाएगी| अंततः वो दिन भी आएगा कि पूरी रात बीत जाएगी पर तुम?

कुछ श्रोता: सोते नहीं रहोगे|

वक्ता: बहकोगे नहीं, चौकस रहोगे| समझ में आ रही है बात? फिर आगे वो कहते हैं कि योगभ्रष्ट को लेकिन फिर समय लगता है| एक रात फिसलता है, दो रात फिसलता है, तीन रात फिसलता है| आगे वो बात कर रहे हैं योगी की दुनिया में समय कि कोई विशेष आवश्यकता है ही नहीं | वहां ये है ही नहीं कि एक रात बीते और दूसरी रात बीते| समय नहीं चाहिए, क्षण भर में काम हो सकता है| ये भी कहा उन्होंने अर्जुन को| तो कोई अपने आप को ये बहाना ना दे कि अभी तो कई रातें हैं फिसलने के लिए, उसके बाद हम धीरे-धीरे सम्हलेंगे| अरे! योगभ्रष्ट होना, कोई बुरी बात थोड़े ही है|

(मौन)

वक्ता: नहीं , ऐसा नहीं है| उसी साँस में कृष्ण ये भी कह रहें हैं कि काम तुरंत भी हो सकता है, और तुरंत ही कर| तुझे क्यों गवांनी हैं रातें?

ठीक है?

-‘संवाद’ पर आधारित| स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं|

संवाद देखें: आँखें फिर से खोलना

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2 टिप्पणियाँ

    • प्रिय भारद्वाज जी,

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      4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
      सप्रेम,
      प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

      Like

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